07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 48 || शक्रसख का प्रद्युम्न को भेंट अर्पण, प्रद्युम्न का लीलावतीपुरी के स्‍वयंवर में सुन्‍दरी को प्राप्‍त करना तथा इलावृत वर्ष से लौटकर भारत एवं द्वारकापुरी में आना

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 48 || शक्रसख का प्रद्युम्न को भेंट अर्पण, प्रद्युम्न का लीलावतीपुरी के स्‍वयंवर में सुन्‍दरी को प्राप्‍त करना तथा इलावृत वर्ष से लौटकर भारत एवं द्वारकापुरी में आना

श्रीनारदजी कहते है- राजन् ! अपने नगर में गिरकर शक्रसख अत्‍यन्‍त मूर्च्छित हो गया। फिर उस मूर्च्‍छा से वह उठा। उठने पर भी एक क्षण तक उसे बड़ी घबराहट रही। 
तदनन्‍तर श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न को परब्रह्म जानकर शक्रसख बड़ी उतावली के साथ अपनी भेंट-सामग्री लेकर यादव सेना के समीप गया। ऐरावतकुल में उत्‍पन्न हुए तीन सूँड़ और चार दांत वाले श्वेत रंग के एक हजार मदवर्षी हाथी, सुवर्ण गिरि पर उत्‍पन्न हुए दो योजन विस्‍तृत शरीर वाले दिग्‍गजों के समान उन्‍मत्त पर्वताकार एक करोड़ हाथी, जिनके मुख दिव्‍य थे और जिनकी गति भी दिव्‍य थी, करोड़ों की संख्‍या में उपस्थित किये गये। राजन् ! इन सबके साथ सोने के बने हुए उत्तम दिव्‍य रथ भी थे, जिनकी संख्‍या सौ अरब थी। दस हजार विमान भेंट के लिये लाये गये, जो दो-दो योजन विस्‍तार से सुशोभित थे।
दस लाख कामधेनु गौएँ और एक हजार पारिजात वृक्ष प्रस्‍तुत किये गये। तड़ागों में परिपुष्‍ट हुए सीप के मोती, जो यन्‍त्र पर चढ़ाकर चमकाये गये थे तथा चमेली के इत्र से आर्द्र से, शिरीष कुसुमों से सज्जित तथा दूध के फेन की तरह सफेद करोड़ों शय्याएँ लायी गयीं, जिन पर सुन्‍दर तकिये भी रखे गये थे। विचित्र वितान (चंदोवे) और दीवारों पर लगाये जाने वाले वस्‍त्र करोड़ों की संख्‍या में भेंट किये गये। छूने में कोमल एवं चितकबरे आसन तथा विश्वकर्मा द्वारा रचित बड़े-बड़े तकिये दिये गये, जो मोतियों के गुच्‍छों और सुवर्ण रत्न आदि के द्वारा खचित थे। वे सब सहस्‍त्रों संख्‍या में थे। हजारों परदे, करोड़ों पालकियाँ, छत्र, चंवर और दिव्‍य सिंहासनों के साथ करोड़ों व्‍यजन, जो राजलक्ष्‍मी के भूषण थे, प्रस्‍तुत किये गये। कोटि द्रोण अमृत, सुधर्मा सभा, सर्वतो भद्रमण्‍डल, सहस्‍त्र दल कमल, हीरे, पन्ने और मोती दिये गये। कोटि भार गोमेद और नीलम दिये गये, सहस्‍त्रों भार सूर्यकान्‍त, चन्‍द्रकान्‍त और वैदूर्य मणियों के थे। कोटि भार स्‍यमन्‍तक मणियों के लाये गये थे। नरेश्वर ! पद्वाराग मणि के भारों की संख्‍या एक अरब थी। जाम्‍बूनद सुवर्ण, हाटक सुवर्ण तथा सुवर्णगिरि से प्राप्‍त सुवर्णां के भी कोटि-कोटि भार प्रस्‍तुत किये गये।
मैथिलेश्वर ! आठ लोकपालों के आधिपत्‍य की रक्षा करने वाला शक्रसख अपना राज्‍य तथा देवताओं की सम्‍पूर्ण निधियों को भेंट के लिये लेकर उद्धवजी के साथ यादव सेना के पास गया और कुशलता के लिये वह अद्भुत भेंट अर्पित करके उसने प्रद्युम्न को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। शम्‍बर शत्रु प्रद्युम्न ने संतुष्‍ट होकर उसे रत्नमाला अर्पित की और उस राज्‍य पर उसी को पुन: स्‍थापित कर दिया। राजन् ! सत्‍पुरुषों का ऐसा ही स्‍वभाव होता है।
इस प्रकार जिसने प्रद्युम्न को भेंट दी थी, उस शक्रसख को जीतकर वे सेना सहित आगे गये। अब उनके सैनिकों की छावनी अरुणोदा नदी के तट पर पड़ी। महामूल्‍य रत्नों से जटित चँदोवे सौ योजन तक तन गये। वहाँ दिव्‍य पताकाएँ फहराने लगीं और वहाँ की भूमि पर विजय-ध्‍वज की स्‍थापना हो गयी। उन ध्‍वजा-पताकाओं के कारण वह शिविर समूह उत्ताल तरंगों से युक्त महासागर की भाँति शोभा पाने लगा।

राजन् ! इसी समय आकाश से ऐरावत पर चढ़े हुए देवराज इन्‍द्र सहसा सेना सहित वहाँ उतर आये। देवताओं की दुन्‍दुभियाँ भी उनके साथ-साथ बजती आयीं। यह देख सम्‍पूर्ण यादव-वीरों ने बड़े वेग से अपने अस्‍त्र-शस्‍त्र उठा लिये। पुन: देवराज इन्‍द्र को पहचानकर समस्‍त नरेश बड़े प्रसन्न हुए। उस समय इन्‍द्र ने भरी सभा में प्रद्युम्न से कहा- ‘महाबाहु नरेश ! तुम परावरवेत्ताओं में श्रेष्‍ठ हो, अत: मेरी बात सुनो। सुवर्ण गिरि के शिखरों पर लीलावती नाम से प्रसिद्ध एक सुन्‍दरपुरी है। वहाँ विद्याधरों के राजा सुकृति राज्‍य करते हैं। उनकी एक सुन्‍दरी नाम वाली कन्‍या है, जो सौ चन्‍द्रमाओं के समान रूप-लावण्‍य से सुशोभित और परम सुन्‍दरी है। राजन् ! उसके स्‍वयंवर में समस्‍त लोकपाल और देवता दिव्‍य रूप धारण करके आये है; किंतु वह राज कन्‍या कहती है कि ‘जिसको देखकर मैं मूर्च्छित हो जाऊँगी, वही मेरा पति होगा। यह बात कहकर वह सुन्‍दर वर पाने की इच्‍छा रखती है। तुम उस उत्‍सव में भी अपने समस्‍त भाइयों के साथ सहसा चलो और देववृन्‍द से मण्डित उस सुन्‍दर स्‍वयंवर को देखो।

नारदजी कहते हैं- राजन् ! यह सुनकर भगवान प्रद्युम्न अपने यदुवंशी भाइयों सहित देवेन्‍द्र के साथ सहसा लीलावतीपुरी में गये। जहाँ स्‍वयंवर हो रहा था, वहाँ का प्रांगण बड़ा विशाल था। जड़े गये रत्नों के कारण उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी। उस स्‍थान पर चन्‍दन, अगर, कस्‍तुरी और केसर के द्रव का छिड़काव किया गया था। मोती की बंदनवारों, बहुमूल्‍य वितानों और जाम्‍बूनद सुवर्ण के आसनों से वह स्‍वयंवर भवन साक्षात दूसरे इन्‍द्रलोक सा शोभा पाता था।
नरेश्वर ! प्रद्युम्न उस स्‍वयंवर में गये और सिंह जैसे किसी पर्वत के शिखर पर बैठता है, उसी प्रकार स‍ब के देखते-देखते एक दिव्‍य आसन पर विराजमान हुए। मैथिल ! वहाँ जितने प्रजापति, मुनि, देवता, रुद्रगण, मरुद्रण, आदित्‍यगण, वसुगण, अग्न‍ि, दोनों अश्विनी कुमार, यम, वरुण, सोम, कुबेर, इन्‍द्र, सिद्ध, विद्याधर, गन्‍धर्व, किंनर तथा अन्‍यान्‍य सभी समागत एवं रत्नाभरणों से विभूषित देव थे, उन्‍होंने प्रद्युम्न को आया देख अपने विवाह की आशा छोड़ दी। 
इसी समय सुन्‍दरी हाथ में रत्नमाला लिये अपने रूपलावण्‍य से रति और रम्‍भा को भी तिरस्‍कृत करती हुई सी निकली। वह वरांगी अंगना सरस्‍वती, लक्ष्‍मी तथा रूपवती शची की विडम्‍बना करती हुई-सी जान पड़ती थी।
मैथिल ! जिसे देखकर सब और समस्‍त सभासद मोह को प्राप्‍त हो गये, वह लक्ष्‍मी के समान राजकुमारी सुन्‍दरी सब लोगों के सामने अपने लिये योग्‍य वर की इस प्रकार खोज करने लगी, मानो चपला नूतन जल धर को ढूँढ़ रही हो। दिव्‍याम्‍बरधारी तथा प्रफुल्ल कमलदल के समान विशाल लोचन वाले नरलोक सुन्‍दर वीर प्रद्युम्न के पास पहुँचकर वह सुन्‍दरी विद्याधरी मूर्च्छित हो गयी। फिर थोड़ी ही देर में चेत हुआ। वह उठी और आनन्‍द विभोर होकर प्रद्युम्न के गले में सुन्‍दर माला डालकर खड़ी रह गयी। मिथिलेश्वर ! विद्याधरों के राजा सुकृति ने अपनी पुत्री सुन्‍दरी को प्रद्युम्न के हाथ में दे दिया। सब ओर मांगलिक वाद्य बज उठे, किंतु इस इस वैवाहिक मंगल को देखकर देवता लोग सहन न कर सके। उन लोगों ने उस स्‍वयंवर को चारों ओर से उसी प्रकार घेर लिया, जैसे प्रचण्‍ड मेघों ने सूर्यदेव को आच्‍छादित कर लिया हो। उन देवताओं को क्रोध के वशीभूत हो धनुष लिया हो। उन देवताओं को क्रोध के वशीभूत हो धनुष उठाये और युद्ध के मद से उद्धत हुए देख साक्षात प्रद्युम्न हरि ने भगवान श्रीकृष्‍ण के दिये हुए बाण सहित श्रेष्‍ठ धनुष को हाथ में लेकर यादवों के साथ सिंहनाद किया। मिथिलेश्वर ! उनके धनुष से छूटे हुए चमकीले बाणों द्वारा देवताओं की धज्जियाँ उड़ गयीं। जैसे सूर्य की किरणों से कुहा के बादल फट जाते हैं, उसी प्रकार वे देवता दसों दिशाओं में भाग खड़े हुए।
इस प्रकार साक्षात भगवान प्रद्युम्न स्‍वयंवर जीतकर और इलावृतखण्‍ड पर विजय पाकर भारत वर्ष को जाने के लिये उद्यत हुए। भाइयों, यादवों, सैनिकों तथा समस्‍त मन्‍त्रीजनों के साथ विजय-दुन्‍दुभि बजवाते हुए वे भारत खण्‍ड में आये। अनेक देशों को देखते हुए जम्‍बूद्वीप विजयी बलवान वीर श्रीकृष्‍ण कुमार क्रमश: आनर्त प्रदेश में और द्वार का के देशों में आये। प्रद्युम्न के द्वारा भेजे गये बुद्धिमानों में देशों में आये। प्रद्युम्न के द्वारा भेजे गये बुद्धिमानों में श्रेष्‍ठ साक्षात उद्धव ने राजसभा में पहुँचकर राजा उग्रसेन को तथा भगवान श्रीकृष्‍ण को प्रणाम किया। प्रत्‍येक वर्ष में क्‍या-क्‍या हुआ और जम्‍बूद्वीप पर किस तरह विजय मिली, वह सारा वृतान्‍त उद्धवजी ने यथोचित रूप से कह सुनाया। तब राजा उग्रसेन श्रीकृष्‍ण बलदेव एवं सम्‍पूर्ण वृद्धजनों के साथ प्रद्युम्न को लाने के लिये निकले। गीत वाद्यों की ध्‍वनि तथा वेद-मन्‍त्रों के गम्‍भीर घोष के साथ मोतियां, खीलों और फूलों की वर्षा पूर्वक मंगल पाठ करते हुए लोग उनकी अगवानी के लिये आये। नरेश्वर ! एक गजराज को आगे करके सोने के कलश, गन्‍धर्व, अप्‍सराएं, शंख, दुन्‍दुभि, वेणु, गन्‍ध, अक्षत, सोने के पात्र, फूल, धूप तथा जौ के अंकुर साथ लिये राजा उग्रसेन प्रद्युम्न के सम्‍मुख आये।
मैथिल ! श्रीकृष्‍णकुमार ने यादव बन्‍धुओं के साथ खड्ग ले जाकर महाराज उग्रसेन के सामने रख दिया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। मीन केतन प्रद्युम्न ने श्रीकृष्‍ण बलराम को मस्‍तक झुकाकर समस्‍त वृद्धजनों को प्रणाम करने के अनन्‍तर शीघ्र जाकर श्रीगर्गाचार्य के चरणों में नमस्‍कार किया। राजा उग्रसेन भूरी-भूरी प्रशंसा करके, वैदिक मन्‍त्रों तथा ब्राह्मणों के सहयोग से विधिवत् पूजन करके, प्रद्युम्न को हाथी पर बिठाकर द्वारकापुरी में गये। द्वारका में सर्वत्र-घर घर में मंगल उत्‍सव हुआ। नरेश्वर ! इस प्रकार मैंने तुम्‍हारी पूछी हुई सब बातें कहीं, अब और क्‍या सुनना चाहते हो।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘प्रद्युम्न का द्वार का गमन’ नामक अड़तालीसवां अध्‍याय पूरा हुआ।

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