08. बलभद्र खण्ड || अध्याय 04 || रेवती का उपाख्यान
08. बलभद्र खण्ड || अध्याय 04 || रेवती का उपाख्यान
श्री महानन्त ने कहा- तदनन्तर सैकड़ों चन्द्रमाओं के समान कान्तिवाली, तपस्या में संलग्न, नवयौवन, सुन्दरी ज्योतिष्मती पर इन्द्र, यम, कुबेर, अग्नि, वरुण, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनैश्चर की दृष्टि पड़ीं। उसके रूप को देखकर उनके अंदर उसे प्राप्त करने की इच्छा उद्दीप्त हो उठी और वे सम्मोहितचित्त हो गये। तब उन्होंने ज्योतिष्मती के आश्रम पर आकर कहा- 'सुन्दरी ! रम्भोरु ! तुम्हें धन्य है। तुम किसके लिये तप कर रही हो, तुम्हारी अवस्था अभी तप के योग्य नहीं है। तुम अपने मन का अभिप्राय हम लोगों के सामने प्रकट करो। यह सुनकर ज्योतिष्मती बोली कि हजार मुखवाले भगवान अनन्त मेरे स्वामी हों, मैं इसीलिये तप कर रही हूँ। ज्योतिष्मती की यह बात सुनकर इन्द्रादि देवता हंस पड़े और अलग-अलग अपनी बात कहने को तैयार हो गये। उनमें सबसे पहले इन्द्र यों बोले।
इन्द्र ने कहा- सर्पराज स्वामी बनाने के लिये तुम व्यर्थ ही तप कर रही हो। मैं देवताओं का राजा हूँ। मैंने सौ अश्वमेध यज्ञ किये हैं और मैं स्वयं तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ। तुम मुझे वरण कर लो।
यमराज बोले- मैं सारे जगत के प्राणियों का दण्डविधान करने वाला यमराज हूँ। तुम मुझे वरण कर लो और पितृलोक में मेरी सबसे श्रेष्ठ पत्नी होकर रहो। कुबेर ने कहा- वरानने ! मैं सम्पूर्ण धन का स्वामी हूँ। तुम मुझे राजाधिराज समझो और संकर्षण के प्रति प्रीति छोड़कर शीघ्र मुझे पतिरूप में वरण कर लो।
अग्निदेव बोले- विशाल लोचने ! मैं सम्पूर्ण यज्ञों में प्रतिष्ठित समस्त देवताओं का मुखरूप हूँ। अन्य सभी के प्रति वासना का त्याग करके तुम मुझे भजो।
वरुण ने कहा- भामिनी ! मैं जलचरों का स्वामी एवं लोकपाल हूँ। मेरे हाथ में सदा पाश रहता हूँ। सातों समुद्रों ऐश्वर्य मेरा ही वैभव है। यह समझकर तुम मुझे पति रूप में वरण करो।
सूर्य देवता बोले- हे चाक्षुषात्मजे ! मैं जगत का नेत्र हूँ। मेरी प्रचण्ड किरणें सर्वत्र व्याप्त रहती हैं। अत एव पाताल में रहने वाले अनन्त का त्याग करके तुम स्वर्ग के आभूषण रूप मुझको वरण करो।
चन्द्रमा ने कहा- मैं ओषधियों का अधीश्वर, नक्षत्रों का राजा, अमृत की खान एवं ब्राह्मण श्रेष्ठ हूँ और कामिनियों को बल प्रदान करने वाला हूँ। हे गजगामिनी ! तुम मेरी उपासना करो।
मंगल बोले- यह पृथ्वी मेरी माता है और साक्षात उरुक्रम भगवान मेरे पिता हैं। मेरा नाम मंगल है। हे कल्याणी ! संसार के विपुल कल्याण की कामना करने वाली तुम मुझे अपना पति बनाओ।
बुध ने कहा- मैं बुद्धिमान, शूरवीर और कामिनियों के रस को बढ़ाने वाला बुध हूँ। तुम सब देवताओं का परित्याग करके मेरे साथ आनन्द का अनुभव करो।
बृहस्पति बोले- मैं देवताओं का आचार्य, बुद्धिमान वाणी का स्वामी साक्षात बृहस्पति हूँ। हे शुभे ! यह समझकर तुम मेरी उपासना करो।
शुक्र ने कहा- मैं दैत्यों का गुरु, भृगु के वंश में उत्पन्न साक्षात कवि हूँ। महाप्राज्ञे ! तुम अपने कल्याण की बात सोचकर मेरी भामिनी बन जाओ।
शनि बोले- कल्याणी ! मैं सबसे अधिक बलवान हूँ। देवताओं के ऊपर भी मेरा प्रभाव है। अपनी दृष्टि से सारे चिन्ताओ का त्याग करके तुम मुझे पतिरूप में वरण कर लो।
भगवान महानन्त ने कहा- इन सब की बात सुनते ही ज्योतिष्मती के नेत्र लाल हो गये, उनका अधर कांपने लगा और भौंहें टेढ़ी हो गयीं। क्रोध की आग भड़क उठी। फिर उन्होंने मेरा स्मरण किया और अत्यन्त क्रोध के आवेश में आ गयीं। ज्योतिष्मती के क्रोध से ब्रह्मलोक से लेकर पाताल एवं भूमण्डल सहित सारा ब्रह्मण्ड कांप उठा। सब ओर महान भय छा गया। यह देखते ही शाप के भय से कांपते हुए इन्द्रादि देवताओं ने सब दिशाओं से पूजन की सामग्री ली और ज्योतिष्मती के चरण कमलों पर गिरकर वे 'बचाओ बचाओ।।' पुकारने लगे। इन्द्रादि देवताओं के द्वारा इस प्रकार शान्त करने का प्रयत्न करने पर भी ज्योतिष्मती ने उन्हें पृथक-पृथक शाप दे दिया।
ज्योतिष्मती बोली- शनि ! तू दुष्ट है, मुझे छलने के लिये यहाँ आया है। तू अभी पंगु हो जा। तेरी नीची दृष्टि हो जाय। तू अत्यन्त काला-कलूटा और दुबला-पतला हो जा, निन्दनीय काले उड़द खाया कर और काले तिल का तेल पिया करे। शुक्र ! तू अभी एक आँख से काना हो जा। बृहस्पति ! तू स्त्री भाव को प्राप्त हो जा। बुध ! तेरा वार (दिन) निष्फल हो जाय। बुधवार को किसी के कुछ कहने और कहीं यात्रा करने पर सफलता नहीं मिलेगी। मंगल ! तू बंदर के समान मुख वाला हो जा। चन्द्रमा ! तेरे राजयक्ष्मा का रोग हो जाय। सूर्य ! तेरे दाँत टूट जायँ। वरुण ! तू जलंधर रोग का शिकार हो जा। अग्नि ! तू सब कुछ खाने वाला बन जा। कुबेर ! तेरा पुष्पक विमान छिन जाय। यमराज ! बलवान राक्षस युद्ध में तेरा मान-भंग करें और तू शक्तिशाली राक्षसों से युद्ध में हार जा। देवाधम इन्द्र ! तू मुझे हरने के लिये आया है और अपने मुंह से तूने परमात्मा की निन्दा की है। स्वर्ग में किसी राजा के द्वारा तेरी पत्नी शची हर ली जायगी, वह स्वर्ग सुख का भोग करेगा और तू वहाँ से भगा दिया जायगा। अरे स्वर्ग के राजा ! किसी राक्षस के द्वारा युद्ध में तेरी हार होगी। तू पाश में बाँधा जायगा और वे लंकापुरी में ले जाकर तुझे अन्धकार पूर्ण कारागार में डाल देंगे।
भगवान महानन्त बोले- तदनन्तर ज्योतिष्मती के द्वारा शाप को प्राप्त कर देवताओं के बीच इन्द्र कुपित हो गये और इन्द्र ने भी ज्योतिष्मती को शाप दे दिया- 'हे क्रोधकारिणी! संकर्षण को पति के रूप में प्राप्त करके भी इस जन्म अथवा दूसरे जन्म में अथवा कभी तुम्हारे घर में पुत्रोत्सव नहीं होगा। इन्द्र ज्योतिष्मती के तेज से बड़े तिरस्कृत हो गये थे। उन्होंने इस प्रकार कहकर सारे देवताओं के साथ स्वर्ग की यात्रा की। ज्योतिष्मती फिर तपस्या में लग गयी। तदनन्तर सारे जगत के कारण भूत ब्रह्माजी की दृष्टि ज्योतिष्मती के तप की ओर गयी और वे हंस पर सवार होकर ब्रह्मविद ब्राह्मण और ब्राह्मी आदि शक्तियों के साथ अपने भवन से वहाँ पधारे। आकाश में ही स्थित हुए ब्रह्म ने उसको सम्बोधन करके कहा- ‘ज्योतिष्मती, चाक्षुष मनु की पुत्री। तुम्हारा तप सफल हो गया। इस तप में तुम सिद्ध हो गयी। मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम वर मांगो’। ब्रह्माजी की बात सुनकर ज्योतिष्मती कण्ठपर्यन्त जल से बाहर निकली। उसने ब्रह्मजी को प्रणाम किया, उनका स्तवन किया और वह हाथ जोड़कर कहने लगी- ‘भगवन् ! यदि निश्चय ही आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हजार मुख वाले भगवान संकर्षण मेरे पति हों, यह मुझे वर दीजिये।
देवश्रेष्ठ ब्रह्माजी ने यह सुनकर उत्तर में कहा- पुत्री ! तुम्हारा मनोरथ दुर्लभ हैं, तथापि मैं उसे पूर्ण करूँगा। आज से ही वैवस्वत मन्वन्तर प्रारम्भ हुआ है। इसकी सत्ताईस चतुर्युगी बीत जाने पर भगवान संकर्षण तुम्हारे पति होंगे। यह सुनकर ज्योतिष्मती ने ब्रह्मा जी से कहा- 'देवदेव भगवन् ! यह तो बड़ा लंबा समय है। आप सब कुछ करने में समर्थ हैं, अतएव मेरा मनोरथ शीघ्र पूर्ण कीजिये। नहीं तो, जैसे मैंने देवताओं का शाप दिया है, वैसे ही आपको भी शाप दे दूंगी। ज्योतिष्मती के इस प्रकार कहने पर ब्रह्माजी शाप के भय से डर गये और क्षण भर विचार करने के बाद बोले- 'राजकुमारी ! तुम आनर्त देश के राजा रेवत के यहाँ कन्या बनो। वे राजा कुशस्थली में वर्तमान हैं। फिर इसी जन्म में तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो जायगा। किसी कारण से सत्ताईस चतुर्युगी का समय एक घड़ी के समान बीत जायगा। ज्योतिष्मती को इस प्रकार वर देकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये।
तदनन्तर ज्योतिष्मती ने आनर्त देश में कुशस्थली के राजा रेवत की पत्नी से जन्म धारण किया। उस समय उसका नाम रेवती रखा गया। वह रूप, गुण और उदारता से सुशोभित, नूतन कमल के समान नेत्र वाली रेवती विवाह के योग्य हो गयी। एक दिन राजा रेवत अन्त:पुर में अपनी भार्या के साथ बैठे थे। उन्होंने स्नेहवश कन्या से कहा- 'तुम कैसा वर चाहती हो, बताओ। यह सुनकर उसी समय रेवती ने कहा- 'जो सब में बलवान हैं, वही मेरे पति हों। यह सुनकर राजा रेवत कन्या को लेकर, अपनी भार्या के साथ दीर्घायु बलवान वर की खोज के लिये रथ पर सवार हो सभी लोकों को लांघते हुए ब्रह्मलोक को गये। वहाँ घड़ी भर ठहरे। इतने में ही पृथ्वीलोक के सत्ताईस चतुर्युगों का समय पूरा हो गया। महानन्त ने नाग लक्ष्मी से कहा- ‘रम्भोरु ! वह रेवती अब भी ब्रह्मलोक में ही है। तुम उसकी देह में प्रवेश कर जाओ और आवेशावतारिणी बनो। तदनन्तर द्वारका में जाकर मेरे साथ आनन्द का उपभोग करना।
प्राडविपाक मुनि बोले- नागलक्ष्मी ने महानन्त के इन वचनों को सुनकर अपने स्वामी भगवान संकर्षण की आज्ञा ली और ब्रह्मलोक में जाकर रेवती के विग्रह में आविष्ट हो गयी। कौरवेन्द्र दुर्योधन ! तदनन्तर भगवान संकर्षण पृथ्वी का भार हरण करने के लिये सर्वलोकनमस्कृत गोलोक धाम से पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए। यही भगवान बलभद्रजी का आगमन वृत्तान्त है। मैंने यह तुम को सुनाया है। यह समस्त पापों का नाश करने वाला और परम मंगलमय है। युवराज ! अब आगे तुम क्या सुनना चाहते हो।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्री बलभद्र खण्ड के अन्तर्गत श्री प्राडविपाक मुनि और दुर्योधन के संवाद में ‘रेवती उपाख्यान’ नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ।
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