07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 41 || शकुनि का घोर युद्ध, सात बार मारे जाने पर भी उसका भूमि के स्पर्श से पुन: जी उठना; अन्त में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युक्तिपूर्वक उसका वध
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 41 || शकुनि का घोर युद्ध, सात बार मारे जाने पर भी उसका भूमि के स्पर्श से पुन: जी उठना; अन्त में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युक्तिपूर्वक उसका वध
नारदजी कहते हैं- राजन् ! शेष दैत्यों को लेकर नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र धारण किये बलवान वीर शकुनि, दिव्य मनोहर अश्व उच्चै:श्रवा पर आरुढ़ हो, क्रोध से अचेत-सा होकर, धनुष की टंकार करता हुआ भगवान श्रीकृष्ण के भी सम्मुख युद्ध करने के लिये आ गया।
रणदुर्मद दैत्य शकुनि तथा उसकी सेना का पुन: आगमन देख समस्त वृष्णिवंशियों ने अपने अपने आयुध उठा लिये। उस समय दैत्यों का यादवों के साथ घोर युद्ध हुआ। वीरों के साथ वीर इस तरह जूझने लगे, जैसे सिंहों के साथ सिंह लड़ रहे हों। राजन् ! मेघ की गर्जना के समान बारंबार कोदण्ड की टंकार करता हुआ शकुनि सबके आगे था। उसने नाराचों द्वारा दुर्दिन उपस्थित कर दिया। बाणों का अन्धकार छा जाने पर शांर्ग धनुष धारण करने वाले भगवान् गरूड़ ध्वज अपने उस धनुष उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे इन्द्रधनुष से मेघ की शोभा होती है। साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने अपने एक ही बाण से लीलापूर्वक असुर शकुनि के बाण-समूहों को काट डाला।
मिथिलेश्वर ! युद्ध में अपने कोदण्ड को कान तक खींचकर शकुनि ने भगवान श्रीकृष्ण के हृदय में दस बाण मारे। तब प्रलय समुद्र के महान आवर्तो के भीषण संघर्ष के समान गम्भीर नाद करने वाली शकुनि के धनुष की प्रत्यंचा को श्रीकृष्ण ने दस बाणों से काट डाला। नरेश्वर ! मायावी दैत्य शकुनि सबके देखते देखते सौ रूप धारण करके श्रीहरि के साथ युद्ध करने लगा। तब साक्षात भगवान श्रीकृष्ण एक सहस्त्र रूप धारण करके उस दैत्य के साथ युद्ध करने लगे, वह अद्भुत-सी बात हुई। बलवान दैत्यराज शकुनि ने मयासुर के बनाये हुए अग्नितुल्य तेजस्वी त्रिशूल को घुमाकर उसे श्रीहरि के ऊपर चला दिया। तब कुपित हुए परिपूर्णतम महाबाहु श्रीहरि ने उस त्रिशूल को वैसे ही काट दिया, जैसे तीखी चोंच वाला गरूड़ किसी सर्प को टूक-टूक कर डाले। तदनन्तर क्रोध से भरे हुए महाबाहु श्रीहरि ने शकुनि के मस्तक पर अपनी गदा चलायी तथा उस वज्रतुल्य गदा की चोट से उस दैत्य को घोड़े से नीचे गिरा दिया। गदा की चोट से पीडित हुआ दैत्य क्षणभर के लिये मूर्च्छित हो गया। फिर युद्धस्थल में अपनी गदा लेकर वह माधव के साथ युद्ध करने लगा।
उस समय रणमंडल में गदाओं द्वारा उन दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ। गदाओं के टकराने का चट-चट शब्द वज्र के टकराने की भाँति सुनायी पड़ता था। श्रीकृष्ण की गदा से चूर-चूर होकर शकुनि की गदा पृथ्वी पर गिर पड़ी। वह युद्ध में सबके देखते-देखते अंगार की भाँति दहकने लगी। जैसे पर्वत की कन्दरा में दो सिंह लड़ते हों, जैसे वन में दो मतवाले हाथी जुझते हों, उसी प्रकार समरांगण में वे दोनों श्रीकृष्ण और शकुनि परस्पर युद्ध करने लगे। शकुनि ने श्रीकृष्ण को सौ योजन पीछे कर दिया और श्रीकृष्ण ने उसे भूतल पर सहस्त्र योजन पीछे ढकेल दिया। तब त्रिभुवन नाथ श्रीहरि ने उसे दोनों भुजाओं में पकड़कर जांघों के धक्के से जमीन पर वैसे ही पटक दिया हो। जैसे किसी बालक ने कमण्डलु फेंक दिया हो। इससे उस दैत्य को कुछ व्यथा हुई। फिर उस युद्धदुर्मद दुराचारी शकुनि ने जारुधि पर्वत को पकड़कर उसे श्रीकृष्ण पर चला दिया। पर्वत को अपने ऊपर आता देख कमल नयन भगवान श्रीकृष्ण ने पुन: उसे उसी की ओर लौटा दिया। इस प्रकार जय शब्द का उच्चारण करते हुए वे दोनों एक दूसरे पर उसी पर्वत के द्वारा प्रहार करते रहे। राजन् ! उस पर्वत के आघात से उन दोनों ने चन्द्रावतीपुरी को भी चूर्ण कर दिया। उस समय दैत्य शकुनि ने अत्यन्त कुपित हो ढाल तलवार उठा ली और महात्मा श्रीकृष्ण के सामने वह युद्ध के लिये आ गया। तब भगवान शांर्गधर ने अपना शांर्गधनुष लेकर उसके ऊपर सहसा अर्धचन्द्रमुख बाण का संधान किया, जो युद्धस्थल में ग्रीष्मऋतु के सूर्य के समान उद्भासित हो उठा। शांर्ग धनुष से छूटा हुआ वह दिव्य बाण दिड्मण्डल को विद्योतित करता हुआ शकुनि का मस्तक काटकर भूमि का भेदन करके तल लोक में चला गया। उस समय दैत्य शकुनि प्राण शून्य होकर युद्ध स्थल में गिर पड़ा। मिथिलेश्वर ! भूमि का स्पर्श होते ही वह क्षणभर में पुन: जीवित हो उठा। अपने कटे हुए मस्तक को अपने ही हाथ से धड़ पर रखकर वह युद्ध करने के लिये पुन: उठ खड़ा हुआ, वह अद्भुत सी घटना हुई।
इस प्रकार श्रीकृष्ण के हाथ से सात बार मारे जाने पर भी वह महान असुर भूमि के स्पर्श से जी उठा तथा राहु की भाँति फिर खड़ा हुआ। अब वह अकेले ही यादवकुल का संहार करने के लिये उद्यत हुआ। वन में दावानल की भाँति उस शक्तिशाली महादैत्य ने तत्काल यादव सेना में प्रवेश किया। उसने घोड़ों और अस्त्र-शस्त्रों सहित महावीर घुड़सवारों को तथा मदमत्त हाथियों को भुजाओं से पकड़कर आकाश में लाख योजन दूर फेंक दिया। किन्हीं हाथियों का मुँह, किन्हीं के दोनों कंधे तथा किन्हीं के दोनों कक्ष पकड़कर फेंकता हुआ वह दैत्य कालाग्नि रुद्र के समान जान पड़ता था।
उस दैत्य के दोनों पैरों और हाथों ने उस महासमर में जब भारी आतंक उत्पन्न कर दिया और महात्मा श्रीकृष्ण सेना में जोर से हाहाकार होने लगा, तब विश्वरक्षक साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने साधु पुरुषों की रक्षा के लिये अपने अस्त्र सुदर्शन चक्र प्रलयकाल के कोटि सूर्यों की दीप्तिमती प्रभा से प्रज्वलित हो उठा। उसने उस महायुद्ध में शकुनि के सुदृढ़ मस्तक को उसी तरह काट लिया, जैसे वज्र ने वृत्रासुर का मस्तक काटा था। तब तक भगवान श्रीकृष्ण ने महासमर में मरे हुए शकुनि को बलपूर्वक आकाश में फेंक दिया। फिर श्रीपति ने यादवों से कहा- 'तुम लोग इसके शरीर को बाणों से ऊपर ही ऊपर फेंकते रहो।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! श्रीहरि की ऐसी बात सुनकर समस्त यादव श्रेष्ठ वीर आकाश से गिरते हुए उस दैत्य को चमकीले बाणों से ताड़ित करने लगे। राजन् ! दीप्तिमान के बाणों से आहत हो वह दैत्य लोगों के देखते-देखते गेंद की भाँति सौ योजन ऊपर चला गया। फिर साम्ब के बाण का धक्का पाकर वह एक सहस्त्र योजन ऊपर चला गया। जब वह पुन: आकाश से नीचे गिरने लगा, तब अर्जुन ने अपने बाण से उस पर चोट की। उस बाण से वह दैत्यराज दस हजार योजन ऊपर चला गया। तदनन्तर जब वह नीचे आने लगा, तब अनिरुद्ध के बाण ने उसे लाख योजन ऊपर उछाल दिया। इसके बाद प्रद्युम्न के बाण से वह दस लाख योजन ऊपर उठ गया। तत्पश्चात् उसे पुन: आकाश से नीचे गिरते देख योगेश्वरेश्वर भगवान श्रीकृष्ण उस पर बाण मारा, जिससे वह कोटि योजन ऊपर चला गया। इस प्रकार दो पहर तक वह दैत्य आकाश में ही स्थित रह गया, उसे नीचे नहीं गिरने दिया।
तदनन्तर साक्षात श्रीहरि ने उसके ऊपर दूसरा बाण मारा। उस बाण ने सम्पूर्ण दिशाओं में उसको कोटि योजन तक घुमाकर समुद्र में वैसे ही ला पटका, जैसे हवा ने कमल के फूल को उड़ाकर नीचे डाल दिया हो। राजन् ! इस प्रकार जब उस दैत्य की मृत्यु हो गयी, तब उसके शरीर से एक प्रकाशमान ज्योति निकली और वह चारों ओर से परिक्रमा कदेर भगवान श्रीकृष्ण में विलीन हो गयी। उस समय भूतल और आकाश में जय जयकार होने लगी। विद्याधरियाँ और गन्धर्व कन्याएँ आनन्दमग्न हो आकाश में नृत्य करने लगीं, किंनर और गन्धर्व यश गाने लगे तथा सिद्ध और चारण स्तुति सुनाने लगे। समस्त ऋषियों और मुनियों ने श्रीहरि की पुरी-पुरी प्रशंसा की। ब्रह्म, रुद्र, इन्द्र और सूर्य आदि सब देवता वहाँ आ गये और श्रीकृष्ण के ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में 'शकुनि दैत्य का वध' नामक इकतालीसवां अध्याय पूरा हुआ।
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