10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 13 || अनिरूद्ध का अन्त:पुर से आज्ञा लेकर अश्व की रक्षा के लिये प्रस्थान; उनकी सहायता के लिये साम्ब का कृतप्रतिज्ञ होना; लक्ष्मणा का उन्हें सम्मुख युद्ध के लिये प्रोत्साहन देना; श्रीकृष्ण के भाइयों और पुत्रों का भी श्रीकृष्ण की आज्ञा से प्रस्थान करना तथा यादवों की चतुरंगिणी सेना का विस्तृत वर्णन
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 13 || अनिरूद्ध का अन्त:पुर से आज्ञा लेकर अश्व की रक्षा के लिये प्रस्थान; उनकी सहायता के लिये साम्ब का कृतप्रतिज्ञ होना; लक्ष्मणा का उन्हें सम्मुख युद्ध के लिये प्रोत्साहन देना; श्रीकृष्ण के भाइयों और पुत्रों का भी श्रीकृष्ण की आज्ञा से प्रस्थान करना तथा यादवों की चतुरंगिणी सेना का विस्तृत वर्णन
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! तदनन्तर गुरुजनों को नमस्कार करके अनिरूद्ध देवकी, रोहिणी, रूक्मिणी, सत्यभामा तथा अन्य सम्पूर्ण श्रीहरिवल्लभाओं से आज्ञा लेने के लिये अन्त:पुर में गये। वहाँ उन सबकी आज्ञा ले, अपनी माता रति तथा रूक्मवती को प्रणाम करके उनसे कहा- ‘मैं अश्व की रक्षा करने के लिये जाता हूँ। इसके लिये महाराज ने मुझे आज्ञा दी है। मेरे साथ अन्य बहुत-से यदुवंशी वीर जा रहे हैं’।
राजन ! अनिरूद्ध का यह कथन सुनकर माताओं ने उन्हें हृदय से लगा लिया और गद्गदकंठ से उन प्रणत प्रद्युम्न कुमार को जाने की आज्ञा देते हुए आशीर्वाद प्रदान किया। माताओं को नमस्कार करके वे अपनी पत्नियों के महलों मे गये। अपने पति को आया देख ऊषा आदि तीनों पत्नियों ने उनका समादर किया। परंतु विरह की सम्भावना से उन सबका मन उदास हो गया। अनिरूद्ध उन प्यारी पत्नियों को आश्वासन दे राजसभा में लौट आये।
राजेन्द्र ! उसके बाद यज्ञ-सम्बन्धी अश्व की रक्षा के लिये यात्रा के निमित्त ऋषि-मुनियों ने अनिरूद्ध के उद्देश्य से मंगलपाठ किया। फिर वे समस्त महर्षियों, गुरुजनों, महाराज उग्रसेन, शूरसेन, वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण, अपने पिता प्रद्युम्न तथा अन्यान्य पूजनीय यादवों को प्रणाम करके समस्त नागरिकों द्वारा पूजित हुए। नरेश्वर ! उन्होंने हाथ में धनुषबाण लिये, अँगुलियों में गोधा के चर्म से बने हुए दस्ताने पहन लिये, कवच-कुण्डल धारण किये और पैरों में जूते पहनकर सिंह के समान पराक्रमी महावीर अनिरूद्ध ने ढाल, तलवार, किरीट एवं शक्ति ले, सोने के बने हुए आभूषण धारण किये। फिर वे इन्द्र के दिये हुए दिव्य रथ के द्वारा अपनी पुरी से बाहर निकले। उस समय गाजे-बाजे की आवाज और वेदमन्त्रों के घोष के साथ यात्रा करते हुए अनिरूद्ध चारों ओर से चँवर डुलाये जा रहे थे। समस्त पुरवासी उनकी इस यात्रा को देख रहे थे।
तदनन्तर भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने उनके साथ जाने के लिये उद्धव आदि मन्त्री तथा भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन और दशार्णकुल में उत्पन्न वीर योद्धा भेजे। तदनन्तर राजा उग्रसेन ने यदुवंशी वीरों को सम्बोधित करके पूछा- ‘यादवों ! बताओं, युद्ध में अनिरूद्ध की सहायता करने के लिये कौन जायगा ?’ उग्रसेन की बात सुनकर जाम्बवती कुमार साम्ब ने सबके देखते-देखते राजा को नमस्कार करके यह बात कही।
साम्ब बोले- राजेन्द्र ! मैं महासमर में सदा संनद्ध रहकर शत्रुओं से अनिरूद्ध की रक्षा एवं सहायता करूँगा। यदि समरांगण में मैं इनकी रक्षा न करूँ तो महाराज ! उस दशा में मुझ सत्यवादी की यह प्रतिज्ञा सुन लीजिये- ‘मनुष्य त्याग देने योग्य दशमीविद्धा एकादशी का व्रत करके जिस गति को प्राप्त होता है, मुझे भी निश्चय वही गति मिले। गोहत्यारों और ब्रह्महत्यारों की जो गति होती है, वही गति यदि मैं यह रक्षणकार्य न कर सकूँ, तो मेरी भी हो’।
श्रीगर्गजी कहते हैं- ऐसी बात सुनकर साम्ब वहॉं अनत:पुर मे गये। वहाँ माता जाम्बवती को प्रणाम करके उन्होंने सारा अभिप्राय निवेदित किया। उनकी बात सुनकर माता ने विरह की अनुभूति करके बेटे को हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद दिया। तदनन्तर समस्त माताओं को नमस्कार करके वे पत्नी के घर में गये। उन्हें आता देख शुभलक्षणा लक्ष्मणा बैठने के लिये आसन दे आंसुओं से कण्ठ अवरूद्ध हो जाने के कारण कुछ भी नहीं बोली। साम्ब ने उसे आश्वासन दे अपना अभिप्राय कह सुनाया। सुनकर विरह की सम्भावना से खिन्नचित हो वह अपने पति से बोली।
लक्ष्मणा बोली- पतिदेव ! आपको अनिरूद्ध के अश्व की सदा रक्षा करनी चाहिये। आप यद्ध का अवसर आये तो सम्मुख होकर युद्ध करें। रणभूमि से कभी विमुख न हों। आपके सहस्त्रों भाई हैं और उन सब की सहस्त्रों मानवती स्त्रियॉं हैं। नाथ ! यदि युद्ध में आपकी पराजय सुनकर वे आपकी प्रियतमा होने के कारण मेरी ओर देखकर मुस्करा देंगी तो उस समय दु:ख के कारण मेरी मृत्यु हो जायेगी। लक्ष्मणा की बात सुनकर साम्ब ने हँसते हुए अपनी प्रणवल्लभा से बोले।
साम्ब ने कहा- भद्रे ! युद्धभूमि में मेरा सामना करने के लिये यदि सारी त्रिलोकी उमड़ आये तो भी तुम सुनोगी कि मैंने उन सबका विदलन (संहार) कर दिया है। शुभे ! यदि शूरवीर साम्ब रणभूमि मे विमुख हो जाय तो वह अपने पाप से वेद और ब्राह्मणों का निन्दक माना जाये। उस दशा में मैं फिर तुम्हारे इस चन्द्रोपम मुख का दर्शन नही करूँगा।
श्रीगर्गजी कहते हैं- इस प्रकार वे अपनी पहली प्रियतमा को आश्वासन दे साम्ब ने दूसरी प्रिया को भी धीरज बँधाया। फिर वे अभिमन्यु और सुभद्रा से मिलकर घर से निकले। धनुष और तलवार ले यात्रा के लिये सुसज्जित साम्ब रथ पर बैठे और यादवों से घिरे हुए उस उपवन में गये, जहाँ अनिरूद्ध विद्यमान थे। तदनन्तर श्रीकृष्ण ने अपने गद आदि समस्त भाइयों को और भानु तथा दीप्तिमान आदि सभी पुत्रों को भेजा। वे सब-के-सब शौर्यसम्पन्न और युद्धकुशल थे। उन्होंने धनुष धारण करके कवच बांध लिया और चतुरंगिनी सेना के साथ करोड़ो की संख्या में वे नगर से बाहर निकले। उनके दिव्य रथ ताल, हंस, मीन, मयूर और सिंह के चिह्नवाले ध्वजों से सुशोभित थे। उन रथों का अंग-प्रत्यंग सुवर्ण मण्डित था। प्रत्येक रथ में चार-चार घोड़े जुते थे। वे सभी रथ बहुत ऊँचे और देवताओं के विमानों के समान सुशोभित थे। उनमें छत्र और चँवर लगे हुए थे। उन रथों के ऊपर सोने के कलश थे, जो सूर्य के समान चमक रहे थे। उनमें जालीदार बन्दनवारें लगायी गयी थी। ऐसे रथों द्वारा श्रीकृष्ण के सभी पुत्र कुशस्थली से बाहर निकले।
राजन ! तदनन्तर सोने के हौदों से सुशोभित हाथी निकले, जिनके मुख पर गोमूत्र, सिन्दूर और कस्तूरी से पत्र रचना की गयी थी। वे हाथी अञ्जन, कोयले और सजल जलधरों के समान काले थे। सबके गण्डस्थल से मद झर रहे थे। उनके श्वेत दाँत कमल की नाल के सामन जान पड़ते थे। मृगद्वीपजाती के हाथी अत्यन्त ऊँचे होने कारण पर्वताकार दिखायी देते थे। उनके घंटे बज रहे थे और वे अत्यन्त उद्भट जान पड़ते थे। ऐरावतकुल में उत्पन्न हाथी श्वेत वर्ण के थे। उनके तीन-तीन शुण्डदण्ड और चार-चार दाँत थे। उन सबको भगवान श्रीकृष्ण भौमासुर की राजधानी से लाये थे। वे सब-के-सब पुरी से बाहर निकले। एक लाख हाथी ऐसे थे, जिनकी पीठ पर ध्वज फहरा रहे थे और उनके ऊपर एक लाख दुन्दुभियाँ रखी थीं। लाख हाथी ऐसे थे, जिन पर कोई महावत नहीं बैठे थे। वे सभी सुनहरी झूलों से अलंकृत थे। तदनन्तर एक करोड़ गजराज ऐसे निकले, जिनके ऊपर शूरवीर योद्धा सवार थे। जैसे समुद्र में मगर विचरते हैं, उसी प्रकार उस सेना में वे गजराज इधर–उधर घूमते विराज रहे थे। वे अपने शुण्ड दण्डों से गुल्मों को उखाड़ कर आकाश में फेंकते थे और मद की धारा से पृथ्वी को भिगोते हुए पैरों के आघात से उसे कंपित–सी कर रहे थे। अपने मस्तकों शत्रुओं की सारी सेना को कुचल देने वाले थे। उन पर पड़ी हुई झूलें नीली, पीली, काली, सफेद और लाल थीं। वे सोने की सांकलों से युक्त थे और बड़ी शोभा पाते थे।
राजन ! तत्पश्चात् जिन्हें नारदजी ने अश्वशाला में देखा था, वे सभी अश्व सोने के हारों से अलंकृत हो नगर से बाहर निकले। कोई घोड़े बड़े चंचल थे, किन्हीं का वर्ण धुएं के रंग का था और वे देखने में बड़े मनोहर थे। किन्हीं के रंग काले और किन्हीं के श्याम थे। कोई–कोई कमल के समान कान्ति वाले थे। उन सबके कंधे बड़े सुंदर थे। कुछ घोड़े दूध के समान सफेद थे। कितने ही पानी के समान प्रतीत होते थे। किन्हीं की कांति हल्दी के समान पीली थी। कोई केसरिया रंग के थे और कुछ घोड़े पलाश के फूल के समान लाल थे। किन्हीं के अंग चितकबरे थे और किन्हीं के स्फटिक मणि के समान स्वच्छ। वे सभी मन के समान वेग शाली थे। कोई हरे, कोई तांबे के समान रंग वाले, कोई कुसुम्भ–सी कांति वाले और कोई तोते की पांख के समान प्रभा वाले थे। कोई वीर बहूटी के समान लाल, कोई गौर और कोई पूर्ण चंद्रमा के समान उज्ज्वल थे। वे सभी अश्व दिव्य थे। किन्हीं के अंग सिंदूर के समान रंग वाले थे। कोई प्रज्वलित अग्नि और कोई बाल सूर्य के समान कान्तिमान थे। राजन ! ये घोड़े सभी देशों से द्वारकापुरी में श्री कृष्ण के प्रताप से आए थे। वे सभी उस दिन यात्रा के लिए निकले। श्रीकृष्ण की अश्वशाला में जो घोड़े विद्यमान थे, वे वैकुंठवासी तथा श्वेतद्वीप निवासी थे। उनमें से कोई मयूर के समान कान्ति वाले थे और कोई नीलकंठ के समान। किन्हीं के वर्ण बिजली के समान दीप्तिमान थे और किन्हीं के गरुड़ के समान। वे सभी अश्व दिव्य पंखों से अलंकृत थे। उनकी शिखाओं में मणि प्रकाशित होती थी। वे श्वेत चामरों से अलंकृत थे। मुक्ता फलों की मालाओं तथा लाल रंग के वस्त्रों से विभूषित थे। उन सबका सुवर्ण से श्रृंगार किया गया था। उनकी पूँछ और मुख पट्ट से दिव्य प्रभा फैल रही थी। वे सर्वांगसुंदर दिव्य अश्व सहस्रों की संख्या में बाहर निकले।
नरेश्वर ! श्री कृष्ण के ये अश्व अपने पैरों से भूमि का स्पर्श नहीं करते थे। वे वायु और मन के समान वेगशाली, चंचल और मनोहर थे। राजन ! वे पानी के बबूलों पर चल सकते थे, कच्चे सूतों पर दौड़ सकते थे। कितने ही ऐसे थे, जो मकड़ी के जालों और पारद पर भी चलने में समर्थ थे। नृपेश्वर ! वे समुद्रों के जल पर भी निराधार चलते देखे जाते थे। राजन ! कुछ म्लेच्छ देशों में उत्पन्न अश्व भी वहाँ मौजूद थे, जो उस यात्रा में पुरी से बाहर निकले। राजन ! उनमें कोटि – कोटि अश्व ऐसे थे, जो प्रतिदिन सौ योजन अविराम गति से दौड़ सकते थे। नरेश्वर ! भगवान श्री कृष्ण के घोड़े गड्ढे, दुर्गम भूमि, नदी, ऊँचे – ऊँचे महल तथा पर्वत आदि को भी लाँघ जाते थे। उन सभी घोड़ों पर वीर योद्धा सवार थे।
इसके बाद द्वारका पुरी से समस्त पैदल सैनिक बाहर निकले। वे धनुष और कवच से सुसज्जित शूरवीर तथा महान बल पराक्रम से संपन्न थे। उनके कद ऊँचे थे। ढाल और तलवार धारण किए वे योद्धा लोहे के कवच से मंडित थे। हाथी के समान हृष्ट – पुष्ट शरीर वाले थे और युद्ध में बहुत से शत्रुओं पर विजय पाने की शक्ति रखते थे, इस प्रकार पुरी से बाहर निकली हुई यादवों की उस विशाल सेना को देख कर देवता, दैत्य और मनुष्य सबको महान विस्मय हुआ।
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