09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 04 || भक्त-संत की महिमा का वर्णन

09. श्रीविज्ञान खण्‍ड || अध्याय 04 || भक्त-संत की महिमा का वर्णन

श्रीव्‍यासजी बोले- जो आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्‍वी तथा ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणों में भगवान श्रीकृष्‍ण की झांकी करते हुए बार-बार हर्षित होते हैं, करोड़ों काम देवों को मोहित करने वाले- राधा नायक सर्वात्‍मा नन्‍दनदन श्रीकृष्‍णचन्‍द्र उन भक्तों के सामने बोलते हुए दृष्टिगोचर होने लगते हैं। सदा आनन्‍द स्‍वरूप उन भगवान दर्शन प्राप्‍त करके वे अत्‍यन्‍त हर्ष से भर जाते हैं और ठहाका मारकर हंसने लगते हैं। वे कभी बोलते और कभी दौड़ लगाया करते हैं। कभी गाते, कभी नाचते और कभी चुप हो रहते हैं। 

भगवान विष्‍णु के उत्तम भक्त कृतकृत्‍य हो गये रहते हैं। वे भगवान श्रीकृष्‍ण के स्‍वरूप ही होते हैं। उनके दर्शन मात्र से मनुष्‍य कृतार्थ हो जाता हैं। काल अथवा यमराज- कोई भी उन्‍हें दण्ड देने में समर्थ नहीं होता। ऐसे भक्तों के वाम भाग में कौमोद की गदा, दक्षिण में सुदर्शन चक्र, आगे शार्ग्ड धनुष, पीछे बादल की भाँति गर्जने वाला पाच्चजन्‍य शंखनन्‍दन नाम की महान तलवार, शतचन्‍द्र नामक ढाल और अनेकों तीखे बाण- भगवान के ये सभी प्रधान-प्रधान आयुध रात-दिन सजग होकर उनकी रक्षा किया करते हैं। इसी प्रकार महान कमल उनके ऊपर बारंबार छाया करने के लिये प्रस्‍तुत रहता है। उन संतपुरुषों के श्रम को गरुड़जी पंखों की हवा से दूर करते हैं। जहां-जहाँ उपर्युक्त इन महात्‍मा पुरुषों का गमन होता है, वहाँ वहाँ स्‍वयं श्रीहरि पधारते हैं और अपने शोभायुक्त चरण कमलों के पराग से उस भू-भाग को तीर्थ बना देते हैं।
जहाँ संतजन एक क्षण भी ठहरते हैं, वहाँ तीर्थों का निवास हो जाता है। यदि उस स्‍थान पर किसी पापी का भी देहावसान हो जाय तो उसे भगवान श्रीकृष्‍ण इष्‍ट हैं, उनको दूर से ही देखकर आधि-व्‍याधि, भूत, प्रेत और पिशाच दसों दिशाओं में भाग खड़े होते हैं। अनपेक्ष साधु दसों दिशाओं में भाग खड़े होते हैं। अनपेक्ष व्‍यवधान भी सब जगह मार्ग दे देते हैं। जो साधु हैं, ज्ञान में निष्‍ठा रखने वाले हैं, जिनका विषयों से विराग हो चुका है, जिनकी जगत में किसी से शत्रुता नहीं होती- ऐसे महात्‍मा पुरुषों का दर्शन पुण्‍यहीन मनुष्‍यों के लिये अत्‍यन्‍त कठिन है। भगवान श्रीकृष्‍ण का भक्त जिस कुल में उत्‍पन्न होता है, वह कुल स्‍वयं मलिन ही क्‍यों न हो, उसे तुम ब्राह्मणवंश की भां‍ति अत्‍यन्‍त निर्मल समझो। राजन्। भगवान श्रीकृष्‍ण का भक्त तो अपने पितृलोक के दस पुरुषों को तार देता है। इतना ही नहीं, उसके मातृ-कुल तथा पत्नी कुल की भी दस-दस पीढियां नरक यातना एवं पापों के बन्‍धन से मुक्त हो जाती हैं। महात्‍मा पुरुषों के सम्‍बन्‍धी, पोष्‍य वर्ग, नौकर, सुहज्जन, शत्रु, भार ढोने वाले, घर में रहने वाले पक्ष, चीटियां, मच्‍छर तथा कीट-पंतग भी सभी पावन बन जाते हैं।
देवेश्वर भगवान श्रीकृष्‍ण का भक्त ऐसे देश में भी, जो ब्राह्मण के रहने योग्‍य नहीं है तथा जिसमें कृष्‍ण सागर मृग नहीं दिखायी देते अथवा सौ वीर, कीकट, मगध एवं म्‍लेच्‍छों के देश में रहने पर भी लोगों को पवित्र करने वाला होता है। राजन् ! जो संत पुरुषों से सम्‍बन्‍ध रखने वाला हैं, वे ज्ञान योग, धर्म, तीर्थ एवं यज्ञ से वर्जित होते हुए भी भगवान श्री हरि के मन्दिर (धाम) में चले जाते हैं। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्‍ण के भक्तों की महिमा मैंने कह सुनायी। इसके वर्णन से ही मनुष्‍यों को चारों पदार्थ उपलब्‍ध हो जाते हैं। अब आगे क्‍या सुनना चाहते हो।

राजा उग्रसेन ने पूछा- भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र साक्षात परिपूर्णतम परमात्‍मा हैं। दुरात्‍मा दन्‍तवक्र की ज्‍योति उन में लीन हो गयी- ऐसी बात सुनी गयी है। विप्रवर ! यह महान आशश्चर्य की बात हैं; क्‍योंकि महात्‍मा पुरुषों को प्राप्‍त होने योग्‍य सायुज्‍य पद अन्‍य किसी साधारण व्‍यक्ति को, और वह भी एक शत्रु को, कैसे सुलभ हो गया।

श्रीव्‍यासजी बोले- राजन् ! ‘यह मेरा है और यह मैं हूँ- यह विषमता त्रिगुणात्‍मक प्राणियों में रहती हैं; क्‍योंकि वे काम-क्रोधादि में रचे-पचे रहते हैं। परम प्रभु श्रीहरि के अंदर ऐसी भावना नहीं होती। जो किसी भी भाव से भगवान में अपना मन लगाता है, उसे श्रीहरि की सरूपता उपलब्‍ध हो जाती है-ठीक उसी प्रकार, जैसे कीड़ा भृगड़ी के रूप में परिणत हो जाता है। सांख्‍ययोग के साधन के बिना भी मनुष्‍य स्‍न्नेह, काम, भय, क्रोध, एकता तथा सुहृदता का भाव रखकर भगवान में तन्‍मयता प्राप्‍त कर लेते हैं।

राजन् ! नन्‍द–यशोदा आदि ने तथा वसुदेव आदि दूसरे-दूसरे लोगों ने स्‍न्नेह से और गोपियों ने काम भाव से भगवान को प्राप्‍त किया, न कि ब्रह्मभावना से। कारण यह है कि वे भगवान के रूप, गुण एवं माधुर्य भाव में अपना मन भली-भाँति लगाये रहते थे। तुम्‍हारे पुत्र कंस को भय के कारण उनका सायुज्‍य प्राप्‍त हुआ। इस दन्‍तवक्र को और शिशुपाल आदि दूसरों को क्रोध से, तुम सभी यादवों को एकता-सजातीयता के भाव से तथा हम लोगों को सुहद से भगवान सुलभ हुए हैं। अत एव किसी भी उपाय से भगवान श्रीकृष्‍ण में मन लगाना चाहिये। रात-दिन स्‍मरण करते रहना-शत्रु के लिये ही सम्‍भव है; और कहीं ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि दैत्‍यगण भगवान श्रीहरि में शत्रु भाव किया करते हैं।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीविज्ञान खण्‍ड के अन्‍तर्गत नारद-बहुलाश्व संवाद में’ भक्तसंत की महिमा का वर्णन’ नामक चौथा अध्‍याय पूरा हुआ।

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य