10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 14 || अनिरुद्ध का सेना सहित अश्व की रक्षा के लिए प्रयाण
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 14 || अनिरुद्ध का सेना सहित अश्व की रक्षा के लिए प्रयाण, माहिष्मतीपुरी के राजकुमार का अश्व को बांधना तथा अनिरुद्ध का राजा इंद्रनील से युद्ध के लिए उद्यत होना
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘अनिरुद्ध का प्रयाण’ नामक चौदहवां अध्याय पूरा हुआ।
श्रीगर्गजी कहते हैं– नरेश्वर ! तदनन्तर राजा उग्रसेन की आज्ञा से अनिरुद्ध से मिलने के लिए वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न तथा अन्य सब यादव रथों द्वारा नगर से बाहर निकले। वहाँ जाकर उन्होंने सेना से घिरे हुए अनिरुद्ध को देखा। भगवान श्रीकृष्ण ने पहले राजसूय यज्ञ के अवसर पर प्रद्युम्न को जिस नीति का उपदेश दिया था, वही सारी नीति उस समय अनिरुद्ध से कह सुनाई। राजन ! भगवान श्रीकृष्ण का वह उपदेश सुनकर अनिरुद्ध आदि समस्त यादवों ने प्रसन्नतापूर्वक उसे शिरोधार्य किया। तत्पश्चात् मुनिवर गर्ग, अन्यान्य मुनि वृंद वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्णचंद्र तथा प्रद्युम्न को अनुरुद्ध ने प्रणाम किया। वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण और प्रद्युम्न आदि यादव अनिरुद्ध को शुभाशीर्वाद देकर रथों द्वारा पुरी में लौट आए। नरेश्वर ! अनिरुद्ध का अश्व देश–देश में गया, किंतु श्रीकृष्ण के भय से कोई भूपाल उसे पकड़ने का साहस न कर सके। जहां–जहाँ घोड़ा गया, वहां–वहाँ सैनिकों सहित अनिरुद्ध उसके पीछे शत्रुओं को जीतने के लिए गए।
इस प्रकार विभिन्न राज्यों का अवलोकन करता हुआ अनिरुद्ध का वह अश्व नर्मदा के तट पर विराजमान माहिष्मतीपुरी को गया। उस पुरी में चारों वर्णों के लोग भरे थे और वह प्रस्तर निर्मित दुर्ग से मंडित थी। भगवान शंकर के गगनचुम्बी मंदिर उस पुरी की शोभा बढ़ाते थे। पांच योजन विस्तृत माहिष्मती पुरी राजा इंद्र नील से पिरपालित थी। शाल, ताल, तमाल, वट, बिल्व और पीपल आदि वृक्ष उसकी श्रेय वृद्धि कर रहे थे। बहुत से पोखरें और बावड़ियां वहाँ शोभा पाती थीं, जिनमें पक्षी कलरव करते थे। ऐसी नगर की को वहाँ के उपवन में पहुँच कर अश्व ने देखा। राजा इंद्र नील के बलवान पुत्र का नाम नीलध्वज था। वह सहस्रों वीरों के साथ शिकार खेलने के लिए पुरी से बाहर निकला।
उस राजकुमार ने भाल में बंधे हुए पत्र के साथ श्याम कर्ण घोड़े को देखा, जो फूलों से भरे उपवन में कदंब के नीचे खड़ा था। उसकी अंग कान्ति गाय के दूध की भाँति श्वेत थी। अनेक चामरों से अलंकृत वह अश्व वहाँ घूमता हुआ आ गया था। उसके शरीर पर स्त्रियों के कुंकुम लिप्त हाथों की छाप शोभा दे रहे थे तथा वह मोती की मालाओं से मंडित था। उस घोड़े को देख राजकुमार नील ध्वज ने अपने वाहन से उतर कर बड़े हर्ष के साथ खेल–खेल में ही उसके सिर के बाल पकड़ लिए।
उसे भाल में यादवराज उग्रसेन ने जो पत्र लगा दिया था, उसको राजकुमार पढ़ने लगा। उसमें लिखा था– द्वारका के अधिपति, राजा उग्रसेन समस्त शूरवीरों के शिरोमणि हैं। उनके समान महायशस्वी और चक्रवर्ती राजा दूसरा कोई नहीं है। उन्हीं ने पत्र सहित इस अश्व को स्वतंत्र विचरने के लिए छोड़ा है। अनिरुद्ध इसका पालन करते हैं। जो राजा अपने को सबल समझते हों, वे इसे पकड़ें, अन्यथा अनिरुद्ध के चरणों में प्रणाम करके लौट जाएँ। यह अभिप्राय देख कर राजकुमार क्रोध से बोल उठा– क्या अनिरुद्ध ही धनुर्धर हैं ? हम लोग धनुर्धर नहीं हैं ? मेरे पिताजी के रहते हुए कौन इस प्रकार वीरता का गर्व कर सकता है ?
श्रीगर्ग जी कहते हैं– राजन ! ऐसा कहकर राजकुमार घोड़े को लेकर राजा के पास गया और उसने पिता के आगे उस घोड़े का वृतांत कह सुनाया। पुत्र का वचन सुन कर महाबली महामानी शिवभक्त राजा नील ने अपने पुत्र से इस प्रकार कहा।
इन्द्रनील बोले- बेटा ! पहले क्रतुश्रेष्ठ राजसूय के अवसर पर समर्थ होते हुए भी मैंने अपने कुबुद्धि मंत्री के कहने से प्रद्युम्न को कुछ भेंट दे दी थी। अब पुन: घोड़े की रक्षा करता हुआ अनिरुद्ध आ धमका है। अहो ! दैव बल कैसा अद्भुत है ? उससे कौन – सा उलट फेर नहीं हो सकता ? अभी थोड़े ही दिन हुए हैं द्वारका में वृष्णिवंशी बढ़ गए। अत: आज मैं अनिरुद्ध आदि समस्त यादवों को परास्त करूँगा।। उस मानी को श्याम कर्ण अश्व कदापि नहीं लौटाऊँगा। मैंने भक्ति भाव से भगवान शंकर को संतुष्ट किया है। वे युद्ध में मेरी रक्षा करेंगे ।
ऐसा कहकर माहिष्मतीपुरी के वीर नरेश ने सोने की रस्सी से घोड़े को बांध लिया और सेना सहित जाकर युद्ध करने का निश्चय किया। नरेश्वर ! इतने में ही घोड़े को देखते हुए सौ अक्षौहिणी सेना के साथ अनिरुद्ध नर्मदा के तट पर आ पहुँचे। राजन ! साम्ब, मधु, बृहदबाहु, चित्रभान, वृक, अरुण, संग्रामजित, सुमित्र, दीप्तिमा, भानु, वेदबाहु, पुष्कर, श्रुत देव, सुनंदन, विरूप, चित्रबाहु, न्यग्रोध तथा कवि– ये अनिरुद्ध के सहायक भी वहाँ आ गए। गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, उद्धव और युयुधान नाम वाले सात्यकि– ये सब वृष्णिवंशी शूरवीर भी अनिरुद्ध की सहायता करने के लिए आ पहुँचे।
वे भोज, वृष्णि तथा अंधक आदि यादव नर्मदा के तट पर खड़े हो श्याम कर्ण अश्व को न देखने के कारण बड़े आश्चर्य में पड़े और आपस में इस प्रकार कहने लगे- मित्रों ! महाराज उग्रसेन के पत्र सहित अश्व को कौन ले गया, जिससे वह श्याम कर्ण अश्व यहाँ हमें दिखाई नहीं देता है ? पहले राजसूय यज्ञ के अवसर पर मानव, दैत्य और देवताओं ने तथा नौ खण्डों के अधिपतियों ने भी परास्त होकर जिनके लिए भेंट दी थी, उन्हीं के प्रचण्ड शासन का तिरस्कार करके जिस कुबुद्धि नरेश ने अभिमान वश अश्व का अपहरण किया है, वह चोर है। उसे चोरी का दण्ड मिलना चाहिए। सबके मुंह से यही बात सुन कर और सामने पुरी को देखकर रुक्मवती नंदन अनिरुद्ध मंत्री प्रवर उद्धव से बोले।
अनिरुद्ध ने कहा– नर्मदा के तट पर यह किस राजा की नगरी शोभा पाती है ? मालूम होता है कि हमारा अश्व अवश्य ही इसी नगरी में गया है। अनिरुद्ध का यह वचन सुन कर श्रीकृष्ण–सखा उद्धव अत्यंत प्रसन्न होकर बोले।
उद्धव ने कहा– यह राजा इंद्र नील की नगरी है और इसका शुभ नाम माहिष्मतीपुरी है। इसमें रहने वाले सभी वर्णों के लोग भगवान महेश्वर के पूजन में रत रहते हैं। वृष्णिकुलवल्लभ ! इस राजा ने पूर्वकाल में नर्मदा के तट पर बारह वर्षों तक नर्मदेश्वर की पूजा की थी। उनके षोडशोपचार पूजन से भगवान शिव प्रसन्न हो गए और उन्हें दर्शन देकर वर मांगने के लिए प्रेरित करने लगे। भगवान शिव का वचन सुन कर माहिष्मती पुरी के पालक नरेश ने हाथ जोड़ गदगद वाणी में उन रुद्र देव से कहा - ईशान ! आप संपूर्ण जगत के गुरु तथा नर्मदेश्वर हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप सकाम पुरुषों के कामना पूरक कल्पवृक्ष हैं। महेश्वर ! आप दाता हैं। मैं आपसे यह वर चाहता हूँ कि आप सदा देवता, दैत्य और मनुष्यों से प्राप्त होने वाले भय से मेरी रक्षा करें। राजा की बात सुन कर भगवान शंकर ने प्रसन्न हो तथास्तु कह दिया। राजेंद्र ! ऐसा कह कर वे वहाँ से अंतर्धान हो गए। कन्दर्पनन्दन ! इस कारण भगवान रुद्र के वर से प्रभावित वह शूरवीर नरेश युद्ध किए बिना तुम्हें अश्व नहीं लौटाएगा। उद्धवजी का कथन सुनकर बलवान अनिरुद्ध ने समस्त यादवों के समक्ष धैर्यपूर्वक कहा।
अनिरुद्ध बोले – मंत्री प्रवर ! सुनिए, आपने बताया है कि इस राजा के सहायक साक्षात भगवान शिव हैं। परंतु जैसे इन पर शिव की कृपा है, उसी प्रकार मेरे ऊपर भगवान श्री कृष्ण कृपा रखते हैं।
-ऐसा कह कर यादवों सहित वीर रुक्मवती कुमार ने अश्व को बंधन से मुक्त करने के लिए राजा इंद्रनील को जीतने का विचार किया। जब प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्ध कवच बांध कर खड़े हुए तब समस्त यादव योद्धा परिघ, खड्ग, गदा, धनुष और फरसे लेकर युद्ध के लिए संनद्ध हो गए।
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