10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 05 || देवराज और उसकी देवसेना के साथ श्रीकृष्ण का युद्ध तथा विजयलाभ; पारिजात का द्वारकापुरी में आरोपण
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 05 || देवराज और उसकी देवसेना के साथ श्रीकृष्ण का युद्ध तथा विजयलाभ; पारिजात का द्वारकापुरी में आरोपण
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! श्रीकृष्णचन्द्र ने जब देखा कि देवराज इन्द्र गजराज ऐरावत पर विराजमान हो देवताओं के घिरकर युद्ध के लिये उपस्थित हैं, तब उन्होंने स्वयं शंख बजाया और उसकी ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाओं को भर दिया। साथ वज्रोपम बाण-समूहों की वर्षा प्रारम्भ कर दी। उस समय दिशाओं और आकाश को बहुसंख्यक बाणों से व्याप्त देख समस्त देवता चक्रधारी श्रीकृष्णचन्द्र के ऊपर बाणों की वृष्टि करने लगे। नरेश्वर ! भगवान श्रीकृष्ण ने देवताओं के छोड़े हुए एक-एक अस्त्र-शस्त्र के अपने बाणों द्वारा लीलापूर्वक सहस्त्र-सहस्त्र टुकड़े कर डाले। पाशधारी वरूण के नागपाश को सर्पभोजी गरुड़ काट डालते थे। यमराज के चलाये हुए लोकभयंकर दण्ड को भगवान श्रीकृष्ण ने गदा के आघात से अनायास ही भूमि पर गिरा दिया। फिर चक्र का प्रहार करके कुबेर की शिबिका को तिल-तिल करके काट डाला। सूर्यदेव को क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखकर श्रीकृष्ण ने हतप्रतिभ कर दिया। महान अग्निदेव को सामने आया देख श्रीहरि ने मुख से पी लिया।
गर्ग संहिता पृ. 681
तदनन्तर रुद्रगणों के द्वारा छोड़े गये त्रिशूलों को श्रीहरि ने रोषपूर्वक चक्र से छिन्न-भिन्न कर डाला और भुजाओं से मार- मारमार कर धराशायी कर दिया। भूपते ! तदनन्तर मरूद्गण, साध्यदेव और विद्याधरों ने माधव के ऊपर बाण समूहों की वर्षा आरम्भ की। बाणों की वर्षा करती हुई समस्त देवसेना को सामने आयी देख सत्यभामा को युद्धस्थल में बड़ा भय हो गया। उन्हें डरी हुई देख गोविन्द ने कहा- ‘सत्ये ! भय न करो। मैं यहाँ आयी हुई सारी देवसेना का संहार कर डालूँगा, इसमें संशय नहीं है’। ऐसा कहकर कुपित हुए भगवान श्रीकृष्ण ने र्शांगधनुष से छूटे हुए बाणों द्वारा देवताओं का उसी प्रकार मार भगाया, जैसे सिंह अपने पंजों की मार से सियारों को खदेड़ देता है। तदनन्तर कंसनिषूदन श्रीकृष्ण ने कुपित होकर गरुड़ से कहा- ‘विनतानन्दन ! तुमने इस रणमण्डल में युद्ध नहीं किया’ यह सुनकर विष्णु रथ गरुड़ ने कुपित हो पत्नी सहित श्रीकृष्ण को कंधों पर धारण किये हुए ही पंजों और पंखों से तत्काल युद्ध आरम्भ कर दिया। वे अपनी चोंच से देवताओं को चबाते और घायल करते हुए युद्धभूमि में विचरने लगे। गरूड़ की मार खाकर देवता लोग इधर-उधर भागने लगे। राजन ! इन्द्र और उपेन्द्र दोनों महाबली वीर एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा आरम्भ करते हुए जल की धारा बरसाने वाले दो मेघों के समान शोभा पाते थे। राजेन्द्र ! उस समय गरूड़ ऐरावत हाथी के साथ युद्ध करने लगे। हाथी ने अपने दांतों के आघात से गरूड़ को चोट पहुँचायी और गरूड़ ने भी अपनी चोंच और पंखों की मार से ऐरावत को छिन्न भिन्न कर डाला।
यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण अकेले ही समस्त देवताओं तथा वज्रधारी इन्द्र के साथ जूझ रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण इन्द्र पर और इन्द्र मधुसूदन श्रीकृष्ण पर क्रोधपूर्वक बाणों की वर्षा करने लगे। वे दोनों एक-दूसरे को जीतने की इच्छा लिये जूझ रहे थे। जब सारे अस्त्र-शस्त्र और बाण कट गये, तब इन्द्र ने तत्काल ही वज्र उठा लिया और भगवान श्रीकृष्ण ने चक्र हाथ में ले लिया। देवेश्वर को वज्र और नरेश्वर श्रीकृष्ण को चक्र हाथ में लिये देख उस समय चराचर प्राणियों सहित तीनों लोकों मे हाहाकार मच गया। वज्रधारी इन्द्र के चलाये हुए वज्र को भगवान श्रीकृष्ण ने बायें हाथ से पकड़ लिया, परंतु अपना चक्र उन पर नहीं छोड़ा। केवल इतना ही कहा- ‘खड़ा रह, खड़ा रह’ इन्द्र के हाथ में वज्र नहीं था। गरुड़ ने उनके वाहन को क्षत-विक्षत कर दिया था। वे लज्जित और भयभीत होकर भागने लगे। उन्हें इस दशा में देखकर सत्यभामा हंसने लगीं।
राजन ! उधर शची ने जब देखा कि इन्द्र युद्ध में पीठ दिखाकर चले आये, तो वे रोष से आगबबूला हो गयीं और फटकारकर बोलीं- ‘देवेश्वर ! आप देवताओं की विशाल सेना के साथ रहकर माधव के साथ युद्ध कर रहे थे, तथापि उन्होंने अकेले ही रणक्षेत्र में आपको पराजित कर दिया। अत: आपके बल-पराक्रम को धिक्कार है। देवाधम ! तुम चुपचाप तमाशा देखो। मैं स्वयं युद्धस्थल में जाकर श्रीकृष्ण को परास्त करूंगी और पारिजात को छुड़ा लाऊँगी, इसमें संदेह नहीं’।
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! ऐसा कहकर क्रोध से भरी हुई शची शीघ्र ही शिविका पर आरूढ़ हो युद्ध की इच्छा से प्रस्थित हुई। फिर समस्त देवता उनके साथ युद्ध के मैदान में गये। शची को आयी देख श्रीकृष्ण के मन में युद्ध के लिये उत्साह नहीं हुआ। तब सत्यभामा के अधर रोष से फड़पने लगे। वे श्रीहरि से उनकी बात सुनकर श्रीकृष्ण ने हंसते हुए सुदर्शन चक्र उनके हाथ में दे दिया और स्वयं पारिजात को गरुड़राज पर रखकर उसे पकड़ लिया। जब हरिप्रिया सत्यभामा क्रोधपूर्वक युद्ध करने पर उतर आयीं, तब ब्रह्माण्ड में सर्वत्र महान कोलाहल मच गया। नरेश्वर ! ब्रह्मा और इन्द्र आदि सब देवता भयभीत हो गये। राजन ! उसी समय इन्द्र की प्रेरणा से देवगुरु बृहस्पतिजी वहाँ आये। आकर उन्होंने युद्ध की इच्छा रखने वाली पुलोमपुत्री शची को रोका।
श्रीबृहस्पति बोले- शची ! मेरी बात सुनो। यह अनेक प्रकार की बुद्धि और विचार देने वाली है। श्रीकृष्ण तो साक्षात भगवान हैं और बुद्धिमती सत्यभामा साक्षात लक्ष्मी। देवेन्द्रवल्लभे ! तुम उनके साथ कैसे युद्ध करोगी ? अत: इन्द्र के प्रति अवहेलना छोड़कर घर को लौट चलो। सत्यभामा को पारिजात देकर समस्त देवताओं की भय से रक्षा करो। जिनके भय से हवा चलती है, जिनके डर से आग जलती है जलाती है, जिनके भय से मृत्यु सर्वत्र विचरती है, जिनके डर से सूर्यदेव तपते हैं तथा ब्रह्मा, शिव एवं इन्द्र जिनसे सदा भयभीत रहते हैं, उन श्रीकृष्ण को जो भौमासुर का वध करके यहाँ आये हैं, तुम अच्छी तरह नही जानतीं।
श्रीगर्गजी कहते हैं- देवगुरु की यह बात सुनकर शची लज्जित हो सत्यभामा और श्रीकृष्ण को नमस्कार करके अपने-आप को धिक्कारती हुई घर को लौट गयीं। तत्पश्चात लज्जित हुए इन्द्र को नमस्कार करते देख श्रीकृष्णप्रिया सत्यभामा ने कहा- ‘देवेन्द्र ! अपने हाथ से वज्र के निकल जाने से लज्जा का अनुभव न करो। द्वन्द्व-युद्ध में दो में से एक की पराजय अवश्यम्भावी है’। उनका यह कथन सुनकर पाकशासन बोले।
इन्द्र ने कहा- देवि ! जिस आदि और मध्य से रहित परमात्मा में यह सम्पूर्ण जगत विद्यमान है, जिनसे इसकी उत्पत्ति हुई है तथा जिन सर्वभूतमय परमेश्वर से ही इसका संहार होने वाला है, उन सृष्टि, पालन और संहार के कारणभूत परमेश्वर से पराजित हुए पुरुष को लज्जा कैसे हो सकती है ? जो समस्त भुवनों की उत्पत्ति के स्थान हैं, जिनकी अत्यन्त सूक्ष्म मूर्ति जिनका निगुण-निराकर शरीर कुछ और ही है, अर्थात अर्निवचनीय होने के कारण जिसका शब्दों द्वारा प्रतिपादन नहीं हो सकता, जो समस्त ज्ञातव्य तत्वों के जानकार हैं, ऐसे सर्वज्ञ महात्मा ही जिनके उस स्वरूप को जान पाते हैं, दूसरे लोग उसे कदापि नहीं जानते हैं, उन्हीं अजन्मा, नित्य, सनातन परमेश्वर को, जो स्वेच्छा से ही जगत के उपकार के लिए मानव-शरीर धारण करके विराज रहे हैं, कौन जीत सकता है ? सत्यभामा से ऐसा कहकर इन्द्र चुप हो गये, तब भगवान श्रीकृष्ण हंसकर गम्भीर वाणी में बोले- ‘शक्र ! आप देवताओं के राजा हैं और हमलोग भूतलवासी मनुष्य। मैंने यहाँ आकर जो अपराध किया है, उसे क्षमा कर दें। देवराज ! यह रहा आपका पारिजात, इसे इसके योग्य स्थान पर ले जाइये। मैंने तो सत्यभामा के कहने पर इसको ले लिया था, वह वज्र यह रहा; इसे ग्रहण कीजिए। शुनासीर ! यह आपका ही अस्त्र है और आपके वैरियों पर प्रयुक्त होकर यह उनका निवारण कर सकता है।
गर्ग संहिता पृ. 683
इन्द्र ने कहा- श्रीकृष्ण ! अपने विषय में ‘मैं मनुष्य हूँ’- ऐसा कहकर आप क्यों मुझे मोहित में डाल रहे हैं ? हम जानते हैं, आप जगदीश्वर हैं। हम आपके सूक्ष्म स्वरूप को नहीं जानते। नाथ ! आप जो हों, सो हों, जगत के उद्धार कार्य में आप लगे हुए हैं। गरुड़ध्वज ! आप जगत के कण्टकों का शोधन करते हैं। श्रीकृष्ण ! इस पारिजात को आप द्वारकापुरी में ले जाइये। जब आप मनुष्य लोक को त्याग देंगे, तब यह भूतल पर नहीं रहेगा। गोविन्द ! उस समय स्वयं ही स्वर्गलोक में आ जायगा।
श्रीगर्ग जी कहते हैं- राजन ! यह विनययुक्त वचन सुनकर वज्रधारी को उनका वज्र लौटाकर देवेश्वरों से अपनी स्तुति सुनते हुए द्वारकानाथ श्रीकृष्ण द्वारका में लौट आये। वहाँ के आकाश में स्थित होकर उन्होंने शंख बजाया। नरेश्वर ! उस शंखध्वनि से उन्होंने द्वारकावासियों के हृदय में आनन्द उत्पन्न किया और गरूड़ से उतरकर सत्यभामा के साथ महल में आये। उन्होंने सत्यभामा के गृहोद्यान में पारिजात को आरोपित कर दिया। उस पर स्वर्गीय पक्षी निवास करते थे और वहीं के भ्रमर उसके सुगन्धित मकरन्द का पान करते थे। माधव ने माधवमास में एक ही मुहुर्त के भीतर अलग-अलग घरों में उन समस्त राजकन्याओं के साथ धर्मत: विवाह किया, जिन्हें वे प्राग्ज्योतिषपुर से द्वारका में लाये थे। उनकी रानियों की संख्या सोलह हजार एक सौ आठ थी। परिपूर्णत श्रीहरि ने उतने ही रूप बनाकर उनके साथ विवाह किया। उन अमोघगति परमेश्वर ने जितनी अपनी भार्याएँ थीं, उनमें से प्रत्येक के गर्भ से दस-दस पुत्र उत्पन्न किये।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में अश्वमेध खण्ड में ‘पारिजात का आनयन’ नामक पांचवां अध्याय पूरा हुआ।
Comments
Post a Comment