10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 02 || श्रीकृष्‍णावतार की पूर्वार्द्धगत लीलाओं का संक्षेप से वर्णन

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 02 || श्रीकृष्‍णावतार की पूर्वार्द्धगत लीलाओं का संक्षेप से वर्णन

सूतजी कहते हैं- इस प्रकार गर्गमुनि‍ के मुख से श्रीगर्ग संहि‍ता की कथा सुनकर राजा वज्रनाभ मन-ही-मन बड़े प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने गुरु गर्गाचार्य के चरणों में प्रणाम करके उनसे इस प्रकार कहा- ‘प्रभो ! मुनि‍श्रेष्‍ठ ! आज मैंने आपके मुखारवि‍न्‍द से जो भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र का चारू चरि‍त्र सुना है, उससे मेरे सारे दु:ख दूर हो गये। कृपानाथ ! मैं इस कथा-श्रवण से अतृप्‍त रह गया हूं; अत: मेरा मन पुन: श्रीहरि‍ के यश को सुनने के लि‍ए उत्‍सुक है। आप कृपापूर्वक श्रीकृष्‍ण के परम उत्‍तम चरि‍त्र का वर्णन कीजि‍ये। मुने ! द्वारका में महाराज उग्रसेन ने पहले अश्‍वमेध का यज्ञ का अनुष्‍ठान कि‍या था, उसके वि‍षय में कुछ बातें मैंने पूर्वकाल में सुनी थी। आप उस अश्‍वमेध यज्ञ का ही सम्‍पूर्ण चरि‍त्र या वृतान्‍त मुझ से कहि‍ये। मुनीश्‍वर ! करूणामय गुरुजन अपने सेवापरायण शि‍ष्‍यों तथा पुत्रों से उनके पूछे बि‍ना भी गूढ़ रहस्‍य कर बातें बता दि‍या करते हैं'।

सूतजी कहते हैं- यदुकुलगुरु गर्गमुनि‍ वज्रनाभ का ऐसा वचन सुनकर बड़े प्रसन्‍न हुए और श्रीहरि‍ के युगलचरणारवि‍न्‍दों का स्‍मरण करते हुए उन राजाधि‍राज से इस प्रकार बोले।

गर्गजी ने कहा- यादवश्रेष्‍ठ ! तुम धन्‍य हो; क्‍योंकि‍ भगवान श्रीकृष्‍णचन्‍द्र के चरणों में तुम्‍हारी ऐसी अवि‍चल भक्‍ति‍ हुई हैं, जो दूसरे मनुष्‍यों के लि‍ए दुर्लभ है। वह भक्‍ति‍ तुम्‍हें सहज सुलभ है, यह बड़े सौभाग्‍य की बात है। राजन ! इस वि‍षय में मैं तुमसे प्राचीन इति‍हास बता रहा हूँ, उसे सुनो। उसका श्रवण कर लेने मात्र से मनुष्‍य समस्‍त पापों से छुटकारा पा जाता है। राजन ! द्वार पर पापि‍यों के भार से पीड़ि‍त हुई वसुन्‍धरा ने ब्रह्माजी के सामने अपना दु:ख प्रकट कि‍या। उसे सुनकर ब्रह्माजी श्रीहरि‍ की शरण में गये और वहाँ उन्‍होंने पृथ्‍वी का सारा कष्‍ट कह सुनाया। वह सब सुनकर श्रीराधि‍कावल्‍लभ श्रीकृष्‍ण ने वसुधा को आश्‍वासन दिया और देवताओं के सहयोग से उसका भार उतारने का नि‍श्‍चय कि‍या। तदनन्‍तर मथुरा में वसुदेव का देवकी के साथ वि‍वाह हुआ; फि‍र कंस को सावधान करने वाली आकाशवाणी हुई। देवकी के पुत्र से अपने वध की बात जानकर कंस ने क्रमश: उसके छ: पुत्र मार डाले। नरेश्‍वर ! कंस को भय होने लगा और उस भय के आवेश में उसे सर्वत्र कृष्‍ण ही कृष्‍ण दीखने लगे। इसके बाद भगवान ने योगमाया को आज्ञा दी, जि‍सके अनुसार उसने देवकी के गर्भ का संकर्षण करके रोहि‍णी के गर्भ मे उसे स्‍थापि‍त कर दि‍या और स्‍वयं वह यशोदा के गर्भ से कन्‍या के रूप में प्रकट हुई। इधर भगवान देवकी के गर्भ में आवि‍ष्‍ट हुए और ब्रह्मा आदि‍ देवताओं ने आकर उनकी स्‍तुति‍ की।
 
फि‍र श्रीकृष्‍ण का प्राकट्य हुआ। भगवान के बालकृष्‍णरूप की दि‍व्‍य झांकी का वर्णन ऋषि‍ वेदव्‍यास द्वारा कि‍या गया है। वसुदेव ने भगवान के उस दि‍व्‍य स्‍वका स्‍तवन कि‍या। जगदीश्‍वर श्रीकृष्‍ण ने देवकी और वसुदेव के पूर्वजन्‍म सम्‍बन्‍धी पुण्‍यकर्मों का वर्णन कि‍या। तदनन्‍तर भगवदीय आज्ञा के अनुसार वसुदेवजी बालकृष्‍ण को गोकुल पहुँचा आये और वहाँ से यशोदा की कन्‍या उठा लाये। कंस ने उस कन्‍या को पत्‍थर पर दे मारा; परंतु वह आकाश में उड़ गयी और कंस को यह बताती गयी की ‘तेरा काल कहीं प्रकट हो चुका है’। कंस का नि‍कट जाकर वसुदेव को बन्‍धन मुक्‍त कर देना आदि‍ बातें घटि‍त हुई। कंस ने दैत्‍यों की सभा में दुष्‍तापूर्ण मन्‍त्रणा की और साधुपुरुषों तथा बालकों के प्रति‍ उपद्रव प्रारम्‍भ करवाया। व्रज में श्रीकृष्‍ण का प्राकट्य होने पर व्रजराज नन्‍द के भवन में महान उत्‍सव मनाया गया। नन्‍दराजजी राजा कंस को भेंट देने के लि‍ए मथुरा गये और वहाँ वसुदेवजी के साथ उनकी भेंट हुई। उधर गोकुल में वि‍षमि‍श्रि‍त स्‍तनपान कराने के लि‍ए आयी हुई पूतना के प्राणों को भगवान उसके दूध के साथ ही पी गये। उसके मरे हुए शरीर को देखकर मथुरा से लौटे हुए नन्‍दादि‍गोपों को बड़ा वि‍स्‍मय हुआ। उसक बाद एक दि‍न श्रीकृष्‍ण के पैरों का हल्‍का-सा आघात पाकर दूध-दही के मटकों से भरा हुआ छकड़ा उलट गया। बवंडर-रूपधारी ‘तृणावर्त’ नामक दैत्‍या का शि‍शु श्रीकृष्‍ण के हाथों वध हुआ। एक दि‍न मैया यशोदा बाल-कृष्‍ण को लाड़ प्‍यार कर रही थीं।

इतने में ही उन्‍हें जंभाई आयी और उनके मुख में माता को सम्‍पूर्ण वि‍श्‍व का दर्शन हुआ। तदनन्‍तर बलराम और श्रीकृष्‍ण के नामकरण संस्‍कार हुए। फि‍र वज्रभूमि‍ में दन दोनों भाइयों की बालक्रीड़ा होने लगी। गोपांगनाओं के घरों में घूसकर धुर्ततापूर्ण व्‍यवहार दही-माखन चुराने के खेल चलने लगे। प्रसंगवश कि‍सी दि‍न मि‍ट्टी खा ली और माता को मुख में सम्‍पूर्ण वि‍श्‍व का दर्शन कराया। नन्‍द और यशोदा को श्रीकृष्‍ण के लालन-पालन का सुख कैसे सुलभ हुआ, इस प्रसंग में उन दोनों के पूर्वजन्‍म सम्‍बन्‍धी सौभाग्‍यवर्धक सत्‍कर्म की चर्चा हुई। माखन की चोरी, रस्‍सी से कमर में बलपूर्वक बांधा जाना, ‘यमलार्जुन’ नामक वृक्षों का भंग होना, उनके शाप की नि‍वृत्‍ति‍, उन दोनों के द्वारा भगवान की स्‍तुति‍, बालक्रीड़ा, उपनन्‍द आदि‍ की मन्‍त्रणा, वहाँ से वृन्‍दावनगमन, वहाँ समवयस्‍क ग्‍वालबालों के साथ बछड़े चराना, उसी प्रसंग में वत्‍सासुर, वकासुर और अघासुर का वध, सखाओं के साथ श्रीहरि‍ का यमुना तट पर प्रशंसापूर्वक भोजन, ब्रह्माजी के द्वारा बछड़ों और ग्‍वालबालों का हरण, श्रीकृष्‍ण का स्‍वयं ग्‍वालबाल और बछड़े बन जाना, बह्मा का जाना और फि‍र मोहनि‍वृत्‍त होने पर लौटकर भगवान की स्‍तुति‍ करना, श्रीकृष्‍ण का गोपबालकों के साथ वि‍हार तथा वज्र में गमन, गोचारण के प्रसंग में बड़ी-बड़ी क्रीडाएं, धेनुकासुर आदि‍ का वध, संध्‍या के समय व्रज में आगमन तथा श्रीकृष्‍ण का गोपीजनों के नेत्रों में महान उत्‍सव प्रदान करना आदि‍ वृतान्‍त घटि‍त हुए।

कालि‍यनाग के वि‍ष से दूषि‍त जल को पीने से मरे हुए गोपों को श्रीहरि‍ ने जि‍लाया; कालि‍यनाग का दमन कि‍या। उस समय नगरपत्‍नि‍यों ने भगवान की स्‍तुति‍ की और उनके साथ वार्तालाप कि‍या। फि‍र इस बात का वर्णन कि‍सा की यमुना के हृदय में कालि‍यनाग का सम्‍बन्‍ध कैसे हुआ ? तदनन्‍तर मुजांटवी में फैली हुई दावाग्‍नि‍ को जीवन की रक्षा की, इस बात का प्रति‍पादन हुआ है।

खेल-खेल में ही प्रलम्‍बासुर का वध, दावानल से गौओं की रक्षा, वर्षा-वर्णन, शरद-वर्णन, गोपीगीत, गोकुल की गोप-कि‍शोरि‍यों द्वारा कात्‍यायनी व्रत का अनुष्‍ठान, उनके वस्‍त्रों का अपहरण, वृन्‍दावन के सौभाग्‍य का वर्णन ग्‍वालबालों का भगवान से भोजन माँगना और भगवान का उन्‍हें ब्राह्मणों के यज्ञ में भेजना, ब्राह्मण पत्‍नि‍यों पर भगवान का कृपा-प्रसाद, ब्राह्मणों का अपनी मूढ़ता के लि‍ये पश्‍चाताप, इन्‍द्र के यज्ञ की प्रथा मि‍टाकर गोवर्धन पूजन क्रम चलाना, कुपि‍त हुए इन्‍द्र द्वारा की गयी घोर वृष्‍टि‍ से वज्रवासि‍यों की रक्षा के लि‍ये भगवान का गोवर्धन पर्वत को छत्र की भाँति‍ धारण करना, देवराज इन्‍द्र के गर्व को चूर्ण करना, महर्षि‍ गर्ग के द्वारा नंदराय के यहाँ उत्‍पन्‍न श्रीकृष्‍ण -बलराम के भावी जातकोक्‍त फल का वर्णन, गोपों की शंका, भगवान के द्वारा उसका नि‍वारण, इन्‍द्रधनु सुरभि‍ के द्वारा भगवान का गोवि‍न्‍द-पद पर अभि‍षेक और स्‍तवन, नन्‍दजी को वरूणलोक से छुड़ाकर लाना, गोपों को वैकुण्‍ठलोक में ले जाकर उसका दर्शन कराना, पांच अध्‍यायों में रात में होने वाली रासक्रीड़ा का वर्णन, नन्‍द का अजगर के मुख से उद्धार, शंखचूड़ का वध, गोपि‍यों के युगलगीत, अरि‍ष्‍टासुर का वध, कंस और नारद का संवाद, कंस और अक्रूर की बातचीत, श्रीकृष्‍ण के द्वारा केशी का वध, नारद-ऋषि‍ का श्रीकृष्‍ण से वार्तालाप, व्‍योमासुर का वध, अक्रूर का गोकुल में आगमन, व्रज के दर्शनजनि‍त आनन्‍द से उनके शरीर का पुलकि‍त होना, अन्‍त:करण का हर्ष से खि‍ल उठना, रोमांच होना, गद्गदवाणी में बोलना, बलराम और श्रीकृष्‍ण के साथ उनकी बातचीत, उनके द्वारा कंस की चेष्‍टाओं का वर्णन, बलराम और श्रीकृष्‍ण का मथुरा को प्रस्‍थान, गोपि‍जनों का वि‍लाप, मथुरागमन, मार्ग में ही यमुना के हृद में प्रवि‍ष्‍ट हुए अक्रूर को भगवान श्रीकृष्‍ण का दर्शन, उनके द्वारा श्रीकृष्‍ण की स्‍तुति‍, फि‍र उन सबका मथुरापुरी में आगमन, नगर का दर्शन, नगर की सम्‍पत्ति‍ का वर्णन, रजक का शि‍रश्‍छेदन, दर्जी को वरदान, सुदामा माली को वरदान, कुब्‍जा को श्रीकृष्‍ण का दर्शन, कंस के दुर्नि‍मि‍तों का दि‍खायी देना, कंस का रंगोत्‍सव, कुवलयापीड़ नामक हाथी का युद्ध में मारा जाना, पुरवासि‍यों को बलराम और श्रीकृष्‍ण का दर्शन, उनके प्रति‍ नागरि‍कों के मन में प्रेम की वृद्धि‍, रंगशाला में मल्‍लों का मारा जाना, बनधुओं सहि‍त कंस का वध, श्रीकृष्‍ण-बलराम द्वारा माता-पि‍ता को आश्‍वासन तथा समस्‍त सुहृदों को तोषदान, उग्रसेन का राजा के पद पर अभि‍षेक, नन्‍द आदि‍ गोपों को वज्रभूमि‍ की ओर लौटना, श्रीकृष्‍ण-बलराम का किंचि‍त द्वि‍जाति‍-संस्‍कार गुरु के घर जाकर वि‍द्याध्‍ययन, उनके मरे हुए पुत्र को यमलोक से लाकर लौटाना, इसी प्रसंग में ‘पंचजन’ नामक दैत्‍य का वध, पुन: श्रीकृष्‍ण का मथुरा आगमन, मधुपुरी में महान उत्‍सव, उद्धव द्वारा उन्‍हें सान्‍त्‍वना-प्रदान, वज्रवासि‍यों से मि‍लने के लि‍ए श्रीकृष्‍ण का नन्‍द के गोकुल में आना, फि‍र कोलदैत्‍य का वध, कुब्‍जा-मि‍लन, अक्रूर को हस्‍ति‍नापुर भेजना तथा पाण्‍डवों के प्रति‍ वि‍षमतापूर्ण बर्ताव रोकने के लि‍ए धृतराष्‍ट्र को समझाना इत्‍यादि‍ प्रसंगों का वर्णन कि‍या गया है।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहि‍ता में अश्‍वमेध चरि‍त्र सुमेरू में ‘श्रीकृष्‍ण लीलाओं का वर्णन’ नामक दूसरा अध्‍याय पूरा हुआ।

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