09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 01 || द्वारका में वेदव्‍यासजी का आगमन और उग्रसेन द्वारा उनका स्‍वागत-पूजन

09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 01 || द्वारका में वेदव्‍यासजी का आगमन और उग्रसेन द्वारा उनका स्‍वागत-पूजन

राजा बहुलाश्व ने कहा- मुने ! भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र के उस भक्ति मार्ग, जो सर्वश्रेष्‍ठ है तथा जिसके प्रभाव से मैं भी भक्त बन जाऊँ, वर्णन कीजिये।

नारदजी बोले- राजन् ! वेदव्‍यासजी के मुख से सुने हुए भक्तिमार्ग का मैं वर्णन करता हूँ। यह वह मार्ग है, जिस पर चलेन से भक्तवत्‍सल भगवान श्रीकृष्‍ण प्रसन्न हो जाते हैं।

जनकजी ! अपने भुजदण्‍डों के बल से उद्धत इन्‍द्र पर विजय प्राप्‍त करके भगवान श्रीकृष्‍ण ने द्वार का में सुधर्मा नाम की दिव्‍य सभा की प्रतिष्‍ठा की थी। राजन् विश्वकर्मा के द्वारा रचे गये वैदुर्यमणि के खंभों की करोड़ों पंक्तियाँ उसके मण्‍डप की शोभा बढ़ाती थीं। वहाँ की भूमि पहराग-मणि से जड़ी गयी थी। उस पर मूंगे की दीवालों से कई विभाग बने थे, जिन पर रंग बिरंगें चँदोवे शोभा दे रहे थे, और मोतियों की झालरें लटकायी हुई थीं। उसकी दीवालें सिंहासन के आकार की थीं। उन पर काले मेघ में कौंधने वाली बिजली का सा प्रकाश फैलाने वाले जाम्‍बूनद सुवर्ण के करोड़ों चमचमाते हुए कलश सुशोभित थे। वहाँ प्रात:कालीन सूर्य की भाँति चमकने वाले रत्नमय केयूर, करधनी, कंकड और नूपुरों से सैकड़ों चन्‍द्रमाओं की प्रभा को छिटकाने वाली गन्‍धर्वों की स्त्रियां हर्ष में भरकर गान किया करती थीं और सुमधुर वाद्यों के साथ विद्याधरियां परस्‍पर लाग-डांट रखती हुई नृत्‍य करती थीं। उसके चारों कोनों में मनोहर देववृक्षों सहित नन्‍दन, सर्वतोभद्र, ध्रौव्‍य एवं चैत्र रथ नामक वन सुशोभित थे। महाराज ! उस सभाप्रदेश के अन्‍तर्गत स्‍वच्‍छ जलवाले लाखों सरोवर तथा भ्रमरों से भरपूर बहुत-से हजार दल वाले कमल दिखायी पड़ते थे। इस प्रकार की वह सुधर्मा सभा ध्‍वजा एवं पताकाओं से अलंकृत तथा दस योजन के विस्‍तार वाली थी। पांच योजन की उसकी ऊंचाई थी। उसमें गया हुआ पुरुष अपने को सर्वश्रेष्‍ठ समझता है।
जिसे वहाँ का सिंहासन उपलब्‍ध हो जाता, वह तो ‘मैं इन्‍द्र हूँ’– यों कल्‍पना करने लगता है। त्रिलोकी में जितने चातुर्य गुण हैं, वे सभी उस पुरुष के शरीर में आकर रहने लगते हैं। वहाँ जितनी देर मनुष्‍य ठहरता है, उतनी देर तक शोक-मोह, जरा मृत्‍यु तथा भूख-प्‍यास- ये छ: प्रकार की ऊर्मियां (विकार) उसके पास नहीं फटकतीं। महाराज ! जितने मनुष्‍य वहाँ प्रवेश करते हैं, उतनी ही बड़ी वह सभा अपने प्रभाव से दिखायी देने लगती है। जनकजी ! यादवों की संख्‍या छप्‍पन करोड़ थी। अनुचरों सहित वे सभी उक्त सभा भवन के आंगन के एक चौथाई भाग में समाये हुए दीख पड़ते थे। महाराज ! जहाँ साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र ही विराजमान रहते थे, उस सभा का वर्णन कौन कर सकता है। उस सभा में एक दिन महाराज उग्रसेन विराजमान थे। करोड़ों यादव उन्‍हें घेरे हुए थे। सूत, मागध और वन्दियों द्वारा महाराज का यशोगान हो रहा था। साक्षात पराशकुमार मुनिवर वेदव्‍यास जी आकाश मार्ग से वहाँ पधारे। उनके शरीर की कान्ति मेघ के समान श्‍यामल थी और वे बिजली के समान पीली जटा धारण किये हुए थे। उन्‍हें देखकर यदुराज तुरंत उठ खड़े हुए और उन्‍होंने हाथ जोड़कर मुनि को प्रणाम किया। फिर उन्‍हें आसन पर बिठाकर तथा पूजा के उपचार समर्पित कर वे मुनि के सामने खड़े हो गये।

राजा उग्रसेन बोले- ब्रह्मन् ! आज आपके यहाँ पधारने पर मेरा जन्‍म, महल तथा धर्माचरण-सब कुछ सफल हो गया। भगवन् ! आप जैसे सदा आनन्‍दस्‍वरूप महानुभावों की कुशल तो स्‍वयं श्रीकृष्‍णचन्‍द्र को अभीष्‍ट है। फिर भी अपनी कुशल कहिये, जिससे मैं निश्चिन्‍त हो जाऊँ। प्रभो ! आपके समान साधुपुरुष जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ वहाँ लौकिकी और पारलौकिकी दोनों प्रकार की सिद्धियाँ रहती ही हैं। मुनीवर व्‍यासजी। जहाँ संत पुरुष एक क्षण भी निवास करते हैं, वहाँ स्‍वयं श्रीहरि रहते हैं; ब्रह्मन् ! फिर लौकिक गुणों की तो बात ही क्‍या है। मुनिवर ! मैंने पूर्वजन्‍म में कौन सा पुण्‍य अथवा यज्ञ किया था, जिसके फलस्‍वरूप मुझे द्वार का राज्‍य प्राप्‍त हो गया। यही नहीं आपके सामने बड़े-बड़े ब्राह्मण देवता मेरे महलों में प्रतिदिन पधारते रहते हैं। इससे मैं अनुमान करता हूँ कि मैंने निस्‍संदेह सबसे बड़ा पुण्‍य किया है।

व्‍यासजी ने कहा- महाराज ! तुम धन्‍य हो तथा तुम्‍हारी निर्मल बुद्धि को भी धन्‍यवाद है। राजन् पूर्वजन्‍म में तुमने सबसे बड़ा पुण्‍य किया था। राज तुम्‍हारा नाम मरुत था। मन में किसी भी प्रकार की कामना न रखकर तुमने विश्वजित नाम का यज्ञ किया था। उससे भगवान श्रीहरि प्रसन्न हुए। तुम्‍हारे निष्‍काम भाव से तुम्‍हें यह परम सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ है। श्रीकृष्‍णचन्‍द्र साक्षात परिपूर्णतम भगवान श्रीहरि ही हैं। अनन्‍त ब्रहाण्‍ड उनके अधीन हैं और वे परात्‍पर प्रभु गोलो के स्‍वामी हैं। वे परम स्‍वतन्‍त्र होने पर भी भक्ति के वशीभूत हो तुम्‍हारे महलों में विराजते हैं। यदुराज ! यही बड़ी विचित्र बात है कि भजन करने वालों को भगवान मुक्ति दे देते हैं, किंतु भक्ति का साधन कभी नहीं देते। राजन् ! इसीलिये भक्तियोग को बहुत दुर्लभ समझो।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीविज्ञान खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद-बहुलाश्व संवाद में ‘द्वारका में श्री वेदव्‍यास का आगमन’ नामक पहला अध्‍याय समाप्‍त हुआ।

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