10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 19 || यादवों और निशाचरों का घोर युद्ध, अनिरुद्ध और भीषण की मूर्च्छा तथा चेतना एवं रणभूमि में बक का आगमन
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 19 || यादवों और निशाचरों का घोर युद्ध, अनिरुद्ध और भीषण की मूर्च्छा तथा चेतना एवं रणभूमि में बक का आगमन
श्रीगर्गजी कहते हैं– राजन ! तदनन्तर रुक्मवती कुमार अनिरुद्ध कुबेर के समान विमान द्वारा विशाल सेना के साथ उपलंका गए। नरेश्वर ! वहाँ जाकर यादवों सहित अनिरुद्ध ने विषधर सर्प के समान विषाक्त बाणों द्वारा उस नगरी का और वहाँ के वन उपवनों का विध्वंस आरंभ कर दिया। वहाँ के क्रीड़ा स्थानों, द्वारों, भवनों, अट्टालिकाओं, छज्जों तथा गोपुरों पर उस विमान के अग्रभाग से अस्त्र–शस्त्रों की वर्षा होने लगी। मुसल, शक्ति, परिघ, बाण और शिलाएँ भी निरंतर पड़ने लगीं। राजन् ! वहाँ प्रचण्ड वायु चलने लगी और संपूर्ण दिशाएँ धूल से आच्छादित हो गईं। इस प्रकार यादवों द्वारा की गई अस्त्र वर्षा से अत्यंत पीड़ित हुई भीषण की वह नगरी कहीं भी कल्याण (परित्राण) नहीं पा रही थी। इसकी वहीं दशा हो गई थी, जैसे पूर्वकाल में शाल्वदेशीय योद्धाओं के आक्रमण से द्वारकापुरी की हुई थी।
नृपश्रेष्ठ ! उस समय उस नगरी में हाहाकार मच गया। भीषण आदि असुर भय से विह्वल हो गए। सारी नगरी को पीड़ित देख राक्षस राज भीषण डरो मत– इस प्रकार अभयदान दे राक्षसों के साथ बाहर निकला। फिर तो उसकी पुरी में निशाचरों के साथ यादवों का घोर युद्ध होने लगा। ठीक उसी प्रकार, जैसे पहले लंका में वानरों और राक्षसों में युद्ध हुआ था। वृष्णिवंशी योद्धाओं के बाण समूहों में कंधे कट जाने के कारण राक्षस आंधी के उखाड़े हुए वृक्षों की भाँति समुद्र में गिरने लगे। कुछ निशाचर औंधे मुंह उस पुरी में ही धराशायी हो गए। राजन् ! कोई उतान होकर गिरे और कोई तत्काल पञ्चत्व को प्राप्त हो गए। वहाँ उन राक्षसों के रक्त से एक भयंकर दूषित नदी प्रकट हो गई, जो महावैतरणी की भाँति दुष्पार थी। वहाँ यादवों का बल देख कर भीषण को बड़ा विस्मय हुआ। उसने टेढ़ी आँखों से यादवों की ओर देख कर कहा– तुम लोगों ने निर्बलों की भाँति आकाश में खड़े होकर युद्ध किया है। तुम लोग व्यर्थ वीरता का अभिमान करते हो, वह प्रशंसा के योग्य नहीं है। तुम लोगों के शरीर में यदि शक्ति हो तो सुनो– पृथ्वी पर उतर आओ और मेरे साथ युद्ध करो। उसकी यह बात सुन कर करुणा मय प्रद्युम्न कुमार भूतल पर विमान उतार कर उस महान असुर से बोले।
अनिरुद्ध ने कहा– महान असुर ! बहुत विचार करने के क्या होगा ? तुम महासमर में भय छोड़ कर शीघ्र मेरे साथ युद्ध करो।
उनकी यह बात सुनकर भयंकर पराक्रमी भीषण ने अपने धनुष से पाँच नाराच बाण अनिरुद्ध के ऊपर चलाए। अनिरुद्ध ने उन्हें देखकर अपने बाणों द्वारा उन नाराचों के दो–दो टुकड़े कर दिए और खेल–खेल में ही एक बाण से उसके धनुष को काट दिया। भीषण ने भी दूसरा धनुष लेकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और सर्पाकार सौ बाणों द्वारा प्रद्युम्न कुमार को घायल कर दिया। उनका रथ खंडित हो गया, सारथि मारा गया, सब घोड़े भी काल के गाल में चले गए और अनिरुद्ध मूर्च्छित हो गए।
उस समय अपने सेना नायक को घिरा हुआ देख समस्त वृष्णिवंशी यादवों के अधर पल्लव रोष से फड़क उठे और वे बाणों की वर्षा करते हुए वहाँ आ पहुँचे। उन बहुसंख्यक वीरों को आया देख उस असुर ने रोषपूर्वक धनुष को रखकर गदा से ही उन सबको मार गिराया, जैसे सिंह अपनी दाढ़ों से ही मृगों को कुचल देता है। गदा की मार से पीड़ित हो यादव सैनिक भूतल पर गिर पड़े। उनके सारे अंग छिन्न–भिन्न हो गए थे। कितने ही योद्धा रणक्षेत्र में धराशायी हो गए।
तब बलरामजी के छोटे भाई गद ने अपनी गदा लेकर समरभूमि में राक्षस भीषण के मस्तक पर प्रहार किया। राजन् ! गदा के उस प्रहार से व्यथित हो वज्र के मारे हुए पर्वत की भाँति वह असुर वसुधा को कंपित करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। भीषण का सिर फट गया था। उसे मूर्च्छित होकर पड़ा देख वे असुर शस्त्र धारण किए गद को मारने के लिए आ पहुँचे, परंतु नरेश्वर ! नृसिंह ने जैसे अपनी दाढ़ से हाथियों को मार गिराया था, उसी प्रकार बलराम के छोटे भाई गद ने अपनी वज्र सरीखी गदा से उन सब असुरों को धराशायी कर दिया । इसके बाद अनिरुद्ध होश में आकर खड़े हो गए और क्षणभर में धनुष लेकर बोल उठे– मेरा शत्रु दुष्ट भीषण कहाँ गया, कहाँ गया ? श्रीहरि के पौत्र को खड़ा हुआ देख यादव पुंगव जय–जयकार करने लगे और समस्त देवताओं को भी बड़ा हर्ष हुआ।
तदनन्तर नारदजी से सूचना पाकर भीषण का पिता निशाचर ‘बक’ जंगल से कुपित होकर वहाँ आया। महाराज ! वह कज्जलगिरी के समान काला और ताड़ के बराबर ऊंचा था। उसकी जीभ लपलपा रही थी, नेत्र भयंकर हो गए थे तथा वह त्रिशूल और गदा लिए हुए था। एक हाथी को बाएँ हाथ से पकड़कर मुँह से चबाता हुआ वह राक्षस रक्त से नहा गया था और बड़े भारी पिशाच के समान दिखाई देता था। उसके दोनों पैर ताड़ के बराबर बड़े थे। वह उनकी धमक से भूतल को कंपित कर रहा था। देवताओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला वह निशाचर जनता के लिए काल–सा दिखाई देता था। उसको आते देख वहाँ सब यादव आतंकित हो गए और श्रीकृष्णचंद्र के चरणारविंदों का स्मरण करते हुए वे सब आपस में इस प्रकार कहने लगे।
यादव बोले- मित्रों ! बताओ, यह कौन हमारे निकट आ पहुँचा है ? इसका रूप बड़ा ही वीभत्स है और यह काल के समान निर्भय प्रतीत होता है। इस प्रकार जब सब लोग बोलने लगे तो वहाँ महान कोलाहल छा गया। बक को देखकर वे सब निशाचर प्रसन्न हो गए। राजन ! भीषण को मूर्च्छित देख राक्षसराज बक संग्राम में बारंबार ‘हा दैव ! हा दैव !’ कहता हुआ शोकमग्न हो गया। नरेश्वर ! तत्पश्चात् दो घड़ी में मूर्च्छा त्याग कर भीषण उठा और कहने लगा– मेरे भय से गद कहाँ भाग गया ? अपने पुत्र को उठा देख उस नरभक्षी राक्षस को बड़ा हर्ष हुआ। बह बोलने में बहुत कुशल था। उसने बेटे को हृदय से लगा कर उत्तम वचनों द्वारा उसे आश्वासन दिया। महाराज ! पिता को सहायता के लिए आया देख भीषण ने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें प्रणाम किया।
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