07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 50 || राजसूय यज्ञ का मंगलमय उत्‍सव; देवताओं, ब्राह्मणों तथा अतिथियों का दान-मान से सत्‍कार

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 50 || राजसूय यज्ञ का मंगलमय उत्‍सव; देवताओं, ब्राह्मणों तथा अतिथियों का दान-मान से सत्‍कार

नारदजी कहते हैं- राजन् ! अर्थ सिद्धि के द्वारभूत पिण्‍डारक क्षेत्र में, जो रैवतक पर्वत और समुद्र के बीच में स्थित है, यज्ञ का आरम्‍भ हुआ। उस यज्ञ में जो कुण्‍ड बना, उसका विस्‍तार पाँच योजन का था। ब्रह्मकुण्‍ड एक योजन का और पाँच कुण्‍ड दो कोस में बनाये गये। वे सभी कुण्‍ड मेखला, गर्त, विस्‍तार और वेदियों के साथ सुन्‍दर ढंग से निर्मित हुए थे। वहाँ का महान यज्ञमण्‍डप का विस्‍तार पाँच योजन था, जो चँदोवों और बंदनवारों से सुशोभित था। केले के खं‍भे उसकी शोभा बढ़ाते थे। भोज, वृष्णि, अन्‍धक, मधु, शूरसेन तथा दशार्ह वंश के यादवों से घिरे हुए राजा उग्रसेन देवताओं से युक्त इन्‍द्र की भाँति उस यज्ञमण्‍डप में शोभा पाते थे। जैसे परमात्‍मा अपनी विभूतियों से शोभा पाता है, उसी प्रकार परिपूर्णतम भगवान यज्ञावतार श्रीकृष्‍ण उस यज्ञ में अपने पुत्रों और पौत्रों से सुशोभित होते थे।
महान सम्‍भार का संचय करके, गर्गाचार्य को गुरु बनाकर यदुराज उग्रसेन ने क्रतुश्रेष्‍ठ राजसूय यज्ञ की दीक्षा ली। मैथिल ! उस यज्ञ में दस लाख होता, दस लाख दीक्षित अध्‍वर्यु और पाँच लाख उद्गगाता थे। अग्‍नि कुण्‍ड में हाथी की सूँड़ के समान मोटी घृत की धारा गिरायी जाती थी, जिसे खा पीकर अग्‍नि देवता अजीर्ण रोग के शिकार हो गये। उस दिनों तीनों लोकों में कोई भी जीव भूखे नहीं रह गये। सब देवता सोमपान करके अजीर्ण के रोगी हो गये। अपनी धर्मपत्नी रुचिमती के साथ बलवान यादव राज उग्रसेन ने पिण्‍डार तीर्थ में यज्ञ का अवभृथ-स्‍नान किया। वे व्‍यास आदि मुनीश्वरों के साथ वेदमन्‍त्रों के द्वारा विधिपूर्वक नहाये। जैसे दक्षिणा से यज्ञ की शोभा होती है, उसी तरह रानी रुचिमती के साथ राजा उग्रसेन की शोभा हुई। देवताओं तथा मनुष्‍यों की दुन्‍दुभियाँ बजने लगीं और देवता उग्रसेन के ऊपर फूल बरसाने लगे। सोने के हार से विभूषित चौदह लाख हाथी उग्रसेन ने दान किये। सौ अरब घोड़े उन्‍होंने यज्ञान्‍त में दक्षिणा के रूप में दिये। बहुमूल्‍य हारों और वस्‍त्रों के साथ करोड़ों नवरत्न मुनिवर गर्गाचार्य को भेंट किये। साथ ही उन्‍हें घर गृहस्‍थी के उपकरण भी अर्पित किये।
महामनस्‍वी यादवेन्‍द्र राजा उग्रसेन ने उस यज्ञ में एक हजार हाथी, दस हजार घोड़े और बीस भार सुवर्ण ब्रह्म बने हुए ब्राह्मण को दिये। जैसे राजा मरुत्त के यज्ञ में ब्राह्मण लोग दक्षिणा से इतने संतुष्‍ट हुए थे कि अपने-अपने सुवर्णमय पात्र भी छोड़कर चल दिये थे, उसी प्रकार महाराज उग्रसेन के इस यज्ञ में भी ब्राह्मण संतुष्‍ट तथा हर्षोत्‍फुल्‍ल होकर अपने घर लौटे। अपने अपने भाग को पाकर संतुष्‍ट हुए सब देवता स्‍वर्गलोक को चले गये। वंदीजनों को भी बहुत द्रव्‍य दिया गया, जिससे जय-जयकार करते हुए वे अपने घर गये। राक्षस, दैत्‍य, वानर, दाढ़ वाले पशु पक्षी भी संतुष्‍ट होकर गये। समस्‍त नाग भी संतुष्‍ट चित होकर अपने अपने घर पधारे। गौएं, पर्वत, वृक्ष-समुदाय, नदियाँ, तीर्थ तथा समुद्र-सबको अपना-अपना भाग प्राप्‍त हुआ और वे सब संतुष्‍ट होकर अपने-अपने स्‍थान को पधारे।
जो राजा आमन्त्रित किये गये थे, उन्‍हें भी बहुत भेंट देकर दान मान के द्वारा उनकी पूजा की गयी और वे सब संतुष्‍ट होकर अपने-अपने घर गये। नन्‍द आदि मुख्‍य मुख्‍य गोपों को पूजन स्‍वयं श्री कृष्‍ण ने किया। वे सब लोग प्रेम और दान से प्रसन्न हो व्रज को लौटे। राजन् ! इस प्रकार मैंने तुम से राजसूय महायज्ञ के मंगलमय उत्‍सव का वर्णन किया। जहाँ साक्षात भगवान श्रीकृष्‍ण हैं, वहाँ कौन-सा कार्य सफल नहीं होगा जो मनुष्‍य सदा इस कथा को पढ़ते और सुनते हैं, उन्‍हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पदार्थों की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्‍ण पूर्ण परेश, परमेश्‍वर और पुराण पुरुष हैं; वे तुमको पवित्र करें। जो मनुष्‍य उनकी इस विचित्र कथा को सुनते हैं, वे अपने कुल को पवित्र कर देते हैं। विदेहराज ! परमेश्‍वर श्रीहरि ने यज्ञ के बहाने समस्‍त भूतल का भार उतार दिया। जो यदुकुल में चतुर्व्‍यूह रूप धारण करके प्रकट हुए, उन अनन्‍त गुणशाली भुवनपालक परमेश्‍वर को नमस्‍कार है।[1]

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में उग्रसेन के महान अभ्‍युदय के प्रसंग में ‘राजसूय-यज्ञोत्‍सव का वर्णन’ नामक पचासवां अध्‍याय पूरा हुआ।
।। विश्‍वजित खण्‍ड सम्‍पूर्ण ।।

1. पूर्ण परेश: परमेश्वर: प्रभु: पुनातु वो य: पुरुष: पुराण:। श्रृण्‍वन्ति ये तस्‍य कथां विचित्रां कुर्वन्ति तीर्थं स्‍वकुलं नरास्‍ते।।
छलेन यज्ञस्‍य हरि: परेश्वरो भारं विदेहेश भुवोऽवतारयत्।
योऽभूच्चतुर्व्‍यूहधरो यदो: कुले तस्‍मै नमोऽनन्‍तगुणाय भूभृते।।-(गर्ग0 विश्वजित0 50। 26-27)

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