08. बलभद्र खण्‍ड‎ || अध्याय 09 || श्री बलराम जी की रासलीला का वर्णन

08. बलभद्र खण्‍ड‎ || अध्याय 09 || श्री बलराम जी की रासलीला का वर्णन

दुर्योधन ने पूछा- भगवन ! मुनिसत्तम ! भगवान बलभद्रजी ने नागकन्‍या गोपियों के साथ यमुनाजी के तट पर कब विहार किया था।

प्राडविपाक मुनि बोले- एक समय की बात है, व्रज के सुहद्-बन्‍धुओं को देखने की बलरामजी के मन में बड़ी उत्‍कण्‍ठा पैदा हो गयी। तब वे अपने तालध्‍वज से युक्तरथ पर सवार होकर द्वारका से निकले और गौओं, गोपालों तथा गोपियों से भरे गोकुल में जा पहुँचे। नन्‍दराज और यशोदाजी भी बहुत दिनों से उन्‍हें देखने के लिये उत्‍कण्ठित थे, अत एव उन्‍होंने उनको हृदय से लगा लिया। फिर बलभद्रजी गौओं, गोपियों और गोपालों से मिले और पूरे वसन्‍त के दो महीने उन्‍होंने वहाँ निवास किया। पहले जिन नागकन्‍याओं के गोपी होने का वर्णन आ चुका है, उन्‍होंने गर्गाचार्यजी से बलभद्रजी का पंचाग[1] प्राप्‍त करके उसे सिद्ध किया था। उसी के प्रभाव से बलभद्रजी ने प्रसन्न होकर कालिन्‍दी के तट पर उनके साथ रासमण्‍डल में रास क्रीड़ा की। उस दिन चैत्र की पूर्णिमा थी। अरुण वर्ण के पूर्ण चन्‍द्र उदित होकर सारे वन को अपनी रंग विरंगी किरणों से रज्जित कर रहे थे।
शीतल पवन कमल के मकरन्‍द और पराग को लिये सर्वत्र मन्‍दगति से प्रवाहित हो रहा था। आनन्‍ददायिनी यमुना अपनी चंचल लहरियों से निर्मल पुलिन भूमि को व्‍याप्‍त कर रही थी। कुज्जों की प्रागण भूमि विविध निकुंज पुज्जों से सुशोभित तथा चमचमाते आवृत थी। मोर और कोयल मधुर स्‍वर में कूंज रहे थे और मधुपान मत्त मधुकरों की मधुर ध्‍वनि से मुखरित व्रज भूमि अत्‍यन्‍त शोभा को प्राप्‍त हो रही थी। बलरामजी के पैरों में नूपुर की मधुर ध्‍वनि हो रही चमकती हुई मणियों के कड़े, करधनी, केयूर, हार, किरीट और कुण्‍डलों वे अलंकृत थे। उनके वदन पर कमल-दल की छटा छा रही थी। वे नीलाम्‍बर धारण किये हुए थे। उनके विमल कमलदल के समान नेत्र थे। ऐसे श्री बलदेवजी यक्षिणियों के साथ यक्षराज की भाँति रासमण्‍डल में गोपियों के द्वारा घिरे हुए विराजित थे। तदनन्‍तर वरुण द्वारा प्रेरित वारुणी देवी वृक्षों के कोटरों से प्रकट होकर बहने लगीं। उस पुष्‍पा सवकी सुगन्‍ध से सारा वन सुगन्‍ध मय हो गया। मधु के लोभ से मधुकर पुंज मधुर गुज्जार करने लगा। वारुणि पान से मद विहल, कमल दल के समान विशाल और अरुण नेत्र वाले बलदेवजी के अंग प्रेमावेश से चंचल हो उठे। तदनन्‍तर लीला विहारजन्‍य श्रम के कारण जल कण की भाँति पसीने की बूंदें उनके मुख पर प्रकट हो गयीं और उन्‍होंने कपोलों पर रचित चित्रकारी को धो दिया। तदनन्‍तर गजराज की सी चाल वाले और गजेन्‍द्र ऐरावत की सूंड़ के समान विशाल भुजाओं वाले बल देवजी गोपियों के साथ वैसे ही क्रीड़ा करने लगे, जैसे उन्‍मत्त मातगड़ हथिनियों के साथ करता है।
उनके सिंहस्‍कन्‍धतुल्‍य कंधे पर हल और हाथ में मुसल सुशोभित था। करोड़ों-करोड़ों पूर्ण चन्‍द्रमाओं की प्रभा के समान उनका तेज छिटक रहा था। देदीप्‍यमान रत्नों के मंजीर, चंचल, नूपुर, मधुर श्‍ब्‍द करती हुई स्‍वर्णमयी किंकिणी, कड़े, ताटकड़, हार, श्रीकण्‍ठ, अंगूठियाँ और सिर पर दिव्‍य मणिभूषण सुशोभित थे। कालीनागिन को लजाने वाली कृष्‍ण अलकावली की वेणी से युक्त और कपोलों पर चित्रित मनोहर पत्रावलियों से सुशोभित गोप सुन्‍दरियों के साथ अखिल भुवन पति भगवान बलरामजी वहाँ विराजित होकर रास-विहार करने लगे। फिर यमुना के किनारे वन में विचरण और क्रीड़ा करते हुए बलदेवजी के मुख कमल पर पसीने की बूंदें दिखायी देने लगीं। तब उन्‍होंने स्‍न्नान तथा जल-क्रीड़ा करने के लिये दूसरे ही यमुनाजी को पुकारा परंतु यमुना नहीं आयीं।
फिर तो बलदेवजी ने क्रोध में भरकर हल की नोक से यमुनाजी को खींच लिया और कहा ‘आज मैंने तुमको बुलाया, किंतु तुम मेरा अपमान करके नहीं आयी। तुम मनमाना बर्ताव करने वाली हो। अच्‍छा, अभी इस मुसल के द्वारा मैं तुम्‍हारे सौ टुकड़े कर देता हूँ। यमुनाजी को जब बलरामजी ने इस प्रकार डांटा, तब वे अत्‍यन्‍त भयभीत होकर उनके चरण कमलों पर गिर पड़ी और बोलीं- ‘हे लोकाभिराम राम ! हे संकषर्ण ! बलभद्र ! हे महाबाहो।। मैं आपके असीम बल पराक्रम को नहीं जानती थी। आपके एक ही मस्‍तक पर सारा भूखण्‍ड मण्‍डल सरसों के समान पड़ा रहता है। मैं आपके परम प्रभाव से अनभिज्ञ हूँ और आपकी शरण में आयी हूँ। आप भक्तवत्‍सल हैं। मुझे छोड़ दीजिये। इस प्रकार प्रार्थना करने पर गोप राजबलभद्रजी ने यमुना को छोड़ दिया और हथिनियों के साथ गजराज की भाँति वे गोपियों के साथ जलक्रीड़ा करने लगे। तदनन्‍तर उनके यमुना से बाहर निकलने पर यमुनाजी ने आकर उन्‍हें बहुत से नील वस्‍त्र और स्‍वर्ण तथा रत्नों के आभूषण भेंट किये। दुर्योधन ! बलरामजी ने उन सब वस्‍त्राभूषणों को पृथक पृथक गोपियों में बांट दिया और स्‍वयं नीलाम्‍बर तथा नवीन रत्नों से निर्मित स्‍वर्ण माला को धारण करके ऐरावत की भाँति विराजमान हो गये। कौरवेन्‍द्र ! इस प्रकार क्रीड़ारत यादव श्रेष्‍ठ बलरामजी ने वसन्‍त ऋतु की रात्रि को व्‍यतीत किया। जिस प्रकार हस्तिनापुर को देखने पर भगवान बलरामजी के पराक्रम का दर्शन होता है, उसी प्रकार आज तक यमुनाजी टेढ़े मार्ग से प्रवाहित होती हुई उनकी शक्ति को सूचित कर रही हैं। भगवान बलरामजी के इस रासलीला के प्रसंग को जो मनुष्‍य सुनता अथवा सुनाता हैं, वह सारे पापों से मुक्त होकर परमानन्‍द पद को प्राप्‍त होता है। युवराज ! अब क्‍या सुनना चाहते हो।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता श्रीबलभद्र खण्‍ड के अन्‍तर्गत श्री प्राडविपाक मुनि और दुर्योधन के संवाद में ‘श्रीबलरामजी की रासलीला का वर्णन’ नामक नवां अध्‍याय पूरा हुआ।

1. जिसमें पद्धति, पटल, स्‍तोत्र, कवच और सहस्‍त्रनाम साधन के ये पांच अंग होते हैं, उसे ‘पंचांग’ कहते हैं।

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