07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 31 || रम्‍यक वर्ष में मन्‍मथशालिनी पुरी के लोगों द्वारा श्रीकृष्‍ण लीला का गान; प्रजापति व्‍यति संवत्‍सर द्वारा प्रद्युम्न का पूजन; कामवन में प्रद्युम्न का अपने कामदेव- स्‍वरूप में विलय

07. विश्वजित खण्‍ड || अध्याय 31 || रम्‍यक वर्ष में मन्‍मथशालिनी पुरी के लोगों द्वारा श्रीकृष्‍ण लीला का गान; प्रजापति व्‍यति संवत्‍सर द्वारा प्रद्युम्न का पूजन; कामवन में प्रद्युम्न का अपने कामदेव- स्‍वरूप में विलय 

श्री नारदजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार रम्‍यकवर्ष पर विजय पाकर महाबली श्री कृष्‍णकुमार प्रद्युम्न सुमेरु पर्वत के पूर्व भाग में स्थित ‘केतुमाल’ वर्ष में गये। मिथिलेश्वर ! उस वर्ष का सीमा पर्वत ‘माल्‍यवान्’ है, जहाँ से ‘चार’ नाम वाली माहापातकनाशिनी गंगा प्रवाहित होती है। माल्‍यवान् गिरि के पास मन्‍मथ शालिनीपुरी हैं, जो अपने रत्नमय परकोटों और महलों से देवताओं की राजधानी (अमरावती) की भाँति शोभा पाती है। राजन् वहाँ के पुरुष कामदेव के समान कान्तिमान् हैं। उनकी अंग कान्ति शरद्-ऋतु के प्रफुल्‍ल नील-कमल के समान होती है और उनके नेत्र भी विकसित कमल दल की शोभा को लज्जित करते हैं। यहाँ की नव-यौवना कामिनियाँ पीताम्‍बर धारण करके फूलों के हार पहनकर मनोहर वेष में कन्‍दुकक्रीड़ा किया करती हैं। उनके शरीर का स्‍पर्श करके प्रवाहित होने वाली वायु मतवाले भ्रमरों की ध्‍वनि से निनादित हो चारों और सौ योजन विस्‍तृत भूभाग को सुवासित करती है। उस पुरी में निवास करने वाला बहुश्रुत मनुष्‍य नगर से बाहर निकले और प्रद्युम्न के सुनते-सुनते श्रीमुरारि के यश का गान करने लगे।

केतुमालवासी बोले- जो जगत की पीड़ा हर लेने वाले साक्षात प्रधान पुरुषेश्वर आदि देव शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं और जिन्‍होंने देवताओं की प्रार्थना सुनकर भूलोक की रक्षा करने के लिये भारतवर्ष में अवतार लिया है, उन भगवान पुरुषोत्तम को नमस्‍कार है। वे प्रकट होने के बाद माता-पिता को बन्‍धन मुक्त करके शिशु रूप में पिता के घर से नन्‍द भवन को चले गये, वहाँ दयामती नन्‍दपत्नी यशोदा ने बड़े प्‍यार से उनका लालन-पालन किया, अनन्‍त मंगलमयी शोभा से सम्‍पन्न उन्‍होंने अपने को मारने के लिये आयी हुई पूतना के प्राणों का अपहरण कर लिया। बालक रूप में ही सोते हुए उन श्रीनन्‍दनन्‍दन ने छकड़े को उलट दिया और महादैत्‍य तृणावर्त की पीठ पर चढ़कर उसे मार गिराया। माता को अपने विश्वरूप का दर्शन कराया, गर्गाचार्य ने उनकी सुन्‍दर सौभाग्‍य–लक्ष्‍मी का वर्णन किया। व्रज के लोगों ने उन्‍हें लाड़ लड़ाया, उनके द्वारा माखन चोरी की लीलाएँ हुई।
 
श्‍याम मनोहर रूप धारी कोमल बालक श्रीकृष्‍ण ने दही के मटके फोड़कर उसमें से खूब दही खाया और माता ने जब छोटी-सी रस्‍सी से उन्‍हें ओखली में बांध दिया, तब उन्‍होंने वह ओखली अटकाकर दो यमल वृक्षों को तोड़ दिया, वृन्‍दावन में बछड़ों और ग्‍वाल-बालों के साथ विचरते हुए श्रीहरि ने कपित्‍थ वृक्षों द्वारा वत्‍सासुर को मारकर यमुना-किनारे बकासुर के तीखे चञ्चुपुटों को पकड़ लिया और दोनों हाथों से उस दैत्‍य को तिनके की भाँति चीर डाला। ग्‍वाल-बालों के साथ बहु संख्‍यक बछड़ों के समुदाय को चराते तथा वेणु बजाते हुए उन मदन मोहन वेषधारी प्रभु ने अघासुर के मुख में पड़े हुए गोपों और गौओं की रक्षा की और जब ब्रह्माजी ग्‍वालों और बछड़ों को चुरा ले गये, तब वे स्‍वयं ही तत्‍काल गोप-बालक और बछड़े बनकर पूर्ववत सारा कार्य चलाने लगे, वे ही भगवान श्रीकृष्‍ण सब के शरीर में क्षैत्रज्ञ एवं अन्‍तर्यामी आत्‍मा हैं। वे ही अनन्‍त, पूर्ण, प्रधान और पुरुष के ईश्वर (क्षर और अक्षर से अतीत पुरुषोत्तम) तथा आदिदेव हैं। वे अजन्‍मा प्रभु ग्‍वाल-बाल और बछड़ों का रूप धारण करके व्रज के अन्‍य बालकों में विहार करते और ब्रह्मजी को मोहित करते हुए सब ओर विचरने लगे।
उन्‍होंने बलवान धेनुकासुर को बलपूर्वक ताड़ के वृक्ष पर दे मारा और ताड़-फल लेकर चले आये। फिर यमुना के जल में कूदकर सहसा कालियानाग को जा पकड़ा और उसके फनों पर नृत्‍य करके उसे जल से बाहर निकाल दिया। तदनन्‍तर वे दावानल को पी गये और बलरामजी के सहयोग से शीघ्र ही सुदृढ़ मुष्टि का प्रहार करके उन्‍होंने प्रलम्‍बासुर को मौत के घाट उतार दिया। वन में मधुर स्‍वर से वेणु बजाकर उन्‍होंने व्रज-बधुओं को वहाँ बुला लिया और उनके मुख से अपनी कीर्ति का गान सुना। यमुना में नग्न स्‍नान करने वाली गोप-किशोरियों के दिव्‍य वस्‍त्र चुराये और वन में ब्राह्मण-पत्नियों के दिये हुए भात का ग्‍वाल बालों के साथ भरपेट भोजन किया। इन्‍द्र पूजा बंद करके गोवर्धन पूजा चालू करने पर जब पर्जन्‍य देव घोर वर्षा करने लगे, तब कृपापूर्वक उन्‍होंने पशुओं की रक्षा करने के लिये गोवर्धन पर्वत को छन्न की भाँति उठा लिया-ठीक उसी तरह जैसे साधारण बालक गोबर छत्ता उठा ले। जैसे गजराज अनायास कमल का फूल उठा लेता हैं, उसी प्रकार एक हाथ पर पर्वत उठाये भगवान को देखकर शचीपति इन्‍द्र ने इनकी स्‍तुति की। वरुण लोक में जाकर वहाँ से नन्‍दजी को सुरक्षित ले आये तथा स्‍वजनों को भगवान ने अन्‍धकार से परे अपने दिव्‍य परमधाम गोलोक का दर्शन कराया। श्री रास मण्‍डल में उपस्थित हो भगवान ने व्रज सुन्‍दरियों के साथ रास-क्रीड़ा की और यमुना-पुलिन पर गोपांगनाओं के साथ विहार किया।
व्रज सुन्‍दरियों को अपने मादक यौवन पर अभिमान करते देख उनके उस मान का अपहरण करने के लिये भगवान उनके बीच से अन्‍तर्धान हो गये। तब उनके दर्शन के लिये व्‍याकुल हुई व्रजांगनाएँ उन्‍हीं की कीर्ति का गान करने लगीं। तदनन्‍तर विरह से व्‍याकुल हुई उन व्रजबालाओं के बीच फूलों के हार धारण किये, मनोहर रूपधारी साक्षात मदन मोहन श्रीहरि पुन: प्रकट हो गये। वृन्‍दावन में श्‍याम सुन्‍दर ने शबर राज की परम सुन्‍दरी किशोरियों के साथ उसी प्रकार रमण किया, जैसे आदिदेव भगवान विष्‍णु अपनी विभूतियों के साथ रमण करते हैं। उस समय बड़े-बड़े देवताओं ने उनकी स्‍तुति की। उन माधव ने रास-रंगस्‍थली में केयूर, कुण्‍डल और किरीट आदि आभूषणों से मनोहर वेष धारण करके रमण किया। भगवान ने अम्बिका वन में नन्‍दराज को अजगर के मुख से छुड़ाकर उस सर्प को भी मोक्ष प्रदान किया। शंखचूड़ यक्ष से उसकी मणि ले ली। गोपों ने उनकी स्‍तुति की और उन्‍होंने वृषभरूप धारी अरिष्‍टासुर का एक ही हाथ से उसे मार डाला। कंस को बड़ा भय हो गया था, इसलिये उसने केशी को भेजा। वह मेघ के समान काला एवं प्रचण्‍ड शक्तिशाली दानव था। भगवान ने उसे एक बार पकड़कर छोड़ दिया। तब श्रीकृष्‍ण ने उसके मुंह के भीतर अपनी बाँह डाल दी और इस युक्ति से उसे मार डाला।
भगवान नारद ने जिनकी सौभाग्‍य-लक्ष्‍मी का अनेक प्रकार से वर्णन किया है, उन परमात्‍मा श्रीहरि ने व्‍योमासुर को भी प्राणहीन कर दिया। अक्रूर के द्वारा उन आदिदेव के महान ऐश्वर्य का वर्णन किया गया। वे गोपीजनों के अत्‍यन्‍त विरहातुर चित्त को भी चुराने वाले हैं। उन्‍होंने अपने हितकारी श्र्वफल्‍कपुत्र अक्रूर को जल के भीतर अपना दिव्‍य रूप दिखाकर फिर समेट लिया। उनके साथ वे परमेश्वर मथुरा के उपवन में पहुँचे और ग्‍वाल-बालों तथा बलरामजी के साथ उन्‍होंने मथुरापुरी का दर्शन किया। स्‍वच्‍छन्‍दतापूर्वक मधुपुरी में विचरते हुए श्रीहरि ने कटुवादी रजक को मौत के घाट उतार दिया। अपने प्रेमी दर्जी को उत्तम वर दिये, फूलों की माला अर्पित करने वाले माली पर कृपा की, कुब्‍जा को सीधी करके सुन्‍दरी बनाया और कंस की यज्ञशाला में रखे हुए धनुष को नवाते हुए सहसा उसे तोड़ डाला। रंगशाला के द्वार पर कुवलयापीड हाथी का वध करके दो राजकीय पहलवानों को रंगभूमि में पछाड़कर कंस को भी जा पकड़ा और उसे अखाड़े में गिराकर प्राणशून्‍य कर दिया। फिर माता-पिता को कैद से छुड़ाकर महान शक्तिशाली उग्रसेन को मथुरापुरी का राजा बना दिया। नन्‍दजी को प्रसन्न करके बहुत भेंट दी; गोपों को बुलाकर उन सब को धन से तृप्‍त करके बहुत कुछ निवेदन किया और उन्‍हें व्रज को लौटाकर वे गुरु के घर में विद्या पढ़ने के लिये गये। वहाँ अध्‍ययन समाप्‍त करके श्रीकृष्‍ण ने समुद्रवासी पंचजन नामक दानव का वध करने के पश्चात् गुरु के मरे हुए पुत्र को यमलोक से लाकर दक्षिणा के रूप में उन्‍हें अर्पित किया। उद्धव को भेजकर अपने प्रेम संदेश से गोपीजनों को अनुगृहीत किया और अक्रूर को हस्तिनापुर भेजकर पाण्‍डवों का समाचार जाना। तदनन्‍तर श्रीकृष्‍ण ने बलवान जरासंध को पराजित करके मुचुकुन्‍द दृष्टि से प्रकट हुई अग्नि के द्वारा कालयवन को भस्‍म कर दिया ।
इसके बाद अपने रहने के लिये श्रीहरि ने अद्भुत पुरी कुशस्‍थली का निर्माण कराके कुण्डिनपुर से भीष्‍मक-कन्‍या रुक्मिणी का अपहरण किया। अपने पुत्र के द्वारा शत्रु शम्‍बरासुर का वध कराया तथा युद्ध में ऋक्षराज जाम्‍बवान को जीतकर उनसे प्राप्‍त हुई मणि राजा उग्रसेन को दे दी। तत्‍पश्‍चात परमेश्वर श्री कृष्‍णा सत्‍यभामा के पति हुए। उन्‍होंने अपने श्वशुर सत्राजित का वध करने वाले शतधन्‍वा का सिर काट लिया और कुछ काल के बाद सूर्य पुत्री यमुना के साथ विवाह किया। इसके बाद उन्‍होंने अवन्ति राजकुमारी मित्रवृन्‍दा का हरण किया तथा स्‍वयंवर-ग्रह में सात वृषभों का दमन करके श्रीकृष्‍ण ने कोसलराज नग्रजित की पुत्री सत्‍या का पाण्रिहण किया। तत्‍पश्चात् केकयराज कन्‍या भद्रा का हरण किया और सम्‍पूर्ण मद्र देश के राजा की पुत्री लक्ष्‍मणा को स्‍वयंवर में जीता। युद्ध-भूमि में शस्‍त्र समूहों द्वारा सेना सहित भौमासुर को जीतकर सोलह सहस्‍त्र सुन्‍दरियों को वे ब्‍याह लाये। सत्‍यभामा की इच्‍छा से उन्‍होंने केवल पत्नी को साथ लेकर स्‍वर्ग में इन्‍द्र को परास्‍त किया और वहाँ से पारिजात वृक्ष तथा सुधर्मा सभा को वे उठा लाये। उन्‍होंने द्युत-सभा में बलरामजी के द्वारा दुष्‍ट रुक्‍मी को मरवा डाला और बाणासुर की सहस्‍त्र भुजाओं में से दो को छोड़कर शेष सबके सौ-सौ टुकड़े कर डाले। उन परमात्‍मा ने राजा उग्रसेन के राज सूययज्ञ की सिद्धि के निमित्त सम्‍पूर्ण जगत को भेजा, जो भूमण्‍डल के समस्‍त राजाओं को जीतकर यहाँ केतुमाल पति पर विजय पाने के लिये आये हैं। उनको हमारा नमस्‍कार है।

श्री नारदजी कहते हैं- राजन् ! यह सब सुनकर प्रसन्न हो महामनस्‍वी श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न हरि ने उन लोगों को कुण्‍डल, कड़े, हीरा, मणि, हाथी और घोड़े पुरस्‍कार के रूप में दिये। उस मन्‍मथशालिनी पुरी में महान प्रजापति व्‍यति संवत्‍सर ने प्रद्युम्न को नमस्‍कार करके भेंट अर्पित की। तदनन्‍तर महाबाहु प्रद्युम्न दिव्‍य कामवन में गये, जो अन्‍य साधारण लोगों के लिये अगम्‍य था; केवल प्रजापति की पुत्रियाँ उसमें जा सकती थीं। वह सुन्‍दर वन साक्षात कामदेव का क्रीड़ास्‍थल था और कामास्‍त्र के तेज से चारों ओर से सुरक्षित था। वहाँ नारियों का गर्भ प्राणशून्‍य होकर गिर पड़ता था, वर्ष भर भी टिक नहीं पाता था।
राजन् ! उस समय उस उत्‍कृष्‍ट कामवन से फूलों के पाँच बाण लिये पुष्‍पधन्‍वा कामदेव निकले। उनके श्‍याम शरीर पर पीताम्‍बर शोभा पा रहा था। उनका रूप अत्‍यन्‍त मनोहर था। उन्‍होंने अपने धनुष की प्रत्‍यंचा का गम्‍भीर घोष फैलाया। उनके बाण का स्‍पर्श होते ही यादव-वीर अपने सैनिकों, घोड़ों हाथियों और पैदलों के साथ स्‍वत: काम मोहित होकर गिर पड़े। उनके बाण के वेग का वर्णन नहीं हो सकता। तदनन्‍तर मिल जाता है। नरेश्वर ! सैनिकों सहित समस्‍त यादव जगदीश्वरों के भी ईश्वर श्रीकृष्‍णकुमार प्रद्युम्न उसी समय काम देव के स्‍वरूप में विलीन हो गये, जैसे पानी पानी में मिल जाता है। नरेश्वर ! सैनिकों सहित समस्‍त यादव रुक्मिणी नन्‍दन प्रद्युम्न को कामदेव का पूर्ण स्‍वरूप कामदेव के स्‍वरूप में विलीन हो गये, जैसे पानी-पानी में जानकर तत्‍काल चकित हो गये।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में विश्वजित खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘मन्‍मथ देश पर विजय’ नामक इकतीसवां अध्‍याय पूरा हुआ।




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