07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 44 || रागिनियों तथा राग पुत्रों के नाम और वेद आदि के द्वारा भगवान का स्तवन
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 44 || रागिनियों तथा राग पुत्रों के नाम और वेद आदि के द्वारा भगवान का स्तवन
बहुलाश्व ने पूछा- देवर्षे ! रागिनियों और रागपुत्रों के नाम मुझे बताइये; क्योंकि परावरवेत्ता विद्वानों में आप सबसे श्रेष्ठ हैं।
नारदजी ने कहा- राजन् ! कालभेद, देशभेद और स्वरमिश्रित क्रिया के भेद से विद्वानों ने गीत के छप्पन करोड़ भेद बताये हैं। नृपेश्वर ! इन सब के अन्तर्भेद तो अन्नत हैं। नृपेश्वर ! इन सब के अन्तर्भेद तो अनन्त हैं। आनन्द स्वरूप जो शब्द ब्रह्ममय श्रीहरि हैं, इन्हीं को तुम-राग समझो। इसलिये भूतल पर इन सबके जो मुख्य–मुख्य भेद हैं, उन्हीं का मैं तुम्हारे सामने वर्णन करूँगा।
भैरवी, पिंगला, शंकी, लीलावती और आगरी- ये भैरवराग की पाँच रागिनियाँ बतलायी गयी हैं। महर्षि, समृद्ध, पिंगला, मागध, बिलाबल, वैशाख, ललित और पंचम- ये भैरव राग के भिन्न-भिन्न आठ पुत्र बतलाये गये हैं। मिथिलेश्वर ! चित्रा, जय जयवन्ती, विचित्रा, व्रजमल्लारी, अन्धकारी- ये मेघमल्लार राग की पाँच मनोहारिणी रागिनियाँ कही गयी हैं। श्यामकार, सोरठ, नट, उड्डायन, केदार, व्रजरहस्य, जल धार और विहाग- ये मल्लारराग के आठ पुत्र प्राचीन विद्वानों ने बताये हैं। कज्जु की, मंचरी, टोडी, गुर्जरी और शाबरी- ये दीपक राग की पाँच रागिनियाँ विख्यात हैं।
विदेहराज ! कल्याण, शुभकाम, गौड़ कल्याण, कामरूप, कान्हरा, राम संजीवन, सुखनामा और मन्दहास- ये विद्वानों द्वारा दीपक राग के आठ पुत्र कहे गये हैं। मिथिलेश्वर ! गान्धारी, वेद गान्धारी, धनाश्री, स्वर्मणि तथा गुणागरी ये पांच रागमण्डल में मालकोशराग की रागिनियाँ कही गयी हैं। मेघ, मचल, मारु माचार, कौशिक, चन्द्रहार, घुंघट, विहार तथा नन्द- ये मालकोश राग के आठ पुत्र बतलाये गये हैं।
राजेन्द्र ! बैराटी, कर्णाटी, गौरी, गौरावटी तथा चतुश्चन्द्र काला- ये पुरातन पण्डितों द्वारा कही गयी श्रीराग की विख्यात पाँच रागिनियाँ हैं। महाराज ! सारंग, सागर, गौर, मरुत, पंचशर, गोविन्द, हमीर तथा गीर्भीर- ये श्रीराग के आठ मनोहर पुत्र हैं। वसन्ती, परजा, हेरी, तैलग्ड़ी और सुन्दरी ये हिन्दोल राग की पांच रागिनियाँ प्रसिद्ध हैं। मैथिलेन्द्र ! मंगल, वसन्त, विनोद, कुमुद, वीहित, विभास, स्वर तथा मण्डल विद्वानों द्वारा ये आठ हिन्दोल राग के पुत्र कहे गये हैं।
बहुलाश्व ने पूछा- शब्द ब्रह्मरूप श्रीहरि के साक्षात स्वरूप महात्मा निगम (भेद्) के, जो रागमण्डल में हिन्दोल के नाम से विख्यात हैं, पृथक-पृथक अंग इस भूतल पर कौन-कौन से हैं यह मुझे बताइये।
श्रीनारदजी ने कहा- राजन् ! वेदस्वरूप श्रीहरि का मुख ‘व्याकरण’ कहा गया है, पिंगल कथित ‘छन्द:शास्त्र’ उनका पैर बताया जाता है, ‘मीमांसाशास्त्र’ (कर्मकाण्ड) हाथ है, ‘ज्योतिष शास्त्र’ को नेत्र बताया गया है। ‘आयुर्वेद’ पृष्ठ देश, ‘धनुर्वेद’ वक्ष:स्थल, ‘गान्धर्ववेद’ रसना और ‘वैशेषिक शास्त्र’ मन है। सांख्य बुद्धि, न्यायवाद अहंकार और वेदान्त महात्मा वेद का चित्त है। मिथिलेश्वर ! रागरूप जो शास्त्र है, उसे वेदराज का विहार स्थल समझो। राजन् ! ये सब बातें तुम्हें बतायीं। अब और क्या सुनना चाहते हो।
देवर्षे ! उस वेदपुर में जाकर साक्षात श्रीहरि ने क्या किया, यह मुझे बताइये; क्योंकि आप साक्षात् दिव्यदर्शी हैं ।
श्रीनारदजी ने कहा- राजन् ! यादवेश्वर श्रीकृष्ण जब वेदपुरी में आये, तब निगम (वेद) भी सरस्वती के साथ भेंट लेकर आये। गन्धर्व, अप्सरा, ग्राम, ताल, स्वर तथा भेदों सहित राग भी उनके साथ थे। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम किया। देवताओं के भी देवता साक्षात भगवान जनार्दन वेद पर प्रसन्न हो समस्त यादवों के समक्ष उन से बोले।
श्रीभगवान ने कहा- निगम ! तुम्हारे मन में जो इच्छा हो, उसके अनुसार कोई वर मांगो। मेरे प्रसन्न होने पर तीनों लोकों में भक्तों के लिये कौन सी वस्तु दुर्लभ है।
वेद बोले- देव ! परमेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं तो यहाँ मेरे जो ये उत्तम पार्षद हैं, उन सबको अपने दिव्य रूप का दर्शन कराइये। अत्यन्त उदीप्त तेज वाले अपने निजधाम गोलोक में आपका जो स्वरूप है तथा वृन्दावन में और वहाँ के रासमण्डल में आपका जो रूप प्रकट होता है, उसी का ये सब लोग दर्शन करना चाहते हैं।
श्रीनारदजी कहते हैं- मैथिलेश्वर ! वेद का कथन सुनकर साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीराधा के साथ अपने परम दिव्य रूप का उन्हें दर्शन कराया। उस अनुपम सुन्दर रूप को देखकर सब लोग मूर्च्छित हो गये। अपना शरीर तथा सुख भुलाकर वे सभी सात्त्विक भावों से पूरित हो गये। राजन् ! उस समय अत्यन्त हर्ष से उत्फुल्ल हो वे वाद्यों के मधुर शब्दों के साथ सत्पुरुषों के देखते-देखते भगवान के समक्ष नाचने और गान करने लगे। मैथिलेश्वर ! भगवान का माधुर्यमय अद्भुत रूप जैसा सुना गया था, वैसा ही देखा गया और उसी प्रकार वेद आदि ने (उसका नीचे दिये शब्दों में) वर्णन किया।
वेद ने कहा- देव ! आप सत्स्वरूप, ज्ञानमात्र, सत्-असत् से परे, व्यापक, सनातन, प्रशान्तरूप, विभवात्मक, सम, महत्, प्रकाशरूप, परम दुर्गम, परात्पर तथा अपने धाम (चिन्मय प्रकाश) द्वारा भ्रम एवं अज्ञान के अन्धकार को निरस्त करने वाले ‘ब्रह्म’ है; आपको मैं प्रणाम करता हूँ [1]।
सरस्वती बोलीं- भगवन् ! योगीलोग आपको परम ज्योति:स्वरूप जानते हैं, वहीं भक्तजन आपको चिन्मय विग्रह से युक्त बताते हैं। इस समय जो आपके चरणारविन्द युगल देखे गये हैं, वे समस्त ज्योतियों के अधीश्वर हैं। वे सदा मेरे लिये कल्याणकारी हों[2]
गन्धर्व बोले- प्रभो ! श्याम और गौर तेज के रूप में अपने ही प्रकाश से प्रकाशित जो आपका तेजोमय स्वरूप है, वह आपने अपनी इच्छा से प्रकट किया है। उन्हीं युगल धामों (स्वरूपों) से आप नित्य उसी प्रकार पूर्णतया विराजित रहते हैं, जैसे मेघ श्याम वर्ण तथा बिजली से शोभा पाता है[3]।
अप्सराओं ने कहा- जैसे तमाल सुवर्णमयी लता से, मेघ विद्युन्माला से तथा जैसे नील गिरिराज सोने की खान से सुशोभित होता है, उसी प्रकार आप आदि पुरुष श्याम सुन्दर अपनी प्रेयसी श्रीराधा रानी के नित्य साहचर्य से शोभा पाते हैं[4] ।
तीनों ग्राम बोले- जिनके चरणार विन्दों के पावन पराग को शिव, रमा (लक्ष्मी), ज्ञानी पुरुष तथा देवताओं सहित श्रीराधा अपने चित्त में धारण करना चाहती हैं, माधव के उन चरण-कमलों का सदा भजन करो[5]
तालों ने कहा- जिनके कारण राजा बलि सत्स्वरूप होकर प्रतिष्ठित हुए, उन्हीं भगवान को बलि अर्पित करनी चाहिये। अपने संतप्त चित्तरुपी गुफा में श्री हरि के उस चरण को ही प्रतिष्ठित करके उसकी सेवा करो[6]।
गान (लय) बोले- संतजन जिनकी शरण लेकर दु:ख शोक को निकाल फेंकते हैं, श्रीराधा माधव उन दिव्य चरण कमलों को हम सदा हृदय में धारण करें[7]
स्वर बोले- जो शरद्-ऋतु के प्रफुल्ल पंकज की शोभा अत्यन्त तिरस्कृत कर देते हैं, मुनिरुपी भ्रमर जिनका आस्वादन करते हैं, जो व्रज, कमल और शंख आदि के चिह्नों से सुशोभित हैं, जिन पर सोने के नूपुर चमक रहे हैं तथा जिन्होंने भक्तों के त्रिविध तापों का उन्मूलन कर दिया है, श्री राधावल्लभ के उन चंचल द्युतिशाली युगल चरणारविन्दों को मैं हृदय में धारण करता हूँ [8]
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘वेदादि के द्वारा की गयी स्तुति का वर्णन’ नामक चौवालीसवां अध्याय पूरा हुआ।
1.सज्ज्ञानमात्रं सदसत्परं बृहच्छश्वत् प्रशान्तं विभवं समं महत्।
त्वां ब्रह्म वन्दे वसु दुर्गमं परं सदा स्वधाम्ना परिभूतकैतवम् ।।
2. मह: परं त्वां किल योगिनो विदु: सविग्रहं तत्र वदन्ति सात्तवता: ।
दृष्टं तु यत्ते पदयोर्द्वयं मे क्षेमाय भूयान्महसामधीश्वरम् ।।
3. श्यामं च गौरं विदितं स्वधाम्ना कृतं त्वया धाम निजेच्छया हि ।
विराजसे नित्यमलं च ताभ्यां घनों यथा मेचकदामिनीभ्याम् ।।
4. यथा तमाल: कलधौतवल्लया घनो यथा चंचलया चकास्ति ।
नीलोऽद्रिराजो निकपाश्मखन्या श्रीराधेयाऽऽद्युस्तु तथा रमण्या ।।
5. यस्य पदस्य परागं शम्भुरमाकविदेवै: इच्छति चेतसि राधा तं भज माधवपादम् ।।
येन बलि: सद्विहरेत्तद्वलिमेव हरेत। तं भज पादं तु हरेश्चेतसि तप्ते कुहरे ।।
6. येन बलि: सद्विहरेत्तद्वलिमेव हरेत। तं भज पादं तु हरेचश्तसि तप्ते कुहरे ।।
7. उत्क्षिपन्ति बहिर्दु:खं सन्तो यच्दरणं गता:। राधामाधवयोर्दिव्यं दधान पदपंकजम्
8. शरदविकचपंकजश्रियमतीव विद्वेषकं मिलिन्दमुनिलेहितं कुलिशकंजचिह्नावृतम् ।।
स्फरत्कनकनूपुरं दलितभक्ततापत्रयं चलद्द्युति पदद्वयं हृदि दधामि राधापते: ।।-(गर्ग0 विश्वजित0 44। 39-46)
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