10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 01 || अश्वमेध-कथा का उपक्रम; गर्ग वज्रनाभ संवाद
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 01 || अश्वमेध-कथा का उपक्रम; गर्ग वज्रनाभ संवाद
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।।1।।
नम: श्रीकृष्णचन्द्राय नम: संकर्षणाय च।
नम: प्रद्युम्नदेवायानिरुद्धाय नमो नम:।।2।।
सर्वव्यापी भगवान नारायण, नरश्रेष्ठ नर, उनकी लीलाकथा को भाषा में अभिव्यक्त करने वाली वाग्देवता सरस्वती तथा भगवदीय लीलाओं का विस्तार से वर्णन करने वाले मुनिवर वेदव्यास को प्रणाम करके जय (इतिहास पुराण आदि) का उच्चारण करे। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार, संकर्षण को भी नमस्कार, प्रद्युम्नदेव को नमस्कार तथा अनिरूद्ध को भी नमस्कार है।
श्रीगर्गजी कहते हैं- एक समय की बात है, ऋषियों की सभा में रोमहर्षण सूत के पुत्र उग्रश्रवाजी पधारे। उन्हें आया हुआ देख शौनकजी ने उन्हें प्रणाम किया और (कुशल-प्रश्न के अनन्तर) अभिवादनपूर्वक इस प्रकार कहा।
शौनक बोले- महामते ! आपके मुख से मैंने सम्पूर्ण शास्त्र, पुराण तथा श्रीहरि के नाना प्रकार के निर्मल लीलाचरित्र सुने। पूर्वकाल में गर्गाचार्यजी ने मेरे सामने गर्ग संहिता सुनायी थी, जिसमें श्रीराधा और माधव की महिमा का अनेक प्रकार से और अधिकाधिक वर्णन हुआ है। सूतनन्दन ! आज मैं पुन: आपसे सब दु:खों को हर लेने वाली श्रीकृष्ण की कथा सुनना चाहता हूँ। आप सोच-विचारकर वह कथा मुझसे कहिये।
श्रीगर्गजी कहते हैं- शौनकजी के साथ अठासी हजार ऋषियों ने भी जब यहीं जिज्ञासा व्यक्त की, तब रोमहर्षणकुमार सूत ने भगवान श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों का स्मरण करके इस प्रकार कहा।
सौति बोले- अहो शौनकजी ! आप धन्य हैं, जिनकी बुद्धि इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्र के युगल चरणारविन्दों का मकरन्दपान करने के लिए लालायित है। वैष्णवजनों का समागम प्राप्त हो इस देवता लोग श्रेष्ठ बताते हैं; क्योंकि वैष्णवों के संग से भगवान श्रीकृष्ण की वह कथा सुनने को मिलती है, जो समस्त पापों का विनाश करने वाली है।
श्रीकृष्णचन्द्र का चरित्र समस्त कल्मषों का निवारण करने वाला है। उसको थोड़ा-थोड़ा ब्रह्माजी जानते हैं और थोड़ा-ही-थोड़ा भगवान उमावल्लभ शिव। मेरे जैसा कोई मच्छर उसे क्या जान सकेगा ? भगवान वासुदेव की लीला-कथा एक समुद्र है, तिसमें डूबकर मोहित ब्रह्मा आदि देवता भी कुछ कह नहीं सकेंगे। (फिर मुझ जैसा मनुष्य क्या कुछ कह सकता है ?) यादवराज भूपाल शिरामणी उग्रसेन के यज्ञप्रवर अश्वमेध का अनुष्ठान देखकर लौटे हुए गर्गाचार्य ने एक दिन अपने मन का उद्गार इस प्रकार प्रकट किया- ‘यादवश्रैष्ठ ! राजा उग्रसेन धन्य हैं, जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से द्वारकापुरी में क्रतुश्रेष्ठ अश्वमेध का सम्पादन किया। उस यज्ञ को देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ है। मैंने अपनी संहिता में परिपूर्णतम भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष देखी सुनी लीला-कथाओं का ठीक वैसा ही वर्णन किया है। उस संहिता में मैंने अश्वमेध यज्ञ की कथा का उल्लेख नहीं किया है, अत: अब पुन: उस अश्वमेध की ही कथा कहूंगा। कलियुग में उस कथा के श्रवणमात्र से भगवान श्रीकृष्ण मनुष्यों का शीघ्र ही भोग तथा मोक्ष प्रदान करतें हैं।
शौनक ! ऐसा कहकर श्रीगर्गमुनि ने श्रीकृष्ण भक्ति से प्रेरित हो उग्रसेन के अश्वमेध यज्ञ की कथा कही। ‘अश्वमेध चरित्र’ का उन्होंने एक सुन्दर नाम रख दिया- ‘सुमेरू’। मुने ! ऐसा करके भगवान गर्गाचार्य कृतकृत्य हो गये। यादवकुल के परम गुरु तथा बुद्धिमानों में श्रेष्ठ गर्गमुनि ने आठ दिनों तक अश्वमेध यज्ञ की कथा कही; फिर वे नरेश्वर वज्र से मिलने के लिए श्रीहरि की मथुरापुरी में आये। ज्ञानशिरोमणी गर्गमुनि को वहाँ आकाश से उतरा देख वज्रनाभ ने द्विजों के साथ उठकर उन्हें नमस्कार किया। बैठने के लिए सोने का सिंहासन देकर उन्होंने गुरुजी के दोनों चरण-कमल पखारे और फूल-मालाओं से मुनि का पूजन करके उन्हें मिष्टान्न निवेदन किया। सोलह वर्ष की अवस्था और सुपुष्ट शरीर वाले विशालबाहु श्यामसुन्दर कमलनयम वज्रनाभ ने गुरु के चरणोदक को लेकर सिर पर रखा और दोनों हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा। वज्रनाभ सौ सिंहों के समान उद्भट शक्तिशाली थे।
वज्रनाभ ने कहा- ब्रह्मन ! आपको नमस्कर है। आपका स्वागत है। हम आपकी क्या सेवा करें ? मैं आपको भगवत्स्वरूप मानता हूँ। आप ब्रह्मर्षियों में परमश्रेष्ठ हैं। गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु रुद्र हैं, गुरु ही बृहस्पति हैं तथा गुरुदेव साक्षात नारायण हैं; उन श्रीगुरु को नमस्कार है। मुनिश्रेष्ठ ! मनुष्यों के लिए आपका दर्शन दुर्लभ है। देव ! विशेषत: हम जैसे विषयासक्त चित्तवाले लोगों के लिए तो वह अत्यंत दुर्लभ है। गर्गाचार्य ! मेरे कुल के आचार्य ! तेजस्विन ! योगभास्कर आपके दर्शनमात्र से हम कुटुम्ब सहित पवित्र हो गये। यदुकुलतिलक राजा वज्रनाभ का वचन सुनकर मुनीन्द्रवर्य महान महात्मा ने श्रीहरि के चरणारविन्द का चिंतन करते हुए तत्काल नृपश्रेष्ठ वज्रनाभ से प्रसन्नतापूर्वक कहा- ‘युवराज ! महाराज ! यदुवंशशिरोमणी ! तुमने सब सत्कर्म ही किया है; पृथ्वी पर रहने वाले सब लोगों का पालन किया है। वत्स ! तुमने भूतल पर धर्म को स्थापित किया है। विष्णुरात (दिल्लीपति परीक्षित) तुम्हारे मित्र होंगे तथा अन्य नरेश भी तुम्हारे वश में रहेंगे। नृपश्रेष्ठ ! तुम धन्य हो, तुम्हारी मथुरापुरी धन्य है, तुम्हारी सारी प्रजाएं धन्य हैं तथा तुम्हारी वज्रभूमि धन्य है। तुम श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरूद्ध का भजन करते हुए उत्तम भाग भोगो। नरेश्वर ! निश्शंक होकर राज्य करो’।
उग्रश्रवा सूत कहते हैं- गर्गजी की यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा वज्रनाभ श्रीकृष्ण, संकर्षण, पितामह प्रद्युम्न तथा पिता अनिरूद्ध का विरहावस्था में स्मरण करके गद्गदकण्ठ हो गये। गर्ग ने देखा, राजा वज्रनाभ दु:खी हो नीचे की ओर मुख किये भूमि पर खड़े हैं। यह देख उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और वे उनका दु:ख शान्त करते हुए से बोले।
गर्ग ने पूछा- राजेन्द्र ! क्यों रो रहे हो ? मेरे रहते तुम्हें क्या भय हैं ? तुम अपने दु:ख का समस्त कारण मेरे सामने कहो। उनकी यह बात सुनकर भी राजा दु:खमग्न होने के कारण कुछ बोल न सके। जब गुरु ने पुन: पूछा तो वे गद्गदकण्ठ में इस प्रकार बोले।
राजा ने कहा- देव ! श्रीकृष्ण–संकर्षण आदि समस्त यादव मुझे यहाँ छोड़ परलोक में चले गये, यह सोचकर ही मैं दु:खी हो गया। ब्रह्मन ! स्वामी, अमात्य, मित्र, राष्ट्र (जनपद), कोष, दुर्ग और सेना-राजा के सातों अंग मुझ एकाकी के लिये प्रीतिकारक नहीं होते हैं। मैंने भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र न तो देखा है और न किसी से सुना ही है; आप वह चरित्र मुझसे कहिये। मैंने अपनी आँखो से तो केवल यादवों का संहार देखा है, अत: मेरा दु:ख दूर नहीं हो रहा है। चतुर्व्यूह-रूपधारी श्रीहरि पहले जिस पुरी को सुशोभित किया था, वह भी समुद्र में डूब गयी और भगवान श्रीकृष्ण भी भक्ति के परमधाम गोलोक को चले गये। शिष्य वत्सल गुरुदेव ! आप ही बताइये, अब मैं किसके लिए जीवित रहूँ। आज ही वन को जाता हूँ। मेरे मन में राज्य करने की इच्छा नहीं है।
सूतजी कहते हैं- यदुकुल शिरामणी वज्रनाभ की यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ महात्मा गर्ग ने उनकी प्रशंसा की और उनका दु:ख शान्त करते हुए-से वे संतुष्ट गर्गमुनि राजा वज्रनाभ से बोले।
गर्ग ने कहा- वृष्णिवंशतिलक ! मेरी बात सुना; यह शोक का विनाश करने वाली है। समस्त पापों को हरने वाली, पवित्र तथा शुभ है। तुम सावधानी के साथ इस श्रवन करो। पूर्वकाल में जो भगवान श्रीकृष्णचन्द्र कुशस्थली (द्वारका) पुरी में विराजते थे वे सदा और सर्वत्र विराजमान हैं। भूपते ! अब तुम भक्तिभाव से उनको देखो। आज मैं तुम्हें भगवान की वह कथा सुनाऊँगा, जो भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है। वसुधानाथ ! श्रीकृष्ण तथा बलरामजी की वह उत्तम कथा सुनो।
सूतजी कहते हैं- विप्रवर शौनक ऐसा कहकर भगवान गर्ग ने वज्रनाभ को नौ दिनों तक अपनी पवित्र संहिता सुनायी।
इस प्रकार श्रीमद् गर्ग संहिता में अश्वमेध चरित्र सुमेरू प्रसंग में ‘गर्ग वज्रनाभ संवाद’ नामक पहला अध्याय पूरा हुआ।
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