10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 16 || चम्पावतीपुरी के राजा द्वारा अश्व का पकड़ा जाना, यादवों के साथ हेमांगद के सैनिकों का घोर युद्ध, अनिरुद्ध और श्रीकृष्ण पुत्रों के शौर्य से पराजित राजा का उनकी शरण में आना
अनिरुद्ध बोले– मंत्री प्रवर ! यह किसकी नगरी है। कौन मेरा घोड़ा ले गया है ? महामते ! आप जानते होंगे, सोच विचार कर बताइए उनका यह प्रश्न सुनकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उद्धव ने शत्रुओं के वृतांत को समझ कर यह बात कही।
उद्धव बोले– द्वारकानाथ ! इस नगरी का नाम चम्पावती है। यहाँ अपने पुत्र हंसध्वज के साथ राजा हेमांगद राज्य करते हैं। उन्होंने ही तुम्हारा घोड़ा पकड़ा है। यह राजा शूरवीर है। युद्ध किए बिना यज्ञ का घोड़ा नहीं देगा। यह नगर में ही रहकर भुशुण्डियों द्वारा दीर्घ काल तक युद्ध करेगा। वह नरेश युद्ध के लिए नगर से बाहर नहीं निकलेगा। अत: नरेश्वर ! तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो। उद्धवजी की बात सुन कर अनिरुद्ध रोषपूर्वक बोले।
अनिरुद्ध ने कहा– सत्पुरुषों में श्रेष्ठ उद्धवजी ! दुर्ग में रह कर युद्ध में लगे हुए इन बहुसंख्यक शत्रुओं को लोहे की बनी हुई शक्ति से समान बाणों द्वारा में आधे पल में मार गिराऊँगा। उद्धवजी की पूर्वोक्त बात सुनकर इस प्रकार रोष में भरे हुए यदुकुल तिलक अनिरुद्ध उस पुरी का विध्वंस करने के लिए शीघ्र ही गए और कोटि–कोटि बाणों की वर्षा करने लगे। अन्धकवंशी वीरों के बाण समूहों से उस पुरी में कोलाहल मच गया। वीर हंसध्वज आदि समस्त शत्रु शंकित हो गए। तदनन्तर राजा के कहने से उन वीरों ने साहसपूर्वक दुर्ग की दीवार पर चढ़ कर बाहर जमें हुए यादव सैनिकों को देखा। यदुकुल के श्रेष्ठ वीरों को कवच आदि से सुसज्जित देख वे सब के सब भयभीत हो उठे। यादव योद्धा अस्त्र-शस्त्रों से परिमंडित हो शस्त्रों की वृष्टि कर रहे थे। हेमांगद के सैनिकों ने उन पर चारों ओर से शतघ्नियों द्वारा आग बरसाना आरंभ किया। वे इस निश्चय पर पहुँच गए कि हम सभी शत्रुओं को मौत को घाट उतार देंगे, घोड़े को कदापि नहीं लौटाएंगे।
उस समय अनिरुद्ध की सेना में महान हाहाकार मच गया। शतचघ्नियों से ताड़ित हो समस्त वृष्णिवंशी वीर विह्वल हो गए। उनके सारे अंग क्षत–विक्षत हो गए। कितने ही योद्धा युद्ध से भाग चले। राजन ! कुछ सैनिक मूर्च्छित हो गए और कितने ही अपने प्राणों से हाथ धो बैठे। कोई युद्ध में जल गए और कोई भस्मीभूत हो गए। कितने ही लोगों के हाथ–पैर और भुजाएँ कट गईं। कुछ लोग शस्त्रहीन होकर गिर पड़े। कितनों के कवच जल गए। कितने ही हाय–हाय करने लगे और कितने ही योद्धा बलराम तथा श्रीकृष्ण का नाम ले–लेकर पुकारने लगे। उस युद्ध क्षेत्र में शतघ्नियों की मार खाकर सारे अंग जर्जर हो जाने के कारण कितने ही हाथी भागते हुए गिर पड़े और मूर्च्छित होकर मर गए। संग्राम में उछलते–भागते हुए घोड़े शरीर छिन्न–भिन्न हो जाने के कारण मौत के मुख में चले गए। कितने ही रथ चूर–चूर होकर धराशायी हो गए। सारी यादव सेना आग की लपेट में आकर भयानक दिखाई देने लगी।
यह सब देखकर अनिरुद्ध संग्राम भूमि में श्रीहरि का स्मरण करते हुए कुछ सोचने लगे। तब श्रीकृष्ण कृपा से ऊषा वल्लभ अनिरुद्ध को कर्तव्य बुद्धि सूझ गई। उन्होंने शार्गंधनुष लेकर तरकस से बाण निकाला और उसे धनुष पर रख कर उसमें पर्जन्यास्त्र का संधान किया। उस बाण के छूटते ही यादव सेना के ऊपर मेघ चा गए। नरेश्वर ! उन मेघों ने यादव सैनिकों की रक्षा करते हुए भूरि–भूर जल की वर्षा की और चारों ओर फैली हुई आग को बुझा दिया। तब वृष्णिवंशी सैनिकों के अंग–अंग शीतल हो गए। वे आग के भय से छूट गए और खड़े हुए। उन सबको संबोधित करके अनिरुद्ध ने कहा– मैं पंख वाले घोड़े पर चढ़ कर अकेला ही शत्रुओं के राजा को जीतने के लिए चम्पावतीपुरी में प्रवेश करूंगा।
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! अनिरुद्ध की यह बात सुनकर समस्त कृष्णकुमार साम्ब आदि अठारह महारथी उनसे बोल उठे।
हरिपुत्रों ने कहा- राजन् ! तुम शत्रुओं की नगरी में न जाओ। हम सब लोग उस आततायी नरेश को जीतने के लिए वहाँ जाएंगे।
-ऐसा कहकर रोष से भरे हुए वे सब वीर हरिपुत्र सहसा पांख वाले घोड़ों पर चढ़ कर दुर्ग के परकोटे को लांघते हुए चम्पावतीपुरी में जा पहुँचे। वे सभी धनुर्धर, कवचधारी और युद्ध कुशल थे। उन्होंने जाते ही सर्पाकार बाणों से शत्रुओं को मारना आरंभ किया।
नरेश्वर ! वे शत्रु भी राजा की आज्ञा से सहसा युद्ध के लिए धनुष धारण किए क्रोधपूर्वक आ पहुँचे। उनकी संख्या एक करोड़ थी। रोष से भरे अस्त्र–शस्त्र उठाए उन बहुसंख्यक वीरों को वहाँ आया देख साम्ब, मदु, बृहदबाहु, चित्रभानु, वृक, अरुण, संग्रामजित, सुमित्र, दीप्तिमान, भानु, वेदबाहु, पुष्कर, श्रुतदेव, सुनंदन, विरूप, चित्रबाहु, न्यग्रोध और कवि– इन समस्त श्रीकृष्ण पुत्रों ने बाणों द्वारा मारना आरंभ किया। राजेंद्र ! फिर तो उस नगरी में वीरों के रक्त से भयंकर नदी प्रकट हो गई, जो नगर द्वार से बाहर निकली।
राजन् ! उस घोर नदी को बह कर आती देख अनिरुद्ध शंकित हो गए। उनका मुंह सूख गया और वे रोषपूर्वक बोले- अहो ! क्या मेरे पिता के सभी भाई मारे गए, जिसके कारण यह घोर नदी प्रकट हो हम सबको बहा ले जाने के लिए इधर ही आ रही है ? मैं इस नदी को अपने अग्निमय बाणों द्वारा सोख लूंगा। इसमें संशय नहीं है। अपने पर्वतोपम गजराजों द्वारा इस नगरी को ढहवा दूंगा। तदनन्तर अनिरुद्ध के आदेश से महावतों से प्रेरित हो बड़े–बड़े ऊँचे मदोन्मत्त और कज्जलगिरि के समान काले लाखों हाथी अपनी सूंड़ों से छोटे–छोटे वृक्षों एवं गुल्मों को उखाड़–उखाड़ कर उस नगर में फेंकने लगे। वे अपने पैरों के आघात से पृथ्वी को कंपित करते हुए नगर के ऊपर जा चढ़े।
नरेश्वर ! वहाँ पहुँच कर उन समस्त गजराजों ने अपने कुंभस्थलों से रोषपूर्वक सब ओर से शीघ्र ही उस पुरी को ढाह दिया। सारे कपाट टूट–टूट कर गिर गए। द्वारों की सुदृढ़ श्रृंखलाएँ छिन्न–भिन्न हो गईं। पुरी के दुर्ग की पथरीली दीवारें उन हाथियों ने तोड़ गिराईं। नृपश्रेष्ठ ! श्रीहरि के गजराजों ने किवाड़ों, अर्गलाओं और दुर्ग को धराशायी करके पुरी में पहुँच कर शत्रुओं के घरों को गिराना आरंभ किया। उस समय चम्पावती में महान हाहाकार मच गया। राजा आदि सब लोग भयभीत हो बड़े आश्चर्य में पड़ गए। तब पराजित हुए राजा हेमांगद फूलों के हार से अपने दोनों हाथ बाँध कर ‘पाहिमाम्’ कहते हुए हरि पुत्रों के सम्मुख आए। उन नरेश को आया हुआ देख रणभूमि में धर्मवेत्ता साम्ब ने भाइयों को तथा दीनजनों की हत्या करने वाले महावतों को भी रोका। सबको रोककर राजा से इस प्रकार बोले।
साम्ब ने कहा– राजन् ! आओ, तुम्हारा भला हो। मेरा घोड़ा लेकर अनिरुद्ध के समीप चलो, तब तुम्हारे लिए श्रेष्ठ परिणाम निकलेगा। साम्ब की यह बात सुन कर राजा यज्ञ का घोड़ा लिए हरि पुत्रों के साथ पुरी से बाहर निकले। राजन् ! पुत्र के साथ अनिरुद्ध के निकट जाकर राजा ने घोड़ा और उसके साथ एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ भी अर्पित कीं। राजेंद्र ! तदनन्तर नीतिवेत्ता दीनवत्सल अनिरुद्ध ने पुष्प माला से बंधे हुए उनके दोनों हाथ खोल कर इस प्रकार कहा– नृपश्रेष्ठ ! मेरे साथ चल कर श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए शत्रु–राजाओं से इस घोड़े की रक्षा करो। अनिरुद्ध की बात सुनकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा हेमांगद ने अपने पुत्र को राज्य देकर प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ जाने का विचार किया।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ’चम्पावती विजय वर्णन’ नामक सोलहवां अध्याय पूरा हुआ।
Comments
Post a Comment