10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 18 || राक्षस भीषण द्वारा यज्ञीय अश्व का अपहरण तथा विमान द्वारा यादव–वीरों की उपलंका पर चढ़ाई
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 18 || राक्षस भीषण द्वारा यज्ञीय अश्व का अपहरण तथा विमान द्वारा यादव–वीरों की उपलंका पर चढ़ाई
श्रीगर्गजी कहते हैं– राजन् ! तदनन्तर अनिरुद्ध के प्रयास से छूटा हुआ वह दुग्ध के समान उज्ज्वलयज्ञ संबंधी अश्व स्वेच्छा से सिंहल द्वीप के निकट विचरने लगा। वह व्यास से पीड़ित था। घोड़े ने देखा, सामने ही बहुत से वृक्षों द्वारा आवृत और जल से भरी हुई एक बावड़ी है। उसे देख, वह स्वयं जाकर उसका पानी पीने लगा। बावड़ी में अश्व को देखकर एक भीषण नाम वाले राक्षस ने उसके भाल में लगे हुए पत्र को पढ़ा और बड़ी प्रसन्नता से उस घोड़े को पकड़ लिया। इसी समय सब यादव, जिनकी दृष्टि घोड़े पर ही लगी हुई थी, वहाँ आ पहुँचे। आकर उन्होंने देखा–यज्ञ के अश्व को एक राक्षस ने पकड़ रखा है। तब वे युद्धशाली यादव उस राक्षस से बोले।
यादवों ने कहा- अरे ! तू कौन है ? जैसे सिंह की वस्तु को सियार ले जाए, उसी तरह यादवेंद्र महाराज उग्रसेन के घोड़े को लेकर तू कहाँ जाएगा ? धूर्त ! खड़ा रह, खड़ा रह। हमारे साथ धैर्यपूर्वक युद्ध कर ! हम घोड़े को तेरे हाथ से छुड़ा लेंगे तथा रणभूमि में तेरा वध कर डालेंगे। भाइयों सहित शकुनि, नरकासुर, बाणासुर और कलंक– ये समस्त राक्षसराज हमारे हाथ से मारे जा चुके हैं। तू तो उनके सामने तिनके के तुल्य है। अत: हमसे युद्ध में तुझे कुछ भी नहीं गिनेंगे ! तू घोड़ा देकर चला जा, नहीं तो हम तुझे मार डालेंगे। उनका यह भाषण सुनकर देवताओं को भी भयभीत करने वाले भीषण ने शूल, गदा और खड्ग लेकर बड़े रोष के साथ उन सबसे कहा।
भीषण बोला– अरे ! तुम लोग क्या मेरा सामना कर सकते हो। मनुष्य तो हमारे भोजन हैं। वे राक्षसों के सामने कौन सा पुरुषार्थ प्रकट करेंगे ? पहले जब यादवराज ने विश्वजित यज्ञ किया था, तब मैं राक्षसों को लाने के लिए लंका चला गया था। उन्हें लेकर जब मैं अपनी पुरी में लौटा तो नारदजी के मुख से सुना कि वह यज्ञ पूरा हो गया। अब तुम लोगों ने पुन: अश्वमेध यज्ञ करने का प्रयास व्यर्थ ही किया है। तुम लोगों में कौन ऐसे वीर हैं, जो मेरे पकड़े हुए घोड़े को छुड़ा सकें। अत: घोड़े की आशा छोड़ कर तुम लोग जाओ, चले जाओ। नहीं तो मेरे चार लाख अनुयायी राक्षस तुम सबको खा जाएंगे। इस स्थान से बारह योजन दूर समुद्र में मेरी बनाई हुई पुरी है, जिसका नाम उपलंका है। जैसे भोगवतीपुरी सर्पों से भरी रहती है, उसी प्रकार उपलंका निशाचरगणों से परिपूर्ण है। राजन् ! ऐसा कह कर घोड़ा लिए आकाश मार्ग से वह सहसा अपनी पुरी को चला गया और समस्त यादव शोक करने लगे। तब अनिरुद्ध कहने लगे– भोजराज के इस अश्व को जिसे निशाचर ले गया है, हम कैसे छुड़ाएंगे।
उनका यह वचन सुन कर नीति कुशल साम्ब आदि उनसे बोले- राजन ! चिंता छोड़ो। हमारे रहते हुए तुम्हें क्या भय है ? तुम्हारी सेना में पंखदार घोड़े हैं, विमान हैं और बाण हैं। दोनों लोकों पर विजय पाने वाले शौर्य संपन्न महान वीर विद्यमान हैं। राजन् ! हम लोग घोड़ों से यात्रा करेंगे अथवा बाणों से पुल बांध कर जाएंगे, या भगवान विष्णु के दिए हुए विमान से शत्रुओं की नगरी पर आक्रमण करेंगे। सबकी बात सुनकर धनुर्धारियों में श्रेष्ठ अनिरुद्ध ने मंत्री प्रवर उद्धव को बुला कर इस प्रकार पूछा।
अनिरुद्ध बोले– मंत्री प्रवर ! श्याम कर्ण हमारे हाथ से चला गया। अब हम क्या करें ? भगवान ने आपके आदेशानुसार ही कार्य करने की आज्ञा दी थी, अत: आप कोई उपाय बताइये। मेरे सब चाचा लोग जो उपाय बता रहे हैं वह आपने भी सुना है। यदि आपकी भी आज्ञा हो जाए तो मैं वह सब करूं। अनिरुद्ध की यह बात सुनकर उद्धवजी लज्जित होकर बोले- भैया ! मैं तो श्रीकृष्ण का और विशेषत: उनके पुत्रों तथा पौत्रों का भी सदा दास हूँ। निरंतर आज्ञा में रहने वाला सेवक हूँ। मैं क्या बताऊंगा। जो तुम्हारी और इन सबकी इच्छा हो, वह करो। निश्चय ही वह सफल होगी।
तब अनिरुद्ध ने कहा– यादवों ! मैं भगवान विष्णु के दिए हुए विमान द्वारा दस अक्षौहिणी सेना के साथ दैत्य नगरी (उपलंका) में जाऊँगा। सारण, कृतवर्मा तथा सत्यक पुत्र युयुधान– ये लोग अक्रूर के साथ यहीं रह कर शेष सेना की रक्षा करें। ऐसा कहकर अनिरुद्ध श्रीहरि के अठारह पुत्रों, उद्धव, गद और विशाल सेना के साथ भगवान विष्णु के दिए हुए विमान पर आरूढ़ हुए। श्रीकृष्ण के पौत्र तथा यादव वीरों से युक्त वह सूर्य बिम्ब के समान तेजस्वी विमान अपनी शक्ति से चालित होकर उसी प्रकार शोभा पाने लगा, जैसे पूर्वकाल में कुबेर का विमान पुष्पक श्रीराम और कपिराजों से युक्त होकर सुशोभित होता था।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘विमान पर आरोहण’ नामक अठारहवां अध्याय पूरा हुआ।
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