08. बलभद्र खण्‍ड‎ || अध्याय 06 || प्राडविपाक मुनि के द्वारा श्रीराम - कृष्‍ण की व्रजलीला का वर्णन

08. बलभद्र खण्‍ड‎ || अध्याय 06 || प्राडविपाक मुनि के द्वारा श्रीराम - कृष्‍ण की व्रजलीला का वर्णन


दुर्योधन ने पूछा- मुनिराज ! भगवान अनन्‍त श्रीबलरामजी और अनन्‍त लीलाकारी भगवान श्रीकृष्‍ण ने भूमण्‍डल पर अवतार लेकर विचरण किया। अब संक्षेप में यह बताने की कृपा कीजिये कि व्रज में, मथुरा में, द्वारका में और अन्‍यत्र उन्‍होंने क्‍या-क्‍या लीलाएं कीं।

प्राडविपाक मुनि ने उत्तर दिया- दुर्योधन ! भगवान श्रीकृष्‍ण ने प्रकट होते ही अद्भुत लीला आरम्‍भ कर दी। उन्‍होंने पूतना को मोक्ष प्रदान किया, शकटासुर और तृणावर्त का उद्धार किया, (माता को) विश्वरूप दिखलाया, दधि की चोरी की, अपने श्रीमुख में ब्रह्मण्‍ड के दर्शन करवाये, यमलार्जुन वृक्षों को उखाड़ा और दुर्वासाजी को माया का प्रभाव दिखलाया। श्रीमद् गर्गाचार्यजी के द्वारा राधाकृष्‍ण नाम की सुन्‍दरता और महिमा का वर्णन कराया। ब्रह्माजी ने वृषभानु राजनन्दिनी राधिका के साथ भाण्‍डीर-वन के रासमण्‍डल में श्रीकृष्‍ण का विवाह करवाया। तत्‍पश्चात् श्रीकृष्‍ण, बलराम दोनों ने वृन्‍दावन जाकर वत्‍सासुर और वकासुर आदि दानवों का संहार किया, गोपालों के साथ गायें चराते हुए वृन्‍दावन में विचरण किया। फिर तालवन में गधे के समान रेंकने वाला जो धेनुका सुरदैत्‍य रहता था, उसने अपनी दुलत्ती चलाकर बलरामजी को चोट पहुँचाने की चेष्‍टा की। तब शक्तिशाली बलदेवजी ने दोनों हाथों से उसे पकड़कर ताड़ के वृक्ष पर दे मारा। वह फिर उठकर सामने आया तो बलरामजी उसे पुन: जमीन पर दे पटका। फलत: उसका सिर फूट गया और वह मूर्च्छित हो गया।
तब बलरामजी ने शीघ्र ही उसके एक मुक्का मारा, जिससे उसके प्राण पखेरु उड़ गये। तदनन्‍तर श्रीकृष्‍ण ने कालियनाग का दमन, दावाग्न‍ि-पान आदि लीलाएं कीं, फिर श्रीराधिकाजी के प्रति प्रेम प्रकाश करके उनके प्रेम की परीक्षा ली, वृन्‍दावन में विहार किया, हाव भाव युक्त दान लीला और मानलीला, शंखचूडादि का वध और शिवासुरि उपाख्‍यान इत्‍यादि के प्रवचन की बहुत सी लीलाएँ कीं। तदनन्‍तर एक समय गोवर्धन-पूजा की गयी। इन्‍द्र ने यज्ञ भाग से वंचित होने पर कुपित होकर सांवर्तक आदि मेघों के द्वारा व्रजमण्‍डल पर घोर वर्षा आरम्‍भ कर दी। सारे व्रजवासी भय से व्‍याकुल हो गये। भगवान श्रीकृष्‍ण ने उनको आतुर देखकर 'डरो मत’ यों कहकर अभयदान दिया। फिर उन्‍होंने गिरिराज गोवर्धन को उखाड़कर, जैसे बालक छत्रक (कुकुरमुत्ता) को उठा लेता हैं, ठीक वैसे ही गोवर्धन को अपने एक हाथ पर रख लिया। सात वर्ष की अवस्‍था वाले श्रीकृष्‍ण पूरे सात दिनों तक पर्वत को हाथ पर उठाये बिना हिले-डुले अविचल खड़े रहे। तब तो सम्‍पूर्ण देवताओं के साथ इन्‍द्र भयभीत गये और उन्‍होंने स्‍तुति की और अभिषेक किया। तदनन्‍तर कामधेनु सुरभि और देवता तथा मुनियों के साथ वे स्‍वर्ग को चले गये। गोवर्धन–धारण की इस अद्भुत लीला को देखकर सभी गोप अत्‍यन्‍त विस्मित हो गये। फिर श्रीकृष्‍ण ने खेत में मोती आदि के बीज बोकर मोती उपजाने का चमत्‍कारमय ऐश्वर्य गोपों को दिखलाया।
तदनन्‍तर भगवान श्रीकृष्‍ण ने श्रुति रुपा, ऋषिरुपा, मैथिली, कोसल देशनिवासिनी, अयोध्‍यावासिनी, यज्ञसीता, पुलिन्‍द का, रमा वैकुण्‍ठ वासिनी तथा श्वेत द्वीपनिवासिनी, ऊर्ध्‍ववैकुण्‍ठवासिनी अजित पद वासिनी, श्री लोकाचल निवासिनी, दिव्‍या, अदिव्‍या, त्रिगुणावति, भूमि, गोपी, देवश्री, जालंधरी, बार्हिष्‍मती, पुरन्‍ध्री, अप्‍सरा, सुतल वासिनी और नागेन्‍द्र कन्‍या आदि गोपी यूथों के साथ पृथक-पृथक रास मण्‍डल की रचना की। एक समय श्रीबलरामजी के साथ श्रीकृष्‍णचन्‍द्र भाण्‍डीर वन में गोप बालकों के साथ गौएँ चराने गये। वहाँ जाकर एक दूसरे को ढोने और ढोवाने का खेल करने लगे। उस समय वहाँ प्रलम्‍बासुर नामक एक दैत्‍य गोप बालक का वेश धारण कर खेल में शामिल हो गया, बलरामजी उस पर विजयी हुए। अत: उन्‍हें पीठ पर चढ़ाकर वह चलने लगा। वह गिरिराज के समान विशाल देहवाला असुर मथुरा की ओर जाना चाहता था कि उस असुर की पीठ पर सवार अमित पराक्रमी श्री बलदेवजी ने, रोष में भरकर जैसे इन्‍द्र किसी पर्वत पर प्रहार करे, वैसे ही उसके मस्‍तक पर मुष्टि प्रहार किया। उस प्रहार से व्रज की चोट खाये हुए पहाड़ की तरह असुर का सिर टूक-टूक हो गया और उसी क्षण वह भूमि पर गिर पड़ा।

एक समय गरमी के दिनों में सभी गौएं और गोपाल किसी मूंज के वन में जा पहुँचे। इतने में ही वहाँ बड़े जोर की प्रलयाग्न‍ि के समान दावाग्न‍ि जल उठी और वह चारों तरफ फैल गयी। तब गोपालगण ‘हे राम। हे कृष्‍ण। हम शरणागत गोपालों की रक्षा करो, रक्षा करो। यों पुकार उठे। भगवान ने तुरंत कहा- ‘डरो मत। तुम सब अपनी-अपनी आँखें मूंद लो। यों कहकर भगवान उस भीषण दावाग्न‍ि को पी गये। तदनन्‍तर गोपाल और गायों के साथ भगवान श्रीकृष्‍ण भाण्‍डीर वन में यमुना के तट पर पधारे और अशोक वन में यज्ञ दीक्षित द्विजों की पत्नियों के द्वारा लाया हुआ भोजन ग्रहण किया। इसके बाद एक दिन व्रज में नन्‍दबाबा को वरुण देवता ने अपहरण कर लिया, तब भगवान ने वरुण का मान भंग करके नन्‍द आदि गोपों को सम्‍पूर्ण लोकों के द्वारा नमस्‍कृत वैकुण्‍ठ के दर्शन कराये। इसके अनन्‍तर एक दिन अम्बिका कानन में सरस्‍वती नदी के तट पर सुदर्शन नामक सर्प नन्‍दजी को निगलने लगा। तब भगवान श्रीकृष्‍ण ने अखिल लोकपालों के द्वारा वन्‍दनीय अपने चरणमल का उससे स्‍पर्श कराया। चरण स्‍पर्श प्राप्‍त होते ही वह सर्प शरीर से मुक्त हो गया। एक समय श्रीकृष्‍ण बलरामजी के साथ गोप बालकों को लिये आंख मिचौनी और चोर साहुकार का खेल खेल रहे थे। 
उसी समय कंस का सखा व्‍योमासुर चोर के रूप में वहाँ आया। भगवान श्रीकृष्‍ण ने अपनी प्रचण्‍ड दोनों भुजाओं से उसे पकड़कर दसों दिशाओं में घुमाते हुए पृथ्‍वी पर पटक दिया। इसी प्रकार कंस का भेजा हुआ अरिष्‍टासुर बैल के रूप में आया। भगवान ने उसके दोनों सींग पकड़कर उसे भी धराशायी कर दिया। तब नारदजी ने जाकर कंस को श्रीकृष्‍ण की ये सारी लीलाएं सुनायीं। सुनकर कंस ने केशी को भेजा, भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र ने उसके मुंह में अपनी भुजा प्रवेश कराकर उसके मर्म को भेद डाला। श्रीकृष्‍ण ने इस प्रकार बलरामजी के साथ व्रज-मण्‍डल में अनेक अद्भुत लीलाओं की रचना की।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्री बलभद्र खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्री प्राडविपाक मुनि और दुर्योधन के संवाद में ‘श्री रामकृष्‍ण की व्रज लीला का वर्णन’ नामक छठा अध्‍याय पूरा हुआ।

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