07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 39 || शकुनि के मायामय अस्‍त्रों का प्रद्युम्न द्वारा निवारण तथा उनके चलाये हुए श्रीकृष्‍णास्‍त्र से युद्धस्‍थल में भगवान श्रीकृष्‍ण का प्रादुर्भाव

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 39 || शकुनि के मायामय अस्‍त्रों का प्रद्युम्न द्वारा निवारण तथा उनके चलाये हुए श्रीकृष्‍णास्‍त्र से युद्धस्‍थल में भगवान श्रीकृष्‍ण का प्रादुर्भाव


नारद जी कहते हैं- महाराज् ! शकुनि ने फिर उठकर जब अपनी सेना का विनाश हुआ देख, तब उसने लाख भार के समान भारी धनुष हाथ में लिया। राजन्! उस प्रचण्‍ड विक्रमशाली को दण्‍ड पर तीखा बाण रखकर बलवान दैत्‍यराज शकुनि ने रणभूमि में प्रद्युम्न से कहा।

शकुनि बोला- राजन् ! इस भूतल पर कर्म ही प्रधान हैं। महत् कर्म ही साक्षात गुरु तथा सामर्थ्‍यशाली ईश्वर है। यहाँ कर्म से ही उच्‍चता और नीचता प्रकट होती है तथा उस कर्म से ही विजय और पराजय होती है। जैसे सहस्‍त्रों गौओं के बीच में छोड़ा हुआ बछड़ा सत्‍पुरुषों के देखते-देखते अपनी माता को ढूंढ़ लेता है, वैसे ही जिसने भी शुभाशुभ कर्म किया है, उसके द्वारा किया हुआ कर्म सहस्‍त्रों मनुष्‍यों के होने पर भी उस कर्ता को ही प्राप्‍त होता है। इसके अनुसार मैं सुदृढ़ कर्म करके उसके द्वारा अपने शत्रु स्‍वरूप तुम को अवश्य जीत लूँगा। इसके लिये मैंने शपथ खायी है। तुम भी शीघ्र ही इसका प्रतीकार करो, जिससे इस भूमि पर पराजय न हो।

प्रद्युम्न ने कहा- दैत्‍यराज ! यदि तुम कर्म को प्रधान मानते हो तो यह भी जान लो कि काल के बिना उसका कोई फल नहीं होता। कर्म करने पर भी उसके पाक या परिणाम में कभी-कभी विघ्न उपस्थित हो जाता है, अत: श्रेष्‍ठ विद्वान पुरुषों ने सदा काल या समय को ही बलिष्‍ठ माना है। दैत्‍यराज ! सुनो, कर्म के परिपाक का अवसर आने पर भी कर्ता के बिना उसका फल कदापि नहीं प्राप्‍त होता। इसलिये श्रेष्‍ठ पुरुष कर्ता को ही प्रधान मानते हैं, कर्म और काल को नहीं। कुछ लोग योग (उपाय) को ही प्रधान मानते है; क्‍योंकि उसके बिना भूतल पर कोई भी कर्म और उसके फल की सिद्धि नहीं हो सकती। काल, कर्म और कर्ता के रहते हुए भी योग के बिना सब व्‍यर्थ हो जाता है। योग, कर्म, कर्ता और काल के होते हुए भी विधि ज्ञान के बिना सब व्‍यर्थ हो जाता है, जैसे परिणाम के प्रकार आदि का विचार किये बिना फल का यथावत साधन नहीं होता। योग, कर्म, कर्ता, काल और विधिज्ञान के होने पर भी ब्रह्म पुरुष के बिना कुछ भी नहीं होता। इसलिये मैं उन परिपूर्णतम भगवान को नमस्‍कार करता हूं, जिनसे अखिल विश्व का ज्ञान होता है।

शकुनि बोला- हे महाबाहु प्रद्युम्न ! तुम तो साक्षात ज्ञान के निधि हो, जो तुम्‍हारा दर्शन मात्र से मनुष्‍य कृतार्थ हो जाता है। जो तुम्‍हारा संग पाकर प्रतिदिन तुम से वार्तालाप करते हैं, उनकी महिमा का वर्णन करने में तो चार मुख वाले ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं है।

नारदजी कहते हैं- राजन् ! यों कहकर मायावी और बलवान दैत्‍यराज शकुनि ने मयासुर से सीखे हुए रौरवास्‍त्र का संधान किया। राजन् ! उस अस्‍त्र से बड़े बड़े भाग, दंदशूक और विषैले बिच्‍छू करोड़ों की संख्‍या में निकले। वे सब के सब बड़े विकराल और रौद्र रूपधारी थे। उनके द्वारा डसी हुई सारी सेना उनके फुफकारों से मतवाली हो गयी। यह देख परम बुद्धिमान प्रद्युम्न ने गरुडास्‍त्र का संधान किया। उस अस्‍त्र से कोटि कोटि गरुड़, नीलकण्‍ठ, मोर तथा अन्‍य भयानक पक्षी उस दैत्‍य के देखते देखते प्रकट हुए। उन पक्षियों ने उस युद्ध में नागों, दंदशूकों तथा बिच्‍छुओं को निगल लिया। फिर वे तीखी चोंच और बड़ी पांख वाले पक्षी क्षणभर में अदृशय हो गये। 
राजन् ! तब उस रणदुर्मद दैत्‍य शकुनि ने भी राक्षसी, गान्‍धर्वी, गौहा की और पैशाची माया का संधान किया। उन बाणों से निकले हुए विकराल और काले रूप वाले करोड़ों भूत और प्रेत वहाँ अंगारों की वर्षा करने लगे। उस तामसी और पैशाची माया को जानकर युद्धाभिलाषी श्रीकृष्‍ण कुमार मीनध्‍वज प्रद्युम्न ने सत्त्वास्‍त्र का संधान किया।

राजन् ! उस बाण से करोड़ों विष्‍णु पार्षद प्रकट हुए, जिन्‍होंने उस पैशाची माया को वैसे ही नष्‍ट कर दिया, जैसे गरुड़ नागिन को नष्‍ट कर दे। तब उस मायावी दैत्‍य ने पुन: गौह्म की माया का संधान किया, जिससे गर्जन-तर्जन करते हुए करोड़ों भयानक मेघ प्रकट हुए। ये मल, मूत्र, रक्त, मेदा, मज्जा और हड्डी की वर्षा करने लगे। महाराज ! उस गौह्म की माया को जानकर भगवान् प्रद्युम्न हरि ने उसके विनाश के लिये बाण पर घर्घर ध्‍वनि करने वाले भगवान यज्ञ वाराह का प्राकट्य हुआ। वे वेग से अपनी दाढ़ से बादलों को विदीर्ण करते हुए उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे मत्त गजराज बांस के वृक्षों को तोड़ता-फोड़ता शोभा पाता है। 

तदनन्‍तर उस दैत्‍य ने रणमण्‍डल में गान्‍धर्वी माया प्रकट की। युद्ध अदृश्‍य हो गया और वहाँ सोने के करोड़ों महल खड़े हो गये। सत्‍पुरुषों के देखते-देखते वे स्‍वर्णमय भवन वस्‍त्रों और अलंकारों से सज गये। वहाँ विद्याधरियां और गन्‍धर्व नाचने-गाने लगे। नरेश्वर ! मृदंग, ताल और वाद्यों के मोहक शब्‍दों तथा रागयुक्त हाव-भाव और कटाक्षों द्वारा लोगों को संतुष्‍ट करती हुई सोलह वर्ष की सी अवस्‍था वाली कमल नयनी, मनोमोहिनी, सुन्‍दरी रमणियाँ वहाँ प्रकट हो गयीं। उनके रूप-लावण्‍य तथा राग से जब समस्‍त वृष्णिवंशी पुरुष मोहित हो गये, तब उस मोहिनी गान्‍धर्वी माया को जानकर उसके निवारण के लिये महाबली प्रद्युम्न ने रणभूमि में ज्ञानास्‍त्र का संधान किया।

नृपेश्वर ! उस समय ज्ञानोदय होने पर सबके मोह का नाश हो गया। उस माया के नष्‍ट हो जाने पर क्रोध से भरे हुए मायावी दैत्‍यराज शकुनि ने राक्षसी माया का संधान किया। राजन् ! फिर तो क्षण भर में सारा आकाश पंखधारी पर्वतों से आच्‍छादित हो गया। पृथ्‍वी पर घोर अन्‍धकार छा गया, मानो प्रलय काल में मेघों की घोर घटा घिर आयी हो। आकाश से चारों ओर जल वृक्ष, प्रस्‍तर-खण्‍ड हड्डियाँ, धड़, रक्त, गदाएं, परिघ, खड़ग और मुसल आदि बरसने लगे। विदेहराज ! पर्वत मेघों के समान आकाश में घूमने लगे। हाथियों और घोड़ों को अपना भक्ष्‍य बनाते हुए सैकड़ों राक्षस और यातुधान हाथों में शूल लिये 'काट डालो, फाड़ डालो' इत्‍यादि कहते हुए दृष्टिगोचर होने लगे। रणमण्‍डल में बहुत-से सिंह, व्‍याघ्र और वाराह दिखायी देने लगे, जो अपने नखों द्वारा हाथियों को विदीर्ण करते हुए उनके शरीरों को चबा रहे थे। अपनी सेना को पलायन करती देख महाबली प्रद्युम्न ने उस राक्षसी माया को जीतने के लिये नरसिंहास्‍त्र संधान किया। इससे साक्षात रौद्र रूपधारी भगवान नरसिंह हरि प्रकट हो गये, जिनके अयाल चमक रहे थे। जीभ लपलपा रही थी तथा बड़े-बड़े नख और पूंछ उनकी शोभा बढ़ाते थे। बाल हिल रहे थे, मुंह डरावना दिखायी देता था और वे हुंकार से अत्‍यन्‍त भीषण प्रतीत होते थे। रण्‍मण्‍डल में सिंहनाद करते हुए वे खड़े हो गये। उनके दस सिंहनाद से सप्‍त पाताल और सातों लोकों सहित सारा ब्रह्माण्‍ड गूंज उठा, दिग्‍गज विचलित हो गये, तारे खिसक गये और भूखण्‍ड-मण्‍डल कांपने लगा। वे अपने तीखे नखों से दैत्‍यों के देखते-देखते वृक्षों सहित पर्वतों को आकाश में उठाकर उनकी सेना के बीच भूपृष्‍ठ पर पटक देते थे। उन नरहरि ने युद्ध स्‍थल में यातुधानों को अपने पैरों से मसल डाला। सिंहों, व्‍याघ्रों और वाराहों को तीखे नखों से विदीर्ण करके आकाश में फेंक दिया। फिर वे भगवान विष्‍णु वहीं अन्‍तर्धान हो गये।

इस प्रकार राक्षसी माया के नष्‍ट हो जाने पर रुक्मिणी नन्‍दन प्रद्युम्न ने समरांगण में विजय दायक मौलेन्‍द्र नामक शंख बजाया। उस समय दुन्‍दुभियों की ध्‍वनि से मिश्रित जय-जय घोष होने लगा। प्रद्युम्न के ऊपर देवता लोग फूल बरसाने लगे। अपनी माया के नष्‍ट हो जाने पर दैत्‍यराज शकुनि रथ और सैनिकों के साथ वहीं अदृश्य हो गया। इसके बाद उसने मय नामक दैत्‍य द्वारा सिखायी हुई दैतेयी माया प्रकट की। उस समय बिजली की कड़क के साथ हाथी की सूंड़ के समान मोटी जलधाराएँ बरसाते हुए सांवर्तक मेघगण सत्‍पुरुषों के देखते-देखते आकाश में छा गये। एक ही क्षण में सारे समुद्र प्रचण्‍ड आंधी से कम्पित और क्षुभित हो परस्‍पर टकराते हुए अपने भंवरों से समस्‍त भूमण्‍डल को आपावित करने लगे। उसमें यादवों के आत्‍मीयजनों सहित सारे वृक्ष डूब गये। यह देख समस्‍त यादव बहुत भयभीत हो गये तथा राम-कृष्‍ण के नामों का कीर्तन करते हुए अपना सारा पराक्रम भूल गये। राजेन्‍द्र ! एक ही क्षण में वे सब लोग चुपचाप पराजित हो गये। तब महाबाहु प्रद्युम्न ने प्रचण्‍ड पराक्रम के आश्रय भूत कोदण्‍ड पर बाण रखकर उनके ऊपर सहसा श्रीकृष्‍णास्‍त्र का संधान किया।

मिथिलेश्वर ! उस समय वहाँ कुशस्‍थलीपुर के प्रात:कालीन करोड़ों सूर्यों के समान कान्तिमान उत्‍कृष्‍ट तेज:पुज्ज स्‍वयं इस प्रकार प्रकट हुआ, मानो वह अपने अभीष्‍ट अर्थ का मूर्तिमान रूप हो। वह तेज दसों दिशाओं का अनुरज्जन कर रहा था। उस परम तेज के भीतर नूतन जलधर के समान श्‍याम छवि से सुशोभित, सुवर्णमय कमल की रेणु के सदृश पीत वसन से समलंकृत, भ्रमरों के गुज्जारव से निनादित, कुन्‍तल राशिधारी, वैजयन्‍ती माला पहने, श्री वत्‍सचिह एवं उत्तम कौस्‍तु भरत्न से सुशोभित वक्ष वाले, प्रफुल्ल पंकज के तुल्‍य विशाल लोचन, चार भुजाधारी श्रीकृष्‍ण दुष्टिगोचर हुए। उनके मस्‍तक पर सुन्‍दर किरीट, कण्‍ठ में मनोहर हार तथा चरणों में नवल नूपुर शोभा दे रहे थे। कानों में नूतन सूर्य की सी कान्ति वाले सोने के कुण्‍डल झलमला रहे थे।

इस प्रकार भगवान श्री कृष्‍ण को देखकर यदुवंशी अत्‍यन्‍त हर्ष से खिल उठे। उन्‍होंने दोनों हाथ जोड़कर उन परमेश्वर को प्रणाम किया। मिथिलेश्वर ! उस समय देवता लोग सब ओर से फूल बरसाकर जोर-जोर से जय-जयकार करने लगे। तत्‍काल आये हुए शांर्ग धनुषधारी भगवान श्रीकृष्‍ण ने अपने शांर्ग धनुष से छूटे हुए एक ही बाण से लीलापूर्वक शकुनि के प्रत्‍यंचा सहित कोदण्‍ड को रोषपूर्वक खण्डित कर दिया। धनुष कट जाने पर तिरस्‍कृत हुआ शकुनि युद्ध छोड़कर अपने अस्‍त्र शस्‍त्रों का समूह ले आने के लिये चन्‍द्रावतीपुरी को चला गया।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘श्रीकृष्‍ण का आगमन’ नामक उनतालीसवां अध्‍याय पूरा हुआ।


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