10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 15 || अनिरुद्ध और साम्बका शौर्य, माहिष्मती नरेश पर इनकी विजय
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 15 || अनिरुद्ध और साम्बका शौर्य, माहिष्मती नरेश पर इनकी विजय
श्रीगर्गजी कहते हैं– तदनन्तर इंद्रनील का पुत्र महाबली नीलध्वज तीन अक्षौहिणी सेना साथ लेकर यादवों को जीतने के लिए अपने नगर से बाहर निकला। वह अपने पिताजी की बात सुन कर यदुवंशियों के प्रति अत्यंत रोष से भरा था। उस राजकुमार को आया देख श्रीकृष्ण–पौत्र अनिरुद्ध धनुष हाथ में लेकर अकेले ही उसके साथ युद्ध करने के लिए गए, मानो इंद्र वृत्रासुर पर विजय पाने के लिए प्रस्थित हुए हों। संग्राम भूमि में जाकर अनिरुद्ध शत्रुओं के ऊपर तत्काल बाण समूहों की वर्षा करने लगे। इससे उन सबके हृदय में त्रास छा गया। फिर तो नील ध्वज के समस्त सैनिक भयभीत हो रणभूमि से भागने लगे और प्रद्युम्न कुमार ने विजय सूचक अपना शंख बजाया।
अपनी सेना को भागती देख बलवान नीलध्वज धनुष टंकारता हुआ शीघ्र ही संग्राम मंडल में आया। उसने धनुष प्रत्यंचा से अपनी सेना को पुन: युद्ध में लौटने के लिए प्रेरित किया अनिरुद्ध को शत्रुओं के बीच घिरा हुआ देख साम्बके को रोष की सीमा न रही। वे एक अक्षौहिणी सेना से घिरे रोषपूर्वक धनुष टंकारते हुए वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने बीस बाणों से नीलध्वज को और पाँच–पाँच बाणों से रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदलों को घायल कर दिया। साम्ब के बाणों की चोट खाकर वे सब के सब धराशायी हो गए। हाथियों के ऊपर हाथी, रथों के ऊपर रथ, घोड़ों पर घोड़े और पैदल मनुष्यों पर मनुष्य गिरने लगे। क्षणभर में वहाँ की भूमि पर रक्त की धारा बह चली। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल छिन्न–भिन्न होकर वहाँ पड़े थे।
राजन ! फिर अपनी सेना में भगदड़ मची हुई देख नीलध्वज जिसके मन में यादवों को जीतने की बड़ी इच्छा थी, धनुष लेकर बाणों की वर्षा करता हुआ शत्रु सेना के सम्मुख आया। राजन ! युद्ध स्थल में पहुँच कर रोष से भरे हुए उस राजकुमार ने दस बाणों से साम्ब को उसी तरह काट दिया, जैसे कोई दुर्वचन द्वारा प्रेम–संबंध को छिन्न–भिन्न कर दे। बलवान इंद्रनील कुमार ने चार बाणों से साम्ब के चारों घोड़े मार दिए, दो बाणों से उनके रथ की ध्वजा काट गिराई, सौ बाणों से रथ की धज्जियाँ उड़ा दीं और एक बाण से सारथि को काल के गाल में भेज दिया।
इस प्रकार साम्ब को रथहीन करके राजकुमार नीलध्वज ने पुन: सामने आई हुई साम्ब की सेना को बाणों से घायल करना आरंभ किया। इतने में ही नील ध्वज की सारी सेना भी लौट आई और युद्धस्थल में यादवों की विशाल वाहिनी को तीखे बाणों से गायल कर दिया। फिर तो रण क्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध होने लगा। खड्ग, परिघ, बाण, गदा और तीखी शक्तियों के द्वारा उभय पक्ष के सैनिक परस्पर प्रहार करने लगे। साम्ब दूसरे रथ पर आरूढ़ हो सुदृढ़ धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर रण क्षेत्र में आए। वे बड़े बलवान थे। उन्होंने सौ बाण मार कर नीलध्वज के रथ को चूर–चूर कर दिया।
मानद नरेश ! उसका धनुष भी कट गया, तब उस रथहीन राजकुमार ने गदा उठाकर क्रुद्ध हो युद्ध स्थल में बड़े वेग से साम्ब पर धावा किया। उसी समय साम्ब भी सहसा रथ से उतर कर गदा लिए नील ध्वज का सामना करने के लिए रोष पूर्वक आगे बढ़े। साम्ब को आया देख राजकुमार ने उन पर गदा से चोट की, परंतु फूल की माला से चोट करने पर जैसे हाथी विचलित नहीं होता उसी प्रकार साम्ब उस प्रहार से विचलित न हो सके। तदनन्तर साम्ब ने अपनी गदा से राजकुमार पर आघात किया। उनके उस प्रहार से राजकुमार रण भूमि में गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया। फिर तो उसके सैनिक हाहाकर करते हुए भाग चले। तब अत्यंत क्रोध से भरे हुए राजा इंद्रनील स्वयं युद्ध के लिए आए। उनके साथ दो अक्षौहिणी सेना थी और वे अपने धनुष से बाणों की वर्षा कर रहे थे। उन्हें आया देख बलवान धनुर्धर वीर श्रीकृष्णकुमार मधु ने अपने बाणों की मार से इंद्रनील को रथ हीन कर दिया। साथ ही अर्जुन के प्रिय शिष्य युयुदान सात्यकि ने समरांगण में आई हुई इंद्रनील की सेना को अपने बाणों द्वारा उसी प्रकार क्षत–विक्षत कर दिया जैसे किसी ने कटु वचनों से मित्रता को छिन्न–भिन्न कर दिया हो। तदनन्तर यादवों के छोड़ देने पर राजा इंद्रनील माहिष्मती पुरी को लौट गए। वे दु:ख से व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने पुरी में पहुँच कर अपने स्वामी भगवान शिव का स्मरण किया। तब भगवान शिव ने उन्हें परम उत्तम साक्षात दर्शन देकर उनसे सारा वृत्तांत पूछा। शिवजी की बात सुन कर राजा ने उनके समक्ष सारा वृत्तांत निवेदन किया। इस प्रकार इंद्रनील का कथन सुन कर प्रमथों के स्वामी भगवान शिव बोले।
शिव ने कहा– राजेंद्र ! तुम शोक न करो। मेरा वरदान भी मिथ्या नहीं होगा। देवता, दैत्य और मनुष्य सब मिल कर भी तुम्हें जीतने में समर्थ नहीं हैं। महाराज ! ये जो श्रीकृष्ण के पुत्र हैं, ये उन्हीं के अंश से उत्पन्न हुए हैं। ये न तो देवता हैं, न दैत्य हैं और न ही मनुष्य ही हैं। नरेश्वर ! इनसे पराजित होने के कारण तुम मन में दु:खी न होओ। भूपाल ! तुम्हें श्री कृष्ण का अपराध नहीं करना चाहिए। राजन् ! इसलिए तुम शीघ्र ही विधिपूर्वक इन समागत यादव वीरों को अश्वमेध का घोड़ा लौटा दो, इससे तुम्हारा भला होगा। ऐसा कहकर भगवान रुद्र अदृश्य हो गए। उनके मुख से जगदीश्वर भगवान श्रीकृष्ण का माहात्म्य जान कर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे यज्ञ का घोड़ा बहुत–से रत्न, सौ भार सुवर्ण, एक हजार मतवाले हाथी, एक लाख घोड़े और दस हजार रथ लेकर नीलध्वज के साथ जहाँ अनिरुद्ध थे, वहाँ उन्हें नमस्कार करने के लिए गए। राजा के साथ और भी बहुत से लोग थे। अनिरुद्ध के निकट जाकर राजा ने विधिपूर्वक सारी वस्तुएँ निवेदित कीं और प्रणाम करके इस प्रकार कहा।
इंद्रनील बोले– श्रीकृष्ण, बलराम और महात्मा प्रद्युम्न को मेरा नमस्कार है। यदुकुल तिलक अनिरुद्ध को बारंबार नमस्कार है। दैत्यसूदन ! मुझे आज्ञा दीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूं।
तब अनिरुद्ध ने उनसे कहा- नृपश्रेष्ठ ! आप मेरे साथ रह कर मेरे इस अश्व को एक मित्र का अश्व मानकर शत्रुओं के हाथ से इसकी रक्षा कीजिए।
श्रीगर्गजी कहते हैं– नरेश्वर ! अनिरुद्ध की यह बात सुनकर राजा ने बहुत अच्छा कह कर उनकी बात मान ली और नीलध्वज को राज्य देकर स्वयं यादव सेना के साथ जाने का निश्चय किया।
इस प्रकार श्रीगर्गसंहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में अनिरुद्ध की विजय का वर्णन नामक पंद्रहवां अध्याय पूरा हुआ।
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