07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 43 || इलावृत वर्ष में राजा शोभन से भेंट की प्राप्ति; स्वायम्भुव मनु की तपोभूमि में मूर्तिमती सिद्धियों का निवास; लीलावतीपुरी में अग्निदेव से उपायन की उपलब्धि; वेदनगर में मूर्तिमान वेद, राग, ताल, स्वर, ग्राम और नृत्य के भेदों का वर्णन
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 43 || इलावृत वर्ष में राजा शोभन से भेंट की प्राप्ति; स्वायम्भुव मनु की तपोभूमि में मूर्तिमती सिद्धियों का निवास; लीलावतीपुरी में अग्निदेव से उपायन की उपलब्धि; वेदनगर में मूर्तिमान वेद, राग, ताल, स्वर, ग्राम और नृत्य के भेदों का वर्णन
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार भद्राश्व वर्ष पर विजय पाकर श्री यादवेश्वर हरि यादव सैनिकों के साथ इलावृत वर्ष को गये। मिथिलेश्वर ! इलावृत वर्ष में ही रत्नमय शिखरों से सुशोभित, देवताओं का निवास स्थान, दीप्तिमान स्वर्णमय पर्वतगिरि राजाधिराज ‘सुमेरु’ है, जो भूमण्डरुपी कमल की कर्णिका के समान शोभा पाता है। उसके चारों ओर मन्दर, मेरु-मन्दर, सुपार्श्व तथा कुमुद- ये चार पर्वत शोभा पाते हैं। इन चारों से घिरा हुआ वह एक गिरिराज सुमेरु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चार पदार्थों से युक्त मनोरथ की भाँति शोभा पाता है। उस इलावृत वर्ष में जम्बूफल के रस से उत्पन्न होने वाला जाम्बूनद नामक स्वत: स्वर्ण उपलब्ध होता है। वहाँ जम्बूरस से ‘अरुणोदा’ नाम की नदी प्रकट हुई है, जिसका जल पीने से इस भूतल पर कोई रोग नहीं होता। राजन् ! वहाँ कदम्ब वृक्ष से उत्पन्न ‘कदम्ब’ नामक मधु की पाँच धाराएँ प्रवाहित होती हैं, जिनके पीने से मनुष्यों को कभी सर्दी-गरमी, विवर्णता (कान्ति का फीका पड़ना), थकावट तथा दुर्गन्ध आदि दोष नहीं प्राप्त होते। उन मधु-धाराओं से काम पूरक नद प्रकट हुए हैं, जो मनुष्यों की इच्छा के अनुसार रत्न, अन्न, वस्त्र, सुन्दर आभूषण, शय्या तथा आसन आदि जो-जो दिव्य फल हैं, उन सबको अर्पित करते हैं।
इस प्रकार वहाँ सुप्रसिद्ध ‘ऊर्ध्ववन’ है, जहाँ भगवान संकर्षण विराजते हैं, जिस वन में भगवन शिव स्वत: अपनी प्रेयसी ज्योतियों के साथ रमण करते हैं तथा जिसमें गये हुए पुरुष तत्काल स्त्री पुरुष में परिणत हो जाते हैं। स्वर्णमय कमल, शीतल वसन्त वायु, केसर के वृक्ष, लवंग लताओं के समूह तथा देववृक्षों की सुगन्ध के सेवन से मदान्ध भ्रमर- ये सब इलावृत वर्ष की अत्यन्त शोभा बढ़ाते हैं। वैदूर्यमणि के अकुंरों से विचित्र लगने वाली वहाँ की मनोहर स्वर्णमयी भूमि को देखते हुए भगवन श्रीहरि ने अलंकार मण्डित देवताओं से पूर्ण इलावृत वर्ष को जीतकर वहाँ से भेंट ग्रहण की। पूर्वकाल के सत्ययुग में राजा मुचुकुन्द के जामाता शोभन ने भारतवर्ष में एकादशी का व्रत करके जो पुण्य अर्जन किया, उसके फलस्वरूप देवताओं ने उन्हें मन्दराचल पर निवास दे दिया। आज भी वह राजकुमार कुबेर की भाँति रानी चन्द्राभागा के साथ वहाँ राज्य करता है। मिथिलेश्वर ! वह परम सुन्दर शोभन भेंट लेकर देवप्रवर भगवान श्रीकृष्ण के सामने आया। यदुकुलतिलक श्रीहरि की परिक्रमा करके शोभन उनके चरणारविन्दों में पड़ गया और भक्तिपूर्वक प्रणाम करके, उन परमात्मा को शीघ्र ही भेंट देकर पुन: मन्दराचल को चला गया।
बहुलाश्व ने पूछा- देवर्षि प्रवर ! राजा शोभन के चले जाने पर भगवान मधुसूदन ने आगे कौन सा कार्य किया, यह बतलाइये।
श्रीनारदजी ने कहा- राजन् ! उस मन्दराचल के शिखर पर एक परम दिव्य सरोवर है, उसमें स्वर्णमय कमल खिलते हैं। यह देखकर किरीटधारी अर्जुन ने माधव श्रीकृष्ण से पूछा- ‘देवकीनन्दन ! सुवर्णमयी लताओं और स्वर्णमयी कमलों से व्याप्त यह अद्भुत कुण्ड किसका है मुझे बताइये।
श्रीभगवान ने कहा- स्वायम्भुव मनु के कुल में उत्पन्न आदि राजाधिराज पृथु ने यहाँ दिव्य तप किया था। उन्हीं का यह अद्भुत दिव्य कुण्ड है। पार्थ ! इसका जल पीकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है तथा इसमें स्न्नान करके नरेतर प्राणी भी मेरे परम धाम में पहुँच जाता है।
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! यहीं साक्षात भगवान ने एक तपोभूमि में पदार्पण किया, जहाँ सदा आठों सिद्धियाँ मूर्तिमती होकर नृत्य करती हैं। उन सिद्धियों को देखकर उद्धव ने सनातन भगवान से पूछा।
उद्धव बोले- भगवन् ! मन्दराचल के समीप यह किसकी तपोभूमि है प्रभो ! यहाँ कौनसी स्त्रियाँ मूर्तिमति होकर विराज रही हैं- कृपया यह बतायें।
श्रीभगवान ने कहा- उद्धव ! यहाँ पूर्वकाल में स्वायम्भुव मनु ने तपस्या की थी। उन्हीं की यह सुन्दर तपोभूमि है, जो आज भी परम कल्याण कारिणी है। यहीं नारीरूप धारिणी आठ सिद्धियाँ सदा विद्यमान रहती हैं। यहाँ जो कोई भी आ जाय, उसे भी आठों सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यहाँ एक क्षण भी तपस्या करके मानव देवत्व प्राप्त कर लेता है। चतुर्मुख ब्रह्म भी इस तपोभूमि के माहात्म्य का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं।
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन् ! यों कहकर भगवान श्रीकृष्ण अपनी सेना से घिरे हुए और बारंबार दुन्दुभि बजवाते हुए उन अत्यन्त उत्कट प्रदेशों में गये, जहाँ लीलावती नाम की एक स्वर्णमयी नगरी है। उस लीलावती के स्वामी साक्षात वीतिहोत्र नामधारी अग्नि हैं, जो उत्तम व्रत का पालन करते हुए नित्य मूर्तिमान होकर राज्य करते हैं। उन धनंजय देव ने भी परम पुरुष परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र को भेंट देकर उनकी उत्तम स्तुति की। इस प्रकार सारे इलावृतवर्ष का दर्शन करते हुए देवाधिदेव भगवान श्रीकृष्ण वेदनगर में गये, जो जम्बूद्विप एक मनोरम स्थान है। उस नगर में भगवान निगम (वेद) सदा मूर्तिमान होकर दिखायी देते हैं।
उनकी सभा में सदा वीणा पुस्तक धारिणी वाग्देवता वाणी (सरस्वती) सुन्दर एवं मंगल के अधिष्ठानभुत श्रीकृष्ण चरित का गान करती है। नरेश्वर ! उर्वशी और विप्रचिति आदि अप्सराएँ वहाँ नृत्य करती हैं और अपने हावभाव ताथ कटाक्षों द्वारा वेदेश्चर को रिझाती रहती हैं। मैं, विश्वावसु, तुम्बुरु, सुदर्शन तथा चित्ररथ- ये सब लोग वेणु, वीणा, मृदंग मुरुयष्टि आदि वाद्यों को खड़ताल एवं दुन्दुभि के साथ विधिवत बजाया करते हैं। नरेश्वर ! वहाँ हस्व, दीर्घ, प्लुत, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा सानु नासिक और निरनु नासिक- इस अठारह[1] भेदों के साथ स्तुतियाँ गायी जाती हैं। नरेश्वर ! वेदपुर में आठों ताल, सातों स्वर और तीनों ग्राम मूर्तिमान होकर विराजते हैं।
वेदनगर में राग-रागिनियाँ भी मूर्तिमती होकर निवास करती हैं। भैरव, मेघमल्लार, दीपक, मालकोश, श्री राग और हिन्दोल- ये सब राग बताये गये हैं। इनकी पाँच-पाँच स्त्रियाँ- रागिनियाँ हैं और आठ-आठ पुत्र हैं। नरेश्वर ! वे सब वहाँ मूर्तिमान होकर विचरते हैं। ‘भैरव’ भूरे रंग का है, ‘मालकोश’ का रंग तोते के समान हरा है, ‘मेघमल्लार’ की कान्ति मोर के समान है। ‘दीपक’ का रंग सुवर्ण के समान है और ‘श्रीराग’ अरुण रंग का है। मिथिलेश्वर ! ‘हिन्दोल’ का रंग दिव्य हंस के समान शोभा पाता है।
बहुलाश्व ने पूछा- मुनिश्रेष्ठ ताल, स्वर, ग्राम और नृत्य’ इनके कितने कितने भेद हैं इन सब का नामोल्लेख पूर्वक वर्णन कीजिये ।
नारदजी ने कहा- राजन् ! रूपक, चर्चरीक, परमठ, विराट, कमठ, मल्लक, झटित और जुटा- ये आठ ताल हैं। राजन् ! निषाद, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, मध्यम, धैवत तथा पच्चम- ये सात स्वर कहे गये हैं। माधुर्य, गान्धार और ध्रौव्य- ये सात स्वर कहे गये हैं। माधुर्य, गान्धार और ध्रौव्य– ये तीन ग्राम माने गये हैं। रास, ताण्डव, नाट्य, गान्धर्व, कैंनर, वैद्याधर, गौहाक और आप्सरस-ये आठ नृत्य के भेद हैं। ये सभी दस-दस हाव भाव और अनुभावों से युक्त हैं। स्वरों का बोध कराने वाला पद ‘सा रे ग म प ध नि’- और क्या सुनना चाहते हो।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘वेद नगर का वर्णन’ नामक तैंतालीसवां अध्याय पूरा हुआ।
[1] अ इ उ ऋ' इन स्वरों में सें प्रत्येक के ह्र्स्व, दीर्घ और प्लुप- ये तीन-तीन भेंद होते है; फिर प्रत्येक के उदात्त अनुदात्त तथा स्वरित- ये तीन भेंद होने से नौ भेद हुए। फिर उन सबके सानुनासिक और निरनुनासिक भेंद होने से अठारह भेंद होते हैं।
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