10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 12 || अश्र्वमोचन तथा उसकी रक्षा के लिये सेनापति अनिरूद्ध का विजयाभिषेक
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 12 || अश्र्वमोचन तथा उसकी रक्षा के लिये सेनापति अनिरूद्ध का विजयाभिषेक
श्रीगर्गजी कहते हैं- तदनन्तर राजा उग्रसेन ने द्वारकापुरी में, जिसके ऊपर विधिपूर्वक चामर बँधे हुए थे, उस अश्व का पूजन करके वेदमन्त्रों के उद्घोष के साथ उसे छोड़ा। वह अश्वराज भी सुधाकुण्डलिका (इमरती या जलेबी आदि) खाकर, सोने की मालाओं तथा कुंकुम से सुशोभित हो उस स्थान से निकला। उस अश्व की रक्षा के लिये उद्यत हुए वृकहन्ता अनिरूद्ध से राजाधिराज उग्रसेन ने अश्व रक्षा के विषय में आदरपूर्वक कहा।
श्रीउग्रसेन बोले- श्रीकृष्ण पौत्र प्रद्युम्नकुमार ! तुमने अश्व की रक्षा के लिये स्वेच्छा से जो बात कही थी, उसे शीघ्र पूर्ण करो। पहले मेरे राजसूय यज्ञ के समय तुम्हारे पिता प्रद्युम्न ने पृथ्वी पर विजय पायी थी। तुम उन्हीं के महान बलवान एवं शूरवीर पुत्र हो। तुमने शकुनि के भाई महादैत्य वृक का वध किया था। समस्त राजाओं को जीता था और भीष्म को भी युद्ध में संतुष्ट कर दिया था। अहो ! चन्द्रमा और ब्रह्माजी जिनके भीतर विलीन हो गये, उनकी महिमा का क्या वर्णन किया जाय। इसलिये समस्त ऋषि-मुनि तुम्हें ‘परिपूर्ण’ कहते हैं। अत: तुम वीर-सेना से घिरे हुए आगे बढ़ो और समस्त राजाओं से अश्वमेधीय अश्व की रक्षा करो। जो बालक, रथहीन, भयभीत, शरणागत, दीनचित्त, सुप्त, प्रमप्त और उन्मत्त हो, उन्हें युद्ध में न मारना। प्रद्युम्नन्दन ! श्रीकृष्ण के प्रताप से तुम्हारा मार्ग निर्निघ्र हो और तुम घोड़े तथा सेना के साथ पुन- सकुशल लौट आओ।
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजा की यह उत्तम बात सुनकर अनिरूद्ध बोले- ‘बहुत अच्छा’। फिर उन्होंने अश्व की रक्षा के लिये चित्त को एकाग्र किया। तदनन्तर उन ब्राह्मण ऋत्विजनों ने श्रीकृष्णचन्द्र की आज्ञा से तत्काल अनिरूद्ध को मन्त्र पाठ पूर्वक स्नान करवाया और प्रसन्नतापूर्वक उनकी अर्चना की। अनिरूद्ध का तिलक करके राजा ने उन्हें विधिपूर्वक भेंट दी और युद्ध के लिये एक खड्ग हाथ में दिया। शूरसेन ने उन्हें रत्नों की माला दी। वसुदेवजी ने दो कुण्डल प्रदान किये। बलराम ने कचव और श्रीहरि ने चक्र दिये। प्रद्युम्न ने श्रीकृष्ण का दिया हुआ धनुष प्रदान किया।
राजेन्द्र ! इतना ही नहीं, उन्होंने अपने दानों तरकस भी दे दिय, जिनमें कभी बाण समाप्त नहीं होते थे। भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से एक दूसरा त्रिशूल उत्पन्न करके दे दिया। उद्धव ने किरीट और दवक ने पीताम्बर दिया। वरूण ने नागपाश तथा शक्तिशाली स्कन्द ने शक्ति दी। वायुदेव ने दो दिव्य व्यजन भेंट किये। यमराज ने अपना दण्ड दे दिया। कुबेर ने हीरे का हार और अर्जुन ने परिघ अर्पित किया। भद्रकाली ने एक भारी गदा दी। सूर्यदेव ने एक माला भेंट की। पृथ्वीदेवी ने योगमयी दो पादुकाएं दीं। गणेशजी ने दिव्य कमल प्रदान किया। अक्रुर ने विजयदायक दक्षिणावर्त शंक दिया। द्वारका में देवराज इन्द्र ने अनिरूद्ध को विजयशील महादिव्य रत्नमय रथ प्रदान किया, जो मन के समान वेगशाली था। उस रथ का निर्माण साक्षात विश्वकर्मा ने किया था। उसमें एक हजार घोड़े जुते हुए थे। एक हजार पीहिये लगे थे। वह सुवर्ण से सम्पन्न था। ब्रह्माण्ड के बाहर और भीतर सर्वत्र उसकी गति थी। वह छत्र से सुशोभित था। उसमें स्वर्ण निर्मित सैकड़ों ध्वजा-पताकाएं शोभा दे रही थीं। उससे मेघ की गर्जना के समान उद्घोष होता था। उस रथ में घंटों और मंजीरों की ध्वनि व्याप्त थी। उस समय शंख और दुन्दुभियाँ बज उठीं। झांझ और वीणा आदि भी बजने लगे। मृदंगों के शब्द और वंशी के मधुर रागों के साथ जय-जयकार ध्वनि सब ओर छा गयी। वेद-मन्त्रों का घोष होने लगा। लावा, फूल और मोतियों कर वर्षा होने लगी। देवता लोग अनिरूद्ध के ऊपर दिव्य पुष्प बरसाने लगे।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खण्ड में ‘अनिरूद्ध का राज्याभिषेक’ नामक बारहवां अध्याय पूरा हुआ।
Comments
Post a Comment