07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 40 || शकुनि के जीव स्वरूप शुक का निधन
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 40 || शकुनि के जीव स्वरूप शुक का निधन
नारद जी कहते हैं- राजन् ! शकुनि के चले जाने पर कमल नयन भगवान श्रीकृष्ण ने प्रद्युम्न आदि समस्त यादवों को बुलाकर इस प्रकार कहा।
श्री भगवान बोले- पूर्वकाल में सुमेरु पर्वत के उत्तर भाग में इस शकुनि नामक दैत्य ने चार युगों तक निराहार रहकर तपस्या द्वार भगवान शिव को संतुष्ट किया। चार युग व्यतीत हो जाने पर साक्षात महेश्वरदेव ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और कहा- ‘वर मांगो। दैत्य शकुनि ने उनको प्रणाम किया। उसका रोम-रोम खिल उठा और नेत्रों में प्रेम के आंसू छलक आये। उसने दोनों हाथ जोड़कर गद्गद वाणी में धीरे से कहा- ‘प्रभो ! यदि मैं मरूँ तो भूतल का स्पर्श होते ही फिर जी जाऊँ और आकाश में भी हे देव ! दो घड़ी तक मेरी मृत्यु न हो। दैत्य के इस प्रकार कहने पर भगवान हर ने दोनों वर दे दिये और पिंजरे में रखे हुए एक तोते को देखकर उस नतमस्तक दैत्य से कहा- 'निष्पाप दैत्य ! यह तोता तुम्हारे जीव के तुल्य है। तुम इसकी सदा रक्षा करना। असुर ! इसके मर जाने पर तुम्हें यह जानना चाहिये कि मेरी ही मृत्यु हो गयी है। उसे इस प्रकार वर देकर रुद्रदेव अन्तर्धान हो गये। इसलिये दुर्ग में तोते की मृत्यु हो जाने पर शकुनि का वध होगा।
नारद जी कहते हैं- यह कहकर वीरों की उस सभा में भगवान देवकीनन्दन ने गरुड़ को शीघ्र बुलाकर हंसते हुए मुख से कहा।
श्री भगवान बोले- परम बुद्धिमान गरुड़ ! मेरी बात सुनो, तुम चन्द्रावतीपुरी को जाओ। वह पुरी सौ योजन विस्तृत है और दैत्यों की सेना से घिरी हुई है। सुवर्ण और रत्नों से मनोहर प्रतीत होने वाली गगनचुम्बी महलों तथा विचित्र उपवनों एवं उद्यानों से सुशोभित है। बड़े-बड़े दैत्य उसकी शोभा बढ़ाते हैं। उसके प्रत्येक दुर्ग में और दरवाजों पर दैत्य पुंगव उसकी रक्षा करते हैं (उस पुरी में जाकर तुम शकुनि के महल के भीतर पिंजरे में सुरक्षित तोते को मार डालो)।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! उस पुरी को देखने के लिये गरुड़ ने सूक्ष्म रूप धारण कर लिया। वे दैत्यों से अलक्षित रहकर, अट्टालिकाओं तथा तोलिकाओं का निरीक्षण करते हुए, उड़-उड़कर एक महल से दूसरे महल में होते हुए शकुनि के भवन में जा पहुँचे। दैत्य के जीवस्वरूप शुक की खोज करते हुए गरुड़जी क्षण भर वहाँ खड़े रहे। उस समय दैत्यराज शकुनि वहाँ युद्ध के लिये कवच धारण किये भाँति-भाँति के अस्त्र-शस्त्र ले रहा था। उस वीर का हृदय क्रोध से भरा हुआ था। राजन् ! उसकी स्त्री मदालसा उसकी कमर में दोनों हाथ डालकर बोली।
मदालसा ने कहा- राजन् ! प्राणनाथ ! तुम्हारे सारे सुहद, अनुकूल चलने वाले भाई तथा उद्भट दैत्यप्रवर युद्ध में मारे गये। यादवों के साथ युद्ध करने के लिये न जाओ; क्योंकि उनके पक्ष में साक्षात भगवान श्रीहरि आ गये हैं। उन्हें तत्काल भेंट अर्पित करो, जिससे कल्याण की प्राप्ति हो।
शकुनि बोला- प्रिये ! यादवों ने बलपूर्वक मेरे भाइयों का वध किया है, अत: मैं अपनी सेनाओं द्वारा उन्हें अवशय मारूँगा। भगवान शिव के वरदान से भूतल पर मेरी मृत्यु नहीं होगी। प्रिये ! चन्द्र नामक उप द्वीप में सुन्दर पतंग पर्वत पर इस समय मेरा जीव रूपी शुक विद्यमान है। शंखचूड़ नामक सर्प दिन-रात उसकी रक्षा करता है। इस बात को कोई नहीं जानता। फिर मेरी मृत्यु कैसे हो सकती है।
नारदजी कहते है- राजन् ! शुक विषयक वृत्तान्त सुनकर दिव्य वाहन गरूड़ ने वहाँ से चन्द्र नामक उप द्वीप में जाने का विचार किया। वेग से उड़ते हुए गरूड़ समुद्र के तट पर जा पहुँचे और चन्द्रद्वीप की खोज करते हुए आकाश में विचरने लगे। शत योजन विस्तृत एवं भयंकर गर्जना करने वाले समुद्र पर दृष्टिपात करते हुए पक्षिराज गरूड़ लतावृन्द से मनोरम सिंहल द्वीप में पहुँच गये। वहाँ के लोगों से गरूड़ ने पूछा- ‘इस स्थान का क्या नाम है उत्तर मिला- ‘सिंहल द्वीप। तब वहाँ से उड़ते हुए गरूड़ बड़े वेग से त्रिकूट पर्वत के शिखर पर बसी हुई लंका में जा पहुँचे। लंका जाकर वहाँ से भी उड़े और पाच्चजन्य द्वीप में चले गये। पाच्चजन्य सागर के निकट पहुँचने पर बलवान पक्षिराज गरूड़ को बड़ी भूख लगी। इन्होंने हठात तीखी चोंच द्वारा बहुत से मत्स्य पकड़ लिये। उन्हीं मत्स्यों में एक बड़ा भारी मगर भी आ गया, जो दो योजन लंबा था उसने गरूड़ का एक पैर पकड़ लिया और पानी के भीतर खींचने लगा। गरुड़ अपना बल लगाकर उसे किनारे की ओर खींचने लगे। राजन् ! उस समय दो घड़ी तक उन दोनों में खींचातानी चलती रही। गरूड़ का वेग बड़ा प्रचण्ड था। उन्होंने अपनी तीखी चोंच से उस मगर की पीठ पर इस प्रकार चोट की, मानो यमराज ने यम दण्ड से प्रहार किया हो। उसी समय वह मगर का रूप छोड़कर तत्काल एक महान विद्याधर हो गया। उसने साक्षात गरूड़ को मस्तक झुकाया और हंसते हुए कहा।
विद्याधर बोला- मैं पूर्वकाल में हेमकुण्डल नामक प्रसिद्ध विद्याधर था। एक दिन देवमण्डल में सम्मिलित हो मैं आकाश गंगा में स्न्नान कर रहे थे। हंसी-हंसी में उनका पैर पकड़कर मैं उन्हें जल के भीतर खींच ले गया। तब ककुत्स्थन ने मुझे शाप देते हुए कहा- ‘दुर्बुद्धे ! तू मगर हो जा। तब मैंने उन्हें अनुनय-विनय से प्रसन्न किया। वे शीघ्र ही प्रसन्न हो गये और वर देते हुए बोले- ‘गरुड़ की चोंच का प्रहार होने पर तुम मगर की योनि से छूट जाओगे। सुव्रत ! आज आपकी कृपा से मैं ककुत्स्थ मुनि के शाप से छुटकारा पा गया।
नारदजी कहते हैं- यों कहकर जब हेमकुण्डल नामक विद्याधर स्वर्गलोक को चला गया, तब गरुड़ दोनों पांखों से उड़कर वहाँ से व्योममण्डल में पहुँच गये। वहाँ से वेगपूर्वक उड़ते हुए वे हरिण नामक उपद्वीप में गये। वहाँ अपान्तरतमा नामक मुनि बड़ी भारी तपस्या करते थे। उनके आश्रम में जाने पर पक्षिराज गरूड़ की एक पांख टूटकर गिर गयी। उसे देखकर अपान्तरतमा नामक मुनि गरूड़ से बोले ‘पक्षिन् ! मेरे मस्तक पर अपनी पांख रखकर तुम सुखपूर्वक चले जाओ। तब गरुड़ उनके मस्तक पर पांख रखकर आगे बढ़ गये। अपने ही समान अनेका नेक चन्द्रोपम पंख गरुड़ ने उनके सिर पर देखे। इससे उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। तब अपान्तरतमा मुनि गरूड़ से बोले- ‘पक्षिराज जब-जब श्रीकृष्ण का अवतार होता है, तब-तब सदा गरूड़ की एक पांख यहाँ गिरती है। कल्प-कल्प में श्रीकृष्णचन्द्र का अवतार होता है और तब-तब मेरे मस्तक पर गरुड़ का पंख गिरता है। इस प्रकार यहाँ अनन्त पंख पड़े हैं। जो सबके आदि अन्त बताये जाते हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण को मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ।
नारदजी कहते हैं- यह सुनकर गरूड़ आश्चर्यचकित हो उठे। उन्होंने उन मुनिवर को प्रणाम करके फिर अपनी उड़ान भरी और आकाशमण्डल में होते हुए वे रमणक द्वीप में चले गये। वहाँ सर्पों से बलि लेकर वे आवर्तक द्वीप में गये और वहाँ के शुक्ल द्वीप में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने मुझसे चन्द्रद्वीप का पता पूछा। फिर मेरे कहने से पक्षी गरूड़ उत्तर दिशा की ओर गये। इस तरह वे खगेश्वर चन्द्रद्वीप के पर्वत पर जा पहुँचे। वहाँ विनतानन्दन ने जलदुर्ग और अग्निदुर्ग देखा। मिथिलेश्वर ! बलवान पक्षिराज ने सारे जलदुर्ग को अपनी चोंच में लेकर उसी से अग्निदुर्ग को बुझा दिया। वहाँ पर्वतीय कन्दरा के द्वार पर जो लाखों दैत्य सोये थे, वे उठ खड़े हुए। उनके साथ दो घड़ी तक गरूड़ का युद्ध चलता रहा। पक्षिराज ने युद्ध में अपने पंजों से कितने ही राक्षसों को विदीर्ण कर डाला, किन्ही को पांखों से मारकर धराशायी कर दिया। कुछ दैत्यों को चोंच से पकड़कर बलवान पक्षिराज ने पर्वत के पृष्ठ भाग पर पटक दिया और फिर उठाकर बलपूर्वक आकाश में फेंक दिया। कुछ मर गये और शेष दैत्य दसों दिशाओं में भाग गये। इस तरह दैत्यों का संहार करके पक्षिराज गुफ़ा में घुस गये। वहाँ शंखचूड़ नामक सर्प के मस्तक पर उन्होंने अपने चमकीले पैर से आघात किया। शंखचूड़ गरुड़ को देखकर अत्यन्त तिरस्कृत हो पिंजरे के तोते को पानी में फेंककर शीघ्र ही वहाँ से पलायन कर गया। राजन् ! गरूड़ ने पिंजरे सहित शुक को तत्काल अपनी चोंच में लेकर आकाश में उड़ते हुए युद्धस्थल में जाने का विचार किया।
तब तक भागे हुए दैत्यों का महान कोलाहल आरम्भ हुआ। नरेश्वर ! तोता ले गया, तोता ले गया इस प्रकार चिल्लाते हुए उन असुरों की आवाज आकाश में और सम्पूर्ण दिशाओं में फैल गयी और दैत्य की सेनाओं के लोगों ने भी इस बात को सुना। स्वर्ग, भूतल एवं समस्त ब्रह्माण्ड में ‘तोता ले गया, तोता ले गया’ की आवाज गूंज उठी। उसे सुनकर असुरों सहित शकुनि सशंक हो गया। वह शूल लेकर तत्काल चन्द्रावतीपुरी से उठा और ‘गरूड़ तोते को ले गये है- यह सुनकर रोषपूर्वक उनका पीछा करने लगा। उसने गरूड़ को अपने शूल से मारा, तो भी उन्होंने मुख से तोते को नहीं छोड़ा। वे सातों समुद्र और सातों द्वीपों का निरीक्षण करते हुए आगे बढ़ते गये। दैत्यराज शकुनि ने प्रत्येक दिशा में और आकाश के भीतर भी उनका पीछा किया। राजन् ! नागान्तक गरूड़ आकाश में भ्रमण करते हुए कोटि योजन तक चले गये। दैत्य के त्रिशूल की मार से वे क्षत विक्षत हो गये, तथापि मुख से तोते को छोड़ नहीं सके। राजन् ! लाख योजन ऊँचे आकाश में जाने पर पिंजरे सहित शुक पत्थर की भाँति सुमेरु पर्वत के शिखर पर बड़े वेग से गिरा। पिंजरा टूट गया और तोते के प्राण-पखेरु उड़ गये। तदनन्तर गरूड़ उस महायुद्ध में श्रीकृष्ण के पास चले गये। राजन ! दैत्य शकुनि खिन्नचित्त हो चन्द्रावतीपुरी में लौट गया।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘गरूड़ का आगमन’ नामक चालीसवां अध्याय पूरा हुआ।
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