10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 20 || बक और भीषण की पराजय तथा यादवों का घोड़ा लेकर आकाश मार्ग से लौटना
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 20 || बक और भीषण की पराजय तथा यादवों का घोड़ा लेकर आकाश मार्ग से लौटना
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! तदनन्तर असुरों के बीच मं खड़े होकर राक्षस बक ने भीषण से युद्ध का अभिप्राय ( कारण ) पूछा- बेटा ! इन तिनकों के समान यादवों के साथ किसलिए युद्ध हुआ था, जिससे तुम मूर्च्छित हो गए और बहुत से राक्षस मागे गए ? यह तो बड़े आश्चर्य की बात है।
राजन् ! बक के इस प्रकार पूछने पर भीषण ने मुँह नीचा करके अश्वमेध के घोड़े को पकड़ लाने के संबंध में सारी बात बताई। पुत्र की बात सुनकर बक ने अपनी गदा ले ली और यादव सेना में उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे जंगल में दावानल प्रकट हो जाता है। जैसे सिंह सोये हुए मृगों को रौंद डालता है, उसी प्रकार सामने आए हुए यादवों को बक ने दोनों पैरों से, हाथों से, भुजाओं से और गदा के आघात से कुचल डाला। वह घोड़ों को पकड़कर आकाश में फेंक देता था, हाथियों तथा रथों की भी यही दशा करता था। बलवान बक युद्ध में मनुष्यों को अपना भक्ष्य बनाता हुआ जोर–जोर से गर्जना करने लगा। यदुकुल तिलक वज्रनाभ ! उस राक्षस की गर्जना से लोकोंसहित संपूर्ण विश्व गूंज उठा। भूमंडल की जनमंडली बहरी हो गई। उसके इस विपरीत युद्ध से समस्त यादव हाहाकार करने लगे और मन में अत्यंत खिन्न हो गए। उस दुरात्मा राक्षस से अपनी सेना को अत्यंत पीड़ित होती देख प्रचण्ड पराक्रमी जाम्बवती नंदन साम्ब ने पांच नाराच ले अपने धनुष पर रखकर तत्काल ही बक को लक्ष्य करके छोड़े। मानद नरेश ! वे बाण उसके शरीर को विदीर्ण करते हुए तत्काल भूतल में घुस गए और भोगवती गंगा का जल पीने लगे।
राजन ! उन बाणों के आघात से वक पृथ्वी को कंपित करता हुआ गिर पड़ा, किंतु पुन: उठकर मेघ गर्जना के समान सिंह नाद करने लगा। तब पुन: जाम्बवती कुमार ने उसे पाँच बाण मारे। उन बाणों के आघात से चक्कर काटता हुआ बक लंका में जा गिरा। नरेश्वर ! वहाँ से आकर उस राक्षस ने अग्नि के समान प्रज्वलित तीन शिखाओं वाले त्रिशूल को लेकर साम्ब पर दे मारा, जैसे किसी फूल से हाथी पर आघात किया हो। त्रिशूल को आते देख साम्ब ने शीघ्र ही बाण मार कर अनायास ही युद्ध स्थल में उसके टुकड़े–टुकड़े कर डाले, जैसे गरुड़ ने किसी नाग को छिन्न–भिन्न कर डाला हो। महाराज ! तब रणदुर्मद बक ने भारी गदा लेकर साम्ब के घोड़ों और सारथि को मार डाला। फिर रथ और पताका को भी चूर–चूर करके वह साम्ब से बोला– तुम दूसरे रथ पर बैठकर मेरे साथ युद्ध करो। इस समय तुम रथहीन हो, इसलिए रणभूमि में अधर्म या अन्याय से तुम्हें नहीं मारूंगा।
उस दैत्य के ऐसा कहने पर हंसते हुए साम्ब ने किंचित कुपित होकर बक की कपाट जैसी छाती पर शीघ्र ही गदा से आघात किया। युद्धस्थल में उस गदा से आहत हुआ बक मन ही मन कुछ व्याकुल हो उठा। फिर वह साम्ब की कोई परवा न करके यादव सेना में जा घुसा। वहाँ पहुँचकर उस निशाचर ने गदा के आघात से बहुत से हाथियों, घोड़ों, रथों और मनुष्यों को सी तरह मार गिराया, जैसे मृगराज सिंह मृगों के समुदाय को धराशायी कर देता है। नृपेश्वर ! उस समय यादव सेना में हाहाकार मच गया। राजन् ! यह देक रुक्मवती नंदन अनिरुद्ध रोषपूर्वक एक अक्षौहिणी सेना के साथ वहाँ आए और सबको अभय देते हुए बोले।
अनिरुद्ध ने कहा– रे मूढ़ ! तू वीर पुरुष का सामना छोड़ कर क्या युद्ध करेगा ? निशाचर ! भयभीतों को मारने से तेरी प्रशंसा नहीं होगी। यदि तेरे शरीर में शक्ति है तो मेरी बात सुन। मेरे सामने आकर यत्नपूर्वक युद्ध कर।
राजन् ! इस प्रकार अनिरुद्ध की बात सुनकर बकासुर रोष से सर्प की भाँति फुंफकारता हुआ उनके सामने शीघ्र युद्ध के लिए आया। युद्ध स्थल में उसे आया देख धनुर्धरों में श्रेष्ठ अनिरुद्ध ने रोषपूर्वक उसे दस नाराच मारे। वे बाण शीघ्र ही उसके शरीर को छेदकर बाहर निकले और फिर भीषण को भी विदीर्ण करते हुए भूतल में समा गए। तब भीषण सहित बक मूर्च्छित हो वज्र से आहत हुए पर्वत के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा। उस समय यादव सेना में जय–जयकार होने लगा। दुन्दुभियां बज उठीं, नगाड़े पीटे जाने लगे और शंखों तथा गोमुखों की ध्वनि होने लगी। अपने दोनों स्वामियों को घिरा हुआ देख समस्त राक्षसों का हृदय क्रोध से भर गया। वे यादवों को मारने के लिए एक साथ ही उन पर टूट पड़े। फिर तो समरांगण में दोनों सेनाओं के बीच घोर युद्ध होने लगा। बाम, खड्ग, गदा, शक्ति और भिन्दिपालों द्वारा परस्पर आघात–प्रत्याघात होने लगे। राजन् ! राक्षसों के तीव्र बल को देख कर श्रीहरि के साम्ब आदि अठारह पुत्र तीखे बाणों द्वारा उन पर प्रहार करने लगे। वहाँ उन सबके बाण समूहों से घायल हो बहुत से राक्षस युद्धस्थल में सदा के लिए सो गए। कुछ तो मौत के मुख में पड़ गए और कुछ जीवित रहने की इच्छा से मैदान छोड़ कर भाग गए।
राजन् ! तदनन्तर दो घड़ी के बाद भयंकर उठकर भयंकर असुर बक तत्काल ही अपने शत्रु अनिरुद्ध के सम्मुख गया। वहाँ जाकर बक ने अपने हाथ में एक भारी गदा लेकर उसे अनिरुद्ध के सिर पर फेंका और कहा– लो अब तुम मारे गए। महाराज ! उस गदा को अपने ऊपर आती देख अनिरुद्ध ने यमदण्ड से उसे उसी तरह चूर–चूर कर दिया, जैसे कटुवचन से मित्रता नष्ट कर दी जाती है। तब क्रोध से भरा हुआ बक अपना मुखमंडल फैलाकर अनिरुद्ध को खा जाने के लिए उनकी ओर दौड़ा, मानो राहू ने कहीं चंद्रमा पर ग्रहण लगाने के लिए आक्रमण किया हो। उसे निकट आया देख धनुर्धरों में श्रेष्ठ अनिरुद्ध ने फिर यमदण्ड उठाकर उसके ऊपर आघात किया। राजन् ! उस आघात से बक का मस्तक फट गया और वह मुख से रक्त वमन करता तथा पृथ्वी को कँपाता हुआ मुर्च्छित होकर गिर पड़ा।
वज्रनाभ ! पिता को मुर्च्छित हुआ देख भीषण ने रणक्षेत्र में परिघ लेकर यादवों का संहार आरंभ किया। तब बलवान अनिरुद्ध ने रोषपूर्वक नागपाश से भीषण को बाँध कर उसी प्रकार खींचा, जैसे गरुड़ सर्प को खींचते हैं। वरुण के पाश से बंध कर उसने हतोत्साह होकर अपना मुंह नीचे कर लिया। उसे पराजित और बलहीन देख साम्ब बोले- असुरेंद्र ! तुम्हारा भला हो। तुम अपनी पुरी में जाकर शीघ्र विधिपूर्वक अनिरुद्ध के यज्ञ संबंधी घोड़े को लौटा दो। अनिरुद्ध महात्मा श्रीकृष्ण हरि के पौत्र हैं। ये घोड़े की रक्षा के बहाने मनुष्यों को अपने स्वरूप का दर्शन कराने के लिए विचर रहे हैं। देवता, दैत्य और मनुष्य सभी आकर इनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं। ये मनुष्यों के समस्त पापों का नाश करने वाले हैं। तुम इन्हें श्रीकृष्ण के समान ही समझो। राक्षस ! तुम युद्ध में श्रीकृष्ण से पराजित हुए हो– ऐसा समझकर दु:ख और चिन्ता त्याग दो और हम लोगों के साथ श्रीकृष्ण का दर्शन करने के लिए चलो।
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! साम्ब के इस प्रकार समझाने और वरुण पाश से मुक्त कर दिए जाने पर भीषण ने पुरी में जाकर वहाँ से द्रव्यराशि से साथ घोड़ा लाकर अनिरुद्ध को लौटा दिया। तब अनिरुद्ध ने उससे भी अश्व की रक्षा के लिए चलने का अनुरोध किया। नरेश्वर ! उनके इस प्रकार अनुरोध करने पर भीषण ने कुछ सोच–विचार कर उत्तर दिया।
भीषण ने कहा– मेरे असुर पालक पिता जब सचेत हो जाएंगे, तब मैं उनकी आज्ञा लेकर आऊँगा, इसमें संशय नहीं है। भीषण के ऐसा कहने पर प्रद्युम्न पुत्र अनिरुद्ध ने यादव सेना के साथ यज्ञ के घोड़े को विमान पर चढ़ा लिया और स्वयं भी उस पर आरूढ़ हो, वे आकाश मार्ग से चल दिए।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘उपलंका पर विजय’ नामक बीसवां अध्याय पूरा हुआ।
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