07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 46 || यादवों और गन्धर्वों का युद्ध, बलभद्रजी का प्राकट्य, उनके द्वारा गन्धर्व सेना का संहार, गन्धर्वराज की पराजय, वसन्तमालती नगरी का हल द्वारा कर्षण; गन्धर्वराज का भेंट लेकर शरण में आना और उन पर बलरामजी की कृपा
07. विश्वजित खण्ड || अध्याय 46 || यादवों और गन्धर्वों का युद्ध, बलभद्रजी का प्राकट्य, उनके द्वारा गन्धर्व सेना का संहार, गन्धर्वराज की पराजय, वसन्तमालती नगरी का हल द्वारा कर्षण; गन्धर्वराज का भेंट लेकर शरण में आना और उन पर बलरामजी की कृपा
नारदजी कहते हैं- राजन् ! भगवान श्रीकृष्ण के द्वारकापुरी को चले जाने पर प्रद्युम्न अपने सैनिकों के साथ कामदुघनद के समीप गये। वहाँ गन्धर्वों की मनोहारिणी हेमरत्नमयी वसन्त मालती नाम की नगरी है, जिसका विस्तार सौ योजन का है। लवंग लताओं के समूह, इलायची, केसर, जायफल, जावित्री, श्रीखण्ड चन्दन और पारिजात के वृक्ष उस पुरी की शोभा बढ़ाते थे। मतवाले भ्रमरों के गज्जारव से निनादित, विचित्र पक्षियों के कलरव से मुखरित तथा गन्धर्वों से सुशोभित वह नगरी नागों से युक्त भोगवतीपुरी के समान शोभा पाती थी। वहीं पतंग नाम से प्रसिद्ध महाबली गन्धर्वराज राज्य करते थे, जो बड़े पुण्यात्मा थे और जिनका बल-पौरुष देवराज इन्द्र के समान था।
उन्होंने सुना कि दिग्विजय के लिये निकले हुए प्रद्युम्न आ रहे हैं, तब उन गन्धर्वराज ने उद्भट गन्धर्वों से युक्त होकर युद्ध करने का निश्चय किया। रथ, घोड़े, हाथी और पैदल दस करोड़ गन्धर्वों के साथ राजा पतंग प्रद्युम्न के सामने युद्ध के लिये आये। गन्धर्वों और यादवों में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। भालों, गदाओं, परिघों, मुद्ररों, तोमरों तथा ऋष्टियों की मार होने लगी। बाणों से अन्धकार फैल जाने पर अतिरथी बलवान वीर पतंग धनुष को टंकारते हुए आगे बढ़े और मेघ के समान गर्जना करने लगे। बलदेवजी के बलवान अनुज गद ने गदा लेकर गन्धर्वों की सेना को वैसे ही धराशायी करना आरम्भ किया, जैसे देवराज इन्द्र वज्र से पर्वतों को ढहा देते हैं। गद की गदा के प्रहार से कितने ही गन्धर्व युद्धभूमि में गिर गये, उनके रथ चूर-चूर हो गये और समस्त हाथियों के कुम्भस्थल फट गये। कितने ही घुड़सवार वीर भी युद्ध के मुहाने पर प्राण शून्य होकर पड़ गये। भुजाएं कट जाने से कितने ही गन्धर्व उत्तान मुख और औंधे मुख पड़े दिखायी देते थे। क्षणमात्र में गन्धर्वों की सेना में खून की नदी बह चली। प्रमथगण भगवान रुद्र की मुण्डमाला बनाने के लिये युद्धभूमि में नरमुण्डों का संग्रह करने लगे। सिंह पर चढ़ी हुई भद्रकाली सैकड़ों डाकिनियों के साथ युद्धभूमि में आकर खप्पर में खून भर-भरकर पीती दिखायी देने लगीं।
इस तरह गद के द्वारा किये गये युद्ध में जब गन्धर्व गण पलायन करने लगे, तब गंधर्वों के राजा पतंग एक लाख गज सेना के साथ वहाँ आ पहुँचे। मिथिलेश्वर ! पतंग ने आते ही गद की छाती में गदा मारी। गद ने भी अपनी गदा से पतंग के वक्ष पर बलपूर्वक चोट पहुँचायी। उन दोनों में दो घड़ी तक गदा युद्ध चलता रहा। उनकी दोनों गदाएँ आग की चिनगारियाँ बिखेरती हुई चूर-चूर हो गयीं। रणदुर्मद पतंग ने लाख भार की भारी गदा लेकर तुरंत ही गद के मस्तक पर मारी। गदा के उस प्रहार से गद क्षणभर के लिये मूर्च्छित हो गये। इस प्रकार महामना पतंग ने जब घोर युद्ध किया, तब उसी समय द्वारकापुरी से एक तेजपुंज आ पहुँचा। समस्त यादवों ने करोड़ों सूर्यों के तुल्य तेजस्वी उस तेजपुंज को देखा। उसके भीतर से गोरे अंग वाले महाबली भक्तवत्सल भगवान बलदेव सहसा प्रकट हो गये। नीलाम्बधारी बलशाली बलराम ने कुपित हो गन्धर्वों की सारी सेना को हल से खींचकर मुसल से मारना आरम्भ किया। बहुत से रथों, हाथियों और घोड़ों उन्होंने काल के गाल में पहुँचा दिया। शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वीर सब के सब चूर चूर हुए पत्थरों की भाँति एक साथ ही भूतल पर बिखर गये। पतंग भी रथहीन हो भारी भय के कारण वहाँ से वसन्त मालतीपुरी में चले गये और पुन: यादवों युद्ध करने के लिये सेना का व्यूह बनाने लगे। नरेश्वर ! सौ योजन विस्तृत गन्धर्वों की सम्पूर्ण वसन्त मालती नाम की महापुरी को हल से उपाटकर कुपित हुए बलदेवजी ने कामदुघनद में गिराने के लिये खींचा। उस नगरी के भवन धड़ाधड़ धराशायी होने लगे। फिर तो तत्काल वहाँ हाहाकार मच गया।
अपनी नगरी को टेढ़ी या करवट लेती हुई नौका की भाँति डगमगाती देख पतंग सर्वथा पराभूत हो, तत्काल समस्त गन्धर्वों के साथ हाथ जोड़, भेंट सामग्री के साथ वहाँ आ पहुँचा। उसने दो लाख ऐसे विमान बलदेवजी को भेंट किये, जो सुवर्ण के समान कान्ति वाले तथा विविध रत्नों जटित थे। मोती की बंदनवारें उनकी शोभा बढ़ाती थीं। विश्वकर्मा ने उन विमानों को दस-दस योजन विस्तृत बनाया था। वे सभी विमान इच्छानुसार चलने वाले तथा कोटि-कोटि कलशों एवं पताकाओं से सुशोभित थे। उनसे सहस्त्रों सूर्यों के समान प्रकाश फैल रहा था। चार लाख गौएँ, दस अरब घोड़े इलाइची, लवंग, केसर और जायफलों के साथ दिव्य अमृतफलों से भरे करोड़ों पात्र उपहार के रूप में लाकर उन्होंने दिये। फिर वे नमस्कार करके तिरस्कृत की भाँति हाथ जोड़कर बलरामजी से बोले, उन्हें बलभद्रजी के प्रभाव का पूरा परिचय मिल गया था।
पतंग ने कहा- राम ! महापराक्रमी बलराम मैंने आपके पराक्रम को पहले नहीं जाना था, इसलिये अपराध कर बैठा। जिनके एक फन पर सारा भूमण्डल तिल के समान दिखायी देता है, उनके सामने कौन ठहर सकता है। भगवन् ! कामपाल ! देवाधिदेव ! आपको नमस्कार है। साक्षात अनन्त एवं शेषस्वरूप आप बलराम को बारंबार प्रणाम है। अच्युतदेव ! आपकी जय हो, जय हो। परात्पर ! साक्षात् अनन्त ! आपकी कीर्ति दिगन्त तक फैली हुई है। आप समस्त देवताओं, मुनीन्द्रों और फणीन्द्रों से श्रेष्ठ हैं। मुसलीधारी ! आप बलवान हलधर को नमस्कार है[1]।
नारदजी कहते हैं- राजन् ! पतंग के इस प्रकार स्तुति करने पर महाबली बलभद्रजी का चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने गन्धर्व को ‘अब तुम मत डरो’- यों कहकर अभयदान दिया। तदनन्तर यादवेश्वर बलदेव अपने चरणों में पड़े हुए प्रद्युम्न को सेना के संचालक पद पर स्थापित करके, यादवों से प्रशंसित हो शीघ्र ही द्वारकापुरी को चले गये।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्ड के अन्तर्गत नारद-बहुलाश्व संवाद में वसन्त मालती नगरी का कर्षण नामक छियालीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
1. जय जयाच्युत देव परात्पर स्वयमनन्त दिगन्तगतश्रुते। सुरमुनीन्द्रफणीन्द्रवराय ते मुसलिने बलिने हलिने नम:।।-(गर्ग0 विश्वजित0 46-34)
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