08. बलभद्र खण्ड || अध्याय 07 || श्रीराम-कृष्ण की मथुरा-लीला का वर्णन
08. बलभद्र खण्ड || अध्याय 07 || श्रीराम-कृष्ण की मथुरा-लीला का वर्णन
प्राडविपाक मुनि बोले- युवराज दुर्योधन ! भगवान बलरामजी और श्रीकृष्णचन्द्र ने मथुरा में जो-जो लीलाएँ कीं, उनका संक्षेप में वर्णन कर रहा हूँ; सूनो कुछ समय के पश्चातकाल नेमिकुमार कंस ने बलराम और श्रीकृष्ण को बुलाने के लिये अक्रूरजी को भेजा। अक्रूरजी व्रज में पधारे। श्रीकृष्ण को मथुरा जाने के लिये प्रस्तुत देखकर गोपियां विरह से आतुर हो गयीं। भगवान ने उन सबको अलग-अलग बुलाकर आश्वासन दिया। फिर बलरामजी सहित स्वयं रथ पर सवार होकर अक्रूरजी के साथ मथुरा की ओर चले। जाते समय रास्ते में यमुनाजी पड़ीं। उसके जल में भगवान ने अक्रूर को अपने तेज या धाम के दर्शन कराये। तदनन्तर पूर्वाह्न के समय वे मथुरा में जा पहुँचे और अपराह्नकाल तक मथुरापुरी को सब ओर से देखते रहे। लीलारूप में मनुष्य का वेष धारण किये हुए श्रीराम कृष्ण साक्षात पुराण-पुरुष हैं। मथुरा नगरी के सभी नर नारियों के मन में उनके दर्शन का आनन्द प्राप्त करने की अभिलाषा उत्पन्न हो गयी और वे अपना सारा काम-धाम छोड़कर, जैसे ही उनकी और दौड़ पड़े। कोटि-कोटि काम देवों का दर्प चूर्ण करने वाले भगवान रामकृष्ण ने अपना सौन्दर्य सब को दिखलाया और उन सबका मन हरण करते हुए वे स्वेच्छा से विचरण करने लगे।
तदनन्तर राजमार्ग भगवान ने धोबी और रंगरेज से कपड़ों की याचना की; परंतु उन्होंने वस्त्र नहीं दिये, तब सबके देखते-देखते ही हाथों से प्रहार करके धोबी और रंगरेज दोनों को उस जीवन से मुक्त कर दिया। तदनन्तर भगवान को एक दर्जी मिला। उसने वस्त्रों के द्वारा उनको सजाया और भगवान ने उसे अपना सारुप्य प्रदान कर दिया। फिर कुब्जा सैरन्ध्री मिली। वह तीन जगह से टेढ़ी थी। चन्दन ग्रहण करने के बहाने भगवान ने उसको सीधी कर दिया। वह तीनों लोकों में सुन्दरी बन गयी। तत्पश्चात् वहाँ के वैश्य व्यापारियों से बातचीत की और कुछ बच्चों को साथ लेकर, जहाँ कंस का धनुष रखा था, उस स्थान पर वे जा पहुँचे। वह धनुष स्वर्ण से मण्डित था और सात ताड़ वृक्षों के बराबर उसकी लंबाई थी। हजारों पुरुषों के द्वारा भी वह उठाया नहीं जा सकता था। वह धनुष अष्ट धातु से बना हुआ था, अत्यन्त भारी था और उसका बोझ लाख भार के समान था। कंस ने वह धनुष परशुरामजी से प्राप्त किया था। वह वैष्णव (भगवान विष्णु से सम्बन्ध रखने वाला) धनुष साक्षात भगवान शेष के समान कुण्डलाकार था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे देखा और बलपूर्वक उठा लिया; फिर सब लोगों के देखते देखते ही लीलापूर्वक उस धनुष को चढ़ाया और कान तक तानकर ले गये। तदनन्तर दोनों भुजाओं का सहारा लगाकर उसको बीच से उसी प्रकार तोड़ डाला, जैसे हाथी अपनी सूँड़ से गन्ने को तोड़ देता है। धनुष के टूटने की भयानक ध्वनि से पाताल सहित सप्त लोकमय सारा ब्रह्माण्ड गूंज उठा। तारे और दिग्गजगण अपने स्थान से विचलित हो चले। इतना ही नहीं, सारा भूमण्डल दो घड़ी तक थाली की तरह कांपता रह गया।
अपराह्न के समय रंगशाला के द्वार पर कुवलयापीड़ हाथी दिखायी दिया। भगवान ने उसके समीप आकर बाललीला के रूप में क्षण भर उसके साथ युद्ध किया, तदनन्तर उसकी सूँड़ को पकड़कर उसे इधर-उधर घुमाया और फिर वैसे ही जमीन पर पटक दिया, जैसे बालक कमण्डलु को पटक दे। कुवलयापीड़ हाथी का इस प्रकार वध करके श्रीबलराम और कृष्ण चन्द्र कंस-रचित रंगभूमि में पहुँचे और उन्होंने वहाँ पर बैठे हुए सभी लोगों को उनके अपने-अपने भाव के अनुसार यथा योग्य दर्शन दिये। फिर अखाड़े में पहुँचकर मल्लयुद्ध के लिये जा डटे और कंस के सामने सब लोगों के देखते-देखते ही भगवान बलराम और कृष्णचन्द्र ने चाणूर, मुष्टि, कूट, शल और तोशल को धराशायी कर दिया। श्रीकृष्ण के इन कार्यों को देखकर कंस दुर्वचनों के द्वारा उनका तिरस्कार करने लगा।
इसी बीच भगवान श्रीकृष्ण कूदकर उस कटुभाषी कंस के बीच भगवान श्रीकृष्ण कूदकर उस कटुभाषी कंस के अत्यन्त ऊंचे मंच पर चढ़ गये। तुरंत मृत्यु के समान श्रीकृष्ण को सामने आया देखकर कंस मंच से उठा और भगवान भर्त्सना करते हुए उसने उसी क्षण ढाल और तलवार लिये हुए कंस को, जैसे ही बलपूर्वक अपनी प्रचण्ड भुजाओं में पकड़ लिया। पर गरुड़ की चोंच से जिस प्रकार सर्प छूटकर निकल भाग, उसी प्रकार कंस भगवान श्रीकृष्ण और कंस दोनों मंच पर आ गये और वेगपूर्वक एक दूसरे पर आक्रमण करते हुए वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पर्वत पर दो सिंह लड़ते हुए शोभित हुए जैसे पर्वत पर दो सिंह लड़ते हुए शोभित हों। तदनन्तर कंस उछलकर सौ हाथ ऊपर आकाश में चला गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने भी वैसे ही उछलकर बाज की तरह उसे पकड़ लिया। कंस पुन: श्रीकृष्ण के हाथों से छूटकर निकल भागा, तब त्रिलोक को धारण करने वाले श्रीकृष्ण ने फिर अपने प्रचण्ड भुजदण्डों से उसको पकड़ लिया और इधर उधर घुमाते हुए महाकाश से उसे मज्च पर पटक दिया। जैसे बिजली गिरने से वृक्ष टूट जाता है, उसी प्रकार कंस के गिरते ही मंच के खंभे टूट गये। वज्र के समान कठोर शरीर वाला वह कंस नीचे गिर पड़ा। एक बार उसे कुछ व्याकुलता हुई; परंतु वह फिर सहसा उठा और महात्मा श्रीकृष्ण के साथ जूझने लगा। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी भुजाओं से पकड़ कर उसे मंच पर पटक दिया और वे उसकी छाती पर चढ़ बैठे। तब उन्होंने उसके सिर को पकड़कर केश खींचते हुए, जैसे पर्वत से कोई चट्टान को गिराये, वैसे ही उसे मंच से नीचे अखाड़े में गिरा दिया। तदनन्तर सब के आधार स्वरूप अनन्त पराक्रमशाली सनातन पुरुष भगवान स्वयं वेगपूर्वक मंच से कूदकर कंस के ऊपर जा पड़े।
इस प्रकार दोनों के गिरने से पृथ्वी कुछ नीचे धंस गयी और सारा भूमण्डल तीन घड़ी तक थाली की तरह कांपता रह गया। कंस के प्राण निकल गये। सबके देखते-देखते ही जैसे भूमि पर पड़े हुए गजराज को सिंह खींच रहा हो, वैसे ही वे कंस के शरीर को घसीटने लगे। राजाओं में हाहाकार मच गया। लोग कहने लगे- ‘अहो ! कैसे आश्चर्य की बात है कि वैरभाव से स्मरण करने वाला कंस भी उन प्रभु के सारुप्य को वैसे ही प्राप्त हो गया, जैसे कीड़ा भृगड़ी के रूप में परिणत हो जाता है। कंस की मृत्यु देखकर उसके छोटे भाई तत्काल ढाल-तलवार लेकर वहाँ आ डटे। उन पर बलभद्रजी की दृष्टि पड़ी और उन्होंने मुद्गर उठाकर सब ओर से प्रहार करते हुए सबको धराशायी कर दिया। तब देवताओं की ध्वनि होने लगी। देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की। विद्याधरियाँ नृत्य करने लगीं और विद्याधर, गन्धर्व तथा किंनर भगवान का यशोगान करने लगे। तदनन्तर भगवान श्रीकृष्ण ने सबको आश्वासन देकर माता-पिता को बन्धन मुक्त किया और उग्रसेन को राज्य सौंप दिया।
फिर यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न होने पर सांदीपनि मुनि के समीप जाकर समस्त विद्याओं का अध्ययन किया। दक्षिणा रूप में मरे हुए गुरुपुत्रों को लाकर प्रदान किया, शंखासुर का वध किया। फिर वे मथुरा में आकर निवास करने लगे। व्रज की व्यथा को दूर करने के लिये भगवान ने उद्धव को वहाँ भेजा। फिर स्वयं वहाँ जाकर रास मण्डल में श्रीराधा और गोपियों को अपने दर्शन कराये। रास में ऋभु ऋषि को मुक्ति दी, फिर मथुरा में मथुरा नरेश के सदृश कार्य करते हुए विराजमान हुए। बलराम जी ने भी कोलासुर का वध करके मथुरापुरी में शुभागमन किया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की हजारों-हजारों पवित्र और विचित्र लीला मथुरा में सम्पन्न हुई ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्री बलभद्र खण्ड के अन्तर्गत श्री प्राडविपाक मुनि और दुर्योधन के संवाद में ‘श्री राम-कृष्ण की मथुरा लीला का वर्णन’ नामक सातवां अध्याय पूरा हुआ।
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