09. श्रीविज्ञान खण्ड || अध्याय 10 || परमात्मा का स्वरूप-निरूपण
09. श्रीविज्ञान खण्ड || अध्याय 10 || परमात्मा का स्वरूप-निरूपण
श्री व्यासजी बोले- जिस प्रकार जल में कई चन्द्रमा दिखायी पड़ते हैं, जल के चंचल वेग से वे दृष्टिगोचर होते हैं, किंतु वास्तव में हैं कुछ नहीं, बिलकुल प्रतिबिम्ब मात्र हैं, ठीक वैसे ही परम प्रभु की प्रतिबिम्बरुपी यह माया फैली हुई है। उसी के प्रभाव से ‘मेरा और मैं’ का भाव उत्पन्न हो जाने पर संसार कायम हो जाता है। माया, काल, अन्त:करण और देह से गुणों की उत्पत्ति होती है। मनुष्य इनके द्वारा विपरीत कर्म करता हुआ बन्धन में पड़ जाता है। इन्द्रियों का ही यह प्रभाव है कि दर्पण में बालक, बालू में जल और रस्सी में साँप का भान होने लगता है। राजन् ! यह जगत मोहमय है। इसमें रजोगुण और तमोगुण कूट कूटकर भरे हैं। कभी-कभी सत्त्वगुण का भी प्रादुर्भाव होता है। यह मन का विलास है, विकार मात्र है और भ्रमरूप है। अलात चक्र के समान यह शीघ्रतापूर्वक परिवर्तित होता रहता है- इस प्रकार जानो। ‘मैंने यह कर दिया, यह करता हूँ और यह करुंगा; यह मेरा है, यह तेरा है; मैं सुखी हूं, मैं दु:ख में पड़ गया; लोग मुझसे बिना कारण प्रेम करने वाले हैं’- इस प्रकार मनुष्य कहता रहता है। मेरा तो यह मत है कि मनुष्य अहंकार के कारण सुध-बुध खो बैठा है।
राजा उग्रसेन ने पूछा- ब्रह्मन् ! कृपापूर्वक मुझ से परमात्मा के लक्षणों का वर्णन कीजिये। साथ ही यह भी बताइये कि विद्वानों ने पूजा-पद्धति में भगवान श्रीकृष्ण के लक्षण कितने प्रकार के बतलाये हैं।
श्रीव्यासजी बोले- सनातन प्रभु जन्म और मरण से रहित हैं। शोक और मोह उनके पास भी नहीं फटकते। युवावस्था तथा बुढ़ापा आदि का कोई भेद उनमें नहीं है। अहंकार-मद, दुख-सुख, भय, रोग, क्षुधा, पिपासा, कामना, रति और मानसिक व्याधि इनके वे अविषय हैं।
मुनीश्वरों ने जिस आत्मा को पहचाना है, वह निरीह है, बिना देह का है, सर्वत्र उसकी गति है, वह अहंकार शून्य है, शुद्धबल है, उसमें सभी गुण रहते हैं, वह स्वत: सबसे परे है, निष्फल एवं स्वयं मंगल रूप है और ज्ञान का साकार विग्रह है। वह आत्मा इस जगत के सो जाने पर भी जागता रहता है, यह देहधारी मनुष्य उसे नहीं जानता किंतु वह सबको जानता रहता है। वही आद्यपुरुष है। वह सबको देखता है; किंतु यह प्राणी उसका साक्षात्कार नहीं कर पाता। उस स्वच्छ एवं मल से रहित आत्मा की मैं उपासना करता हूँ।
जिस प्रकार घट से आकाश, काष्ठ से अग्नि एवं धूल से पवन व्याप्त नहीं होता तथा रंगों से स्वच्छ स्फटिकमणि में किसी प्रकार की विरूपता नहीं आती, ठीक वैसे ही यह सनातन पुरुष गुणों के रहते हुए भी उनसे लिपायमान नहीं होता। वह ‘सत्’ शब्द से वाच्य परमात्मा लक्षणा, व्यजना, वाक्चातुरी अर्थों, पदस्फोटपरायण शब्दों तथा सर्वोत्तम गुणियों के द्वारा भी ज्ञान का विषय नहीं होता; फिर लौकिक प्राणी तो उसे जान ही कैसे सकता है भूमण्डल पर उसे कितने लोग ‘कर्ता’ कितने ‘कर्म’ कितने ‘काल’ कितने ‘परम’ सुन्दर’ तथा कितने ‘विचार’ कहते हैं। परंतु वेदान्तज्ञानी तो उसे ‘ब्रह्म’ ही कहते हैं। उस परब्रह्म को काल से उत्पन्न होने वाले गुण स्पर्श नहीं करते। परंतु वेदान्तज्ञानी तो उसे ‘ब्रह्म’ ही कहते हैं। उस परब्रह्म को काल से उत्पन्न होने वाले गुणस्पर्श नहीं करते। माया, इन्द्रिय, चित्त, मन, बुद्धि और महत्व भी उसका ग्रहण नहीं कर सकते, वेद वर्णन नहीं कर पाता तथा अग्नि में चिनगारी की भाँति उसमें सभी प्राणी विलीन हो जाते हैं। वही परमात्मा और भगवान वासुदेव कहते हैं, उन्हीं श्रेष्ठतम देव के स्वरूप का विचार करके मोह छोड़कर आसक्ति रहित होकर विचरे।
जिस प्रकार एक ही चन्द्रमा अनेक जलपात्रों में अलग-अलग दीखता है तथा एक ही अग्नि अनन्त काष्ठों में वर्तमान है, उसी प्रकार एक ही परम प्रभु भगवान अपने द्वारा बनाये हुए विभिन्न जीवों के भीतर एवं बाहर विराज रहे हैं। जिस प्रकार सूर्योदय हो जाने पर रात्रि सम्बन्धी अन्धकार नष्ट होने लगती हैं और घर की वस्तुएं मनुष्यों के दृष्टिगोचर होने लगती हैं, ठीक वैसे ही ज्ञान का प्रादुर्भाव होते ही अज्ञान रूपी अन्धकार भाग जाता है। फिर तो शरीर में ही मनुष्य को ब्रह्म की उपलब्धि हो जाती है। जैसे इन्द्रियों की प्रवृतियां अलग-अलग हैं, उनके भेद से गुणों के एक ही विषय में नाना अर्थ की प्रतीति होती है, उसी प्रकार अनन्त परमप्रभु भगवान का तेजोमय स्वरूप एक ही है, जबकि मुनियों के शास्त्र अनेक हैं, जिनके कारण उसका भेदपूर्वक किया गया है। जो पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्णचन्द्र साक्षात श्रीहरि हैं, अपने कैवल्यनाथ हैं तथा जिन्होंने राजा नृग का उद्धार किया है, उन स्वयं पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्रीनारदजी कहते हैं- इस प्रकार कहकर भगवान वेदव्यासजी ने राजा उग्रसेन से जाने के लिये स्वीकृति ली। तत्पश्चात् सम्पूर्ण यादवों के देखते-देखते वे वहीं अन्तर्धान हो गये। मैंने भगवान श्रीहरि के प्रति भक्ति बढ़ाने वाला यह ‘विज्ञान खण्ड’ तुम्हें कह सुनाया। इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। इसे श्रोतागणों को मोक्ष प्रदान करने वाला कहा गया है गर्गाचार्य ने इसका वर्णन किया है। अतएव गर्ग संहिता नाम से इस ग्रन्थ की प्रसिद्धि हुई यह संहिता सम्पूर्ण दोषों को हरने वाली, (अब तक) गोलोक, वृन्दावन, गिरिराज, माधुर्य, मथुरा, द्वारका, विश्वजित, बलभद्र तथा विज्ञान- इन नौ खण्डों में इसका वर्णन हुआ है। महाराज ! जिस प्रकार नौ उत्तम रसों से भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का श्रीविग्रह विभूषित है तथा भारत आदि नौ वर्षों से पृथ्वी अत्यन्त सुशोभित है, ठीक वैसे ही इन नौ खण्डों द्वारा मुनिप्रणीत यह ‘गर्ग संहिता’ निरन्तर शोभा पा रही है। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण की अंगुलियों में तपाये हुए सुवर्ण की मुद्रि का नौ रत्नों से अलंकृत है, वैसे ही चतुर्वर्ग फल को देने वाली के रूप में यह गर्ग संहिता सर्ग और विसर्ग आदि नौ अंगों से सुशोभित है।
महाराज ! जो पुरुष भक्तिपूर्वक निरन्तर मुनि प्रणीत गर्ग संहिता का श्रवण करते हैं, उन्हें संसार में प्रचुर सुख मिलता है और अन्त में वे गोलोक धाम को चले जाते हैं। यदि वन्ध्या स्त्री भी अनेक पुत्रों की उत्कट लालसा से युक्त हो पीताम्बरधर भगवान श्रीकृष्ण की वन्दना करके इस संहिता का श्रवण करे तो वह शीघ्र ही अपने घर के आंगन में बहुत से बालकों को घुमाती हुई निरन्तर उनके साथ-साथ घुमने लगती है। इस कथा को सुनकर रोगी मनुष्य, रोगों से, भयभीत पुरुष भय से तथा बन्ध प्राप्त पुरुष बन्धन से मुक्त हो जाता है। निर्धन को विपुल सम्पत्ति मिल जाती है और मूर्ख तुरंत ही पण्डित हो सकता है। जो धनाढय राजा कार्तिक के महीने में मुनि प्रणीत ‘गर्ग संहिता’ का श्रवण करता है, निस्संदेह वह चक्रवर्ती राजा हो जायगा और बड़े-बड़े राजा लोग उसकी चरण पादुका को उठाकर रखेंगे। वह मन की चाल के समान तेज चलने वाले सिन्धुवासी घोड़ों और विन्ध्यगिरि पर उत्पन्न होने वाले विशाल हाथियों से सम्पन्न होगा। वैतालिक आदि उसका यशोगान करेंगे और वारवधूजन उसकी सेवा करेंगी। जिसके सोने के सींग हों, तांबे की पीठ हो, चांदी के खुर हों और जिसे आभुषणों से सजाया गया हो- जो प्रत्येक खण्ड को सुनने के बाद ऐसी दो गौओं का दान करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। जनकजी ! वही यदि निष्काम भाव से समूची ‘गर्ग संहिता’ का श्रवण करता है तो भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण उसके हृदय कमल पर सदा निवास करने लगते हैं।
श्रीगर्गजी बोले- ब्रह्मन ! इस प्रकार कहकर दिव्यदर्शी भगवान नारद मुनि राजा बहुलाश्व से अनुमति लेकर सबके देखते-देखते आकाश में चले गये। तब महाराज बहुलाश्व ने भगवान श्रीहरि की इस संहिता को सुनकर श्रीकृष्णचन्द्र में मन लगाये हुए अपने को भली-भाँति कृतकृत्य समझ लिया। ब्रह्मन ! तुम्हारे प्रश्न करने पर मैंने यह संहिता कही है। किन्हीं के द्वारा सुनने अथवा पाठ कराने से भी यह करोड़ यज्ञों का फल देने वाली होती है।
श्रीशौनकजी ने कहा- मुनिवर ! आपका संग मिल जाने पर मैं धन्य एवं कृतार्थ हो गया। साथ ही भगवान श्रीकृष्ण में प्रेम बढ़ाने वाली यह उत्तम भक्ति भी मुझे प्राप्त हो गयी। जो मुनियों के विशाल हृदय रूपी मानसरोवर में विचरने वाले राजहंस हैं, सम्पूर्ण आनन्दों से पूर्ण मधुर नाद करने वाली जिनकी बांसुरी है, जिनकी कला संसार में फैली हुई हैं, जिन्होंने शूरसेन के वंश में अवतार धारण किया है तथा संत पुरुषों ने जिनकी प्रशंसा गायी है, वे अपने बाहुबल से कंस का वध करने वाले भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारी रक्षा करें। इस प्रकार मुनिवर गर्गाचार्य ने सम्पूर्ण मुनियों को आशीर्वाद दिया। साथ ही उनसे आज्ञा माँगी और प्रसन्नमन हो, जाने के लिये तैयार हो गये। फिर सर्ग-विसर्ग आदि नौ अंगों से युक्त ‘गर्ग संहिता’ का, जो स्वर्ग प्रदान करने वाली तथा चारों पदार्थों को देने में कुशल है, प्रतिपादन करके गर्गजी गर्गाचल पर चले गये। मैं भगवान श्रीराधापति के उन युगल चरण कमलों को अपने हृदय में स्थापित करता हूं, जो शरद् ऋतु के विकसित कमलों की शोभा धारण करने के कारण उनके अत्यन्त द्वेष पात्र हो रहे हैं, मुनिरूपी भ्रमर जिनका निरन्तर सेवन करते हैं, जो वज्र और कमल के चिह्नों से आवृत हैं, जिन पर सोने के नूपुर चमक रहे हैं, जिन्होंने भक्तों के ताप का सदा ही निवारण किया है तथा जिनकी दिव्य ज्योति छिटक रही है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीविज्ञान खण्ड के अन्तर्गत नारद बहुलाश्व संवाद में ‘परमात्मा का स्वरूप निरूपण नामक’ दसवां अध्याय पूरा हुआ।
(श्रीगर्ग संहिता के नौ खण्ड पूरे हो गये। ‘अश्वमेध’ का प्रसंग शेष रह गया, उसे सुनाने के लिये महर्षि गर्गाचार्यजी पुन: कथा का आरम्भ करेंगे और अश्वमेध खण्ड सुनायेंगे। तब गर्ग संहिता पूर्ण होगी)
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