07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 39 || शकुनि के मायामय अस्त्रों का प्रद्युम्न द्वारा निवारण तथा उनके चलाये हुए श्रीकृष्णास्त्र से युद्धस्थल में भगवान श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 39 || शकुनि के मायामय अस्त्रों का प्रद्युम्न द्वारा निवारण तथा उनके चलाये हुए श्रीकृष्णास्त्र से युद्धस्थल में भगवान श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव
राजन् ! उस बाण से करोड़ों विष्णु पार्षद प्रकट हुए, जिन्होंने उस पैशाची माया को वैसे ही नष्ट कर दिया, जैसे गरुड़ नागिन को नष्ट कर दे। तब उस मायावी दैत्य ने पुन: गौह्म की माया का संधान किया, जिससे गर्जन-तर्जन करते हुए करोड़ों भयानक मेघ प्रकट हुए। ये मल, मूत्र, रक्त, मेदा, मज्जा और हड्डी की वर्षा करने लगे। महाराज ! उस गौह्म की माया को जानकर भगवान् प्रद्युम्न हरि ने उसके विनाश के लिये बाण पर घर्घर ध्वनि करने वाले भगवान यज्ञ वाराह का प्राकट्य हुआ। वे वेग से अपनी दाढ़ से बादलों को विदीर्ण करते हुए उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे मत्त गजराज बांस के वृक्षों को तोड़ता-फोड़ता शोभा पाता है।
तदनन्तर उस दैत्य ने रणमण्डल में गान्धर्वी माया प्रकट की। युद्ध अदृश्य हो गया और वहाँ सोने के करोड़ों महल खड़े हो गये। सत्पुरुषों के देखते-देखते वे स्वर्णमय भवन वस्त्रों और अलंकारों से सज गये। वहाँ विद्याधरियां और गन्धर्व नाचने-गाने लगे। नरेश्वर ! मृदंग, ताल और वाद्यों के मोहक शब्दों तथा रागयुक्त हाव-भाव और कटाक्षों द्वारा लोगों को संतुष्ट करती हुई सोलह वर्ष की सी अवस्था वाली कमल नयनी, मनोमोहिनी, सुन्दरी रमणियाँ वहाँ प्रकट हो गयीं। उनके रूप-लावण्य तथा राग से जब समस्त वृष्णिवंशी पुरुष मोहित हो गये, तब उस मोहिनी गान्धर्वी माया को जानकर उसके निवारण के लिये महाबली प्रद्युम्न ने रणभूमि में ज्ञानास्त्र का संधान किया।
नृपेश्वर ! उस समय ज्ञानोदय होने पर सबके मोह का नाश हो गया। उस माया के नष्ट हो जाने पर क्रोध से भरे हुए मायावी दैत्यराज शकुनि ने राक्षसी माया का संधान किया। राजन् ! फिर तो क्षण भर में सारा आकाश पंखधारी पर्वतों से आच्छादित हो गया। पृथ्वी पर घोर अन्धकार छा गया, मानो प्रलय काल में मेघों की घोर घटा घिर आयी हो। आकाश से चारों ओर जल वृक्ष, प्रस्तर-खण्ड हड्डियाँ, धड़, रक्त, गदाएं, परिघ, खड़ग और मुसल आदि बरसने लगे। विदेहराज ! पर्वत मेघों के समान आकाश में घूमने लगे। हाथियों और घोड़ों को अपना भक्ष्य बनाते हुए सैकड़ों राक्षस और यातुधान हाथों में शूल लिये 'काट डालो, फाड़ डालो' इत्यादि कहते हुए दृष्टिगोचर होने लगे। रणमण्डल में बहुत-से सिंह, व्याघ्र और वाराह दिखायी देने लगे, जो अपने नखों द्वारा हाथियों को विदीर्ण करते हुए उनके शरीरों को चबा रहे थे। अपनी सेना को पलायन करती देख महाबली प्रद्युम्न ने उस राक्षसी माया को जीतने के लिये नरसिंहास्त्र संधान किया। इससे साक्षात रौद्र रूपधारी भगवान नरसिंह हरि प्रकट हो गये, जिनके अयाल चमक रहे थे। जीभ लपलपा रही थी तथा बड़े-बड़े नख और पूंछ उनकी शोभा बढ़ाते थे। बाल हिल रहे थे, मुंह डरावना दिखायी देता था और वे हुंकार से अत्यन्त भीषण प्रतीत होते थे। रण्मण्डल में सिंहनाद करते हुए वे खड़े हो गये। उनके दस सिंहनाद से सप्त पाताल और सातों लोकों सहित सारा ब्रह्माण्ड गूंज उठा, दिग्गज विचलित हो गये, तारे खिसक गये और भूखण्ड-मण्डल कांपने लगा। वे अपने तीखे नखों से दैत्यों के देखते-देखते वृक्षों सहित पर्वतों को आकाश में उठाकर उनकी सेना के बीच भूपृष्ठ पर पटक देते थे। उन नरहरि ने युद्ध स्थल में यातुधानों को अपने पैरों से मसल डाला। सिंहों, व्याघ्रों और वाराहों को तीखे नखों से विदीर्ण करके आकाश में फेंक दिया। फिर वे भगवान विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये।
इस प्रकार राक्षसी माया के नष्ट हो जाने पर रुक्मिणी नन्दन प्रद्युम्न ने समरांगण में विजय दायक मौलेन्द्र नामक शंख बजाया। उस समय दुन्दुभियों की ध्वनि से मिश्रित जय-जय घोष होने लगा। प्रद्युम्न के ऊपर देवता लोग फूल बरसाने लगे। अपनी माया के नष्ट हो जाने पर दैत्यराज शकुनि रथ और सैनिकों के साथ वहीं अदृश्य हो गया। इसके बाद उसने मय नामक दैत्य द्वारा सिखायी हुई दैतेयी माया प्रकट की। उस समय बिजली की कड़क के साथ हाथी की सूंड़ के समान मोटी जलधाराएँ बरसाते हुए सांवर्तक मेघगण सत्पुरुषों के देखते-देखते आकाश में छा गये। एक ही क्षण में सारे समुद्र प्रचण्ड आंधी से कम्पित और क्षुभित हो परस्पर टकराते हुए अपने भंवरों से समस्त भूमण्डल को आपावित करने लगे। उसमें यादवों के आत्मीयजनों सहित सारे वृक्ष डूब गये। यह देख समस्त यादव बहुत भयभीत हो गये तथा राम-कृष्ण के नामों का कीर्तन करते हुए अपना सारा पराक्रम भूल गये। राजेन्द्र ! एक ही क्षण में वे सब लोग चुपचाप पराजित हो गये। तब महाबाहु प्रद्युम्न ने प्रचण्ड पराक्रम के आश्रय भूत कोदण्ड पर बाण रखकर उनके ऊपर सहसा श्रीकृष्णास्त्र का संधान किया।
मिथिलेश्वर ! उस समय वहाँ कुशस्थलीपुर के प्रात:कालीन करोड़ों सूर्यों के समान कान्तिमान उत्कृष्ट तेज:पुज्ज स्वयं इस प्रकार प्रकट हुआ, मानो वह अपने अभीष्ट अर्थ का मूर्तिमान रूप हो। वह तेज दसों दिशाओं का अनुरज्जन कर रहा था। उस परम तेज के भीतर नूतन जलधर के समान श्याम छवि से सुशोभित, सुवर्णमय कमल की रेणु के सदृश पीत वसन से समलंकृत, भ्रमरों के गुज्जारव से निनादित, कुन्तल राशिधारी, वैजयन्ती माला पहने, श्री वत्सचिह एवं उत्तम कौस्तु भरत्न से सुशोभित वक्ष वाले, प्रफुल्ल पंकज के तुल्य विशाल लोचन, चार भुजाधारी श्रीकृष्ण दुष्टिगोचर हुए। उनके मस्तक पर सुन्दर किरीट, कण्ठ में मनोहर हार तथा चरणों में नवल नूपुर शोभा दे रहे थे। कानों में नूतन सूर्य की सी कान्ति वाले सोने के कुण्डल झलमला रहे थे।
इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण को देखकर यदुवंशी अत्यन्त हर्ष से खिल उठे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर उन परमेश्वर को प्रणाम किया। मिथिलेश्वर ! उस समय देवता लोग सब ओर से फूल बरसाकर जोर-जोर से जय-जयकार करने लगे। तत्काल आये हुए शांर्ग धनुषधारी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शांर्ग धनुष से छूटे हुए एक ही बाण से लीलापूर्वक शकुनि के प्रत्यंचा सहित कोदण्ड को रोषपूर्वक खण्डित कर दिया। धनुष कट जाने पर तिरस्कृत हुआ शकुनि युद्ध छोड़कर अपने अस्त्र शस्त्रों का समूह ले आने के लिये चन्द्रावतीपुरी को चला गया।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘श्रीकृष्ण का आगमन’ नामक उनतालीसवां अध्याय पूरा हुआ।
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