10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 03 || जरासंध के आक्रमण से लेकर पारिजात-हरण तक की श्रीकृष्ण लीलाओं का संक्षिप्त वर्णन
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 03 || जरासंध के आक्रमण से लेकर पारिजात-हरण तक की श्रीकृष्ण लीलाओं का संक्षिप्त वर्णन
गर्गजी कहते हैं- राजन ! अपने दामाद कंस के वध का समाचार सुनकर राजा जरासंध संतप्त हो उठा। उसने कई अक्षौहिणी सेनाएं लेकर मथुरापुरी पर अनेक बार आक्रमण किया और उसकी समस्त सेनाओं का श्रीकृष्ण और बलराम ने संहार कर डाला। उभय पक्ष की सेनाओं में बारंबार युद्ध का अवसर आने पर श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा द्वारा समुद्र में ‘द्वारका’ नामक दुर्ग की रचना करवायी। इसी बीच में कालयवन का भी आक्रमण हुआ और मुचुकुन्द द्वारा उसका वध करवाकर भगवान ने उनके मुख से अपना स्तवन सुना; फिर उन्हें वर देकर बदरिकाश्रम भेज दिया और वहाँ से लौटकर म्लेच्छ सैनिकों का वध करके उन सबका धन द्वारकापुरी में पहुँचाने की व्यवस्था की। इतने में ही घमंडी राजा जरासंध का पहुँचा। भगवान किसी विशेष अभिप्राय से अब की बार युद्ध छोड़कर उसके सामने से पलायन कर गये। ‘रैवत’ नाम वाले राजा ने द्वारकापुरी में आकर अपनी कन्या रेवती बलदेवजी के हाथ में समर्पित कर दी। एक समय राजकुमारी रुक्मिणी का प्रेम-संदेश सुनकर भगवान श्रीकृष्ण कुण्डिनपुर में गये और वहाँ अम्बिका देवी के मन्दिर से अपनी प्रेयसी रुक्मिणी का अपहरण करके, वहाँ के समस्त राजाओं का जीतकर द्वारकापुरी को निकल गये। तब राजाओं ने चेदिराज शिशुपाल को सान्त्वना दी और उसे चुपचाप घर लौट जाने को कहा। तत्पश्चात एक विशेष प्रतिज्ञा के साथ रूक्मी युद्ध के मैदान में उतरा। श्रीकृष्ण ने पहले तो उसके साथ युद्ध किया; फिर उसे रथ में बांधकर उसका मुण्डन कर दिया। इससे रुक्मिणी को बड़ा दु:ख हुआ। बलरामजी ने समझा-बुझाकर उन्हें शान्त किया और बलरामजी के ही कहने पर रुक्मी को बन्धन से छुटकारा मिला। इसके बाद द्वारकापुरी में पहुँचकर श्रीकृष्ण का रुक्मिणी के साथ बड़े आनन्द से विधिपूर्वक विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात प्रद्युम्न की उत्पत्ति कही गयी। उनका सूति-कागार से अपहरण हुआ। मायावती के कथन से अपने पूर्व-वृतान्त को जानकर प्रद्युम्न ने शम्बरासुर का वध किया, फिर वे अपने घर लौट आये। इससे द्वारकावासियों को बड़ा संतोष हुआ। सत्राजित नामक यादव ने भगवान को सूर्य की कृपा से स्यमन्तकमणि प्राप्त की।
उसे एक दिन श्रीहरि ने मांगा। उसी मणि को अपने गले में बांधकर सत्राजित के छोटे भाई प्रसेनजित शिकार खेलने के लिए गये। वहाँ एक सिंह ने उनको मार डाला। इससे श्रीहरि पर कलंक आया। उसका मार्जन करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण वन में ऋक्षराज की गुफा में गये। वहाँ उन दोनों में घोर युद्ध हुआ। जाम्बवान ने यह जानकर कि ‘ये कोई साधारण मनुष्य नहीं, साक्षात भगवान है’ इन्हें अपनी कन्या जाम्बवती समर्पित कर दी। भगवान को जाम्बवान की गुफा से जो मणि प्राप्त हुई थी, उसे उन्होंने सत्राजित के यहाँ पहुँचा दिया। सत्राजित ने अपनी बेटी सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और दहेज में वह मणि उन्हें दे दी। तदनन्तर एक दिन बलरामजी के साथ श्रीकृष्ण ने हस्तिनापुर की यात्रा की। इसी बीच में अक्रूर और कृतवर्मा की प्रेरणा से शतधन्वा ने सत्राजित को मार डाला। यह समाचार पाते ही श्रीकृष्ण ने तत्काल शतधन्वा को भी मौत के घाट उतार दिया। बलरामजी मिथिला में रहकर दुर्योधन को गदायुद्ध की शिक्षा देने लगे। इधर भगवान श्रीकृष्ण अक्रूर को मणि देकर स्वयं इन्द्रप्रस्थ चले गये। वहाँ उन्हें कालिन्दी की प्राप्ति हुई। उसके साथ श्रीहरि ने अपनी द्वारकापुरी में विवाह किया। इसी प्रकार मित्रबन्धा और सात्या के साथ भी उनका विवाह हुआ। तदनन्तर भद्रा और लक्ष्मणा का विवाह भी श्रीहरि के साथ हुआ। एक समय श्रीकृष्ण ने देवराज इन्द्र को जीतकर उसके परिजात को ले लिया और उसे द्वारकापुरी में लाकर अपनी प्रिया सत्यभामा को दे दिया।
वज्रनाभ ने पूछा- मुने ! भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इन्द्र को जीतकर उनके कल्पवृक्ष या पारिजात को लाकर जो अपनी प्रिया सत्यभामा को दिया, उसका क्या कारण है ? यह सार कथा मुझे विस्तारपूर्वक सुनाइये।
श्रीगर्गजी ने कहा- किसी समय देवर्षि नारद स्वर्ग से पारिजात का एक फूल लेकर द्वारकापुरी में आये वह फूल लेकर श्रीकृष्ण ने अपनी पटरानी श्रीरुक्मिणीजी के हाथ मे दे दिया। इससे सत्यभामा को बड़ा दु:ख हुआ। वे कोपभवन में चली गयीं। श्रीकृष्ण वहाँ जाकर कुपित हुई सत्यभामा से मिले और बोले- ‘तुम दु:ख न मानो, मैं तुम्हें पारिजात का वृक्ष ही लाकर दे दूँगा।’ उसी समय इन्द्र ने आकर श्रीकृष्ण के समक्ष भौमासुर की सारी चेष्टाएँ बतायीं। यह सुनकर भगवान ने हाथ जोड़ इन्द्र की ओर देखते हुए कहा।
श्रीकृष्ण बोले- ‘वृत्रसूदन ! देखिये, मेरी प्रिया सत्यभामा दु:खी होकर रो रही है। इसका यह रोदन पारिजात वृक्ष के लिये ही है। बताइये, मैं क्या करूँ ? हरे ! यदि आप सत्यभामा के लिये पारिजात वृक्ष दे देंगे तो मैं सेना सहित भौमासुर का संहार कर डालूँगा, इसमें संशय नहीं है। श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर देवराज इन्द्र जोर-जोर से हंसते हुए बोले।
इन्द्र ने कहा- श्रीकृष्ण ! तुम नरकासुर का वध करके नन्दवन में जो-जो पारिजात के वृक्ष है, उन सबको स्वत: ले लेना। ‘एवमस्तु’ कहकर भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड के कंधे पर आरूढ़ हो प्राग्ज्योतिषपुर की ओर चल दिये। जब इन्द्र स्वर्ग को लौट गये, तब सत्यभामा ने स्वयं श्रीहरि से कहा।
सत्यभामा बोली- ‘जगत्पते ! आप पहले इन्द्र से वृक्षराज पारिजात ले लें। हरे ! अपना काम निकल जाने पर इन्द्र आपका प्रिय कार्य नहीं करेंगे’। प्रिया की यह बात सुनकर प्रियतम ने उससे कहा।
श्रीकृष्ण बोले- यदि मेरे मांगने पर अमरेश्वर इन्द्र पारिजात नहीं देगें तो मैं पुरन्दर की छाती पर, जहाँ शचीदेवी चन्दन का अनुलेप लगाती हैं, गदा से चोट करूँगा। ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण भौमासुर के नगर में गये। वह नगर नाना प्रकार के सात दुर्गों और बड़े-बड़े असुरों से आवेष्टित था। श्रीकृष्ण ने गदा, चक्र और बाण आदि से उन सातों दुर्गों का भेदन कर दिया। मुरू दैत्य और उसके पुत्र अस्त्र-शस्त्र लेकर नगर की रक्षा में नियुक्त थे। श्रीकृष्ण ने उन सबको काल के गाल में डाल दिया। तदनन्तर सेनासहित नरक अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करता हुआ सामने आया। श्रीहरि ने चक्र चलाकर नरकासुर के टुकड़े कर डाले तथा गरूड़ के द्वारा उसकी सारी सेना का संहार कर डाला। भौमासुर को मारकर यदुकुलतिलक जगन्नाथ उसके सारे उत्तम रत्न ग्रहण कर लिये। वहाँ उन्होंने कुमारी कन्याओं का एक विशाल समुदाय देखा। उनकी संख्या सोलह हजार एक सौ थीं। वे दैत्यों, सिद्धों तथा नरेशों की कुमारियाँ थीं। श्रीहरि ने उसको अपनी द्वारकापुरी में भेज दिया। फिर वे इन्द्र की मणि और छत्र लेकर तथा देवमाता अदिति के दोनों कुण्डल प्राप्त करके पारिजात वृक्ष लाने के लिये इन्द्रपुरी की और चले।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में अश्वमेध चरित्र सुमेरू में ‘श्रीकृष्ण कथा का वर्णन’ नामक तीसरा पूरा हुआ।
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