10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 22 || यज्ञ के घोड़े का अवन्तीपुरी में जाना और वहाँ अवन्ती नरेश की ओर से सेना सहित यादवों का पूर्ण सत्कार होना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 22 || यज्ञ के घोड़े का अवन्तीपुरी में जाना और वहाँ अवन्ती नरेश की ओर से सेना सहित यादवों का पूर्ण सत्कार होना

श्रीगर्गजी कहते हैं– महाराज ! यदुकुल तिलक वीरवर अनिरुद्ध का वह घोड़ा अनेक जनपदों का अवलोकन करता हुआ राजपुर जनपद में जा पहुँचा। मार्ग में सफरा (शिप्रा) नदी का दर्शन करके वह अवन्तिका (उज्जयिनी) के उपवन में जा खड़ा हुआ। उसी समय श्रीकृष्ण के गुरु महात्मा विप्रवर सान्दीपनि स्नान करने के लिए घर से चल कर वहाँ आए। उन्होंने तुलसी की माला पहन रखी थी। कंधे पर धौत वस्त्र रख छोड़ा था और मुख से श्रीकृष्ण नाम का जप कर रहे थे। उन्होंने वहाँ पानी पीते हुए श्वेत एवं श्याम कर्ण घोड़े को, जिसके भाल देश में पत्र बंधा हुआ था, देखा देख कर पूछा– किस नृपेश्वर ने इस यज्ञ के घोड़े को छोड़ा है। 

नरेश्वर ! वहाँ राजकुमार बिन्दु को स्नान करते देख उन्हें घोड़े के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए जाकर प्रेरित किया। महाराज ! तब राजाधिदेवी के वीर पुत्र बिन्दु ने अन्य बहुत से वीरों के साथ जाकर सहसा उस घोड़े को पकड़ा और उसका भली-भाँति निरीक्षण करके लौट कर गुरु सान्दीपनि को प्रणाण कर उसके विषय में बताया। तत्पश्चात् गुरु के आदेश से प्रसन्न हो राजकुमार घोड़ा लेकर आए और हर्षपूर्वक गुरुजी को दिखलाने लगे। सान्दीपनि ने भाल पत्र पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक राजा को बताया।

सान्दीपनि बोले- राजन ! इसे राजा उग्रसेन का घोड़ा समझो। प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्ध इसकी रक्षा में आए हैं। यह अश्व अपने इच्छानुसार घूमता हुआ यहाँ तक आ गया है। अब अनिरुद्ध भी यहाँ आएँगे। उनके साथ और भी बहुत से युद्धशाली यादव वीर पधारेंगे। घोड़े का निरीक्षण करते हुए तुम्हारी बहन मित्रबिन्दा के पुत्र भी आएंगे। तुम्हें यहाँ श्रीकृष्णचंद्र के सभी पुत्रों का आदर सत्कार करना चाहिए। मेरे कहने से तुम युद्ध का विचार छोड़कर घोड़ा उन्हें लौटा देना।

गुरु का यह कथन सुनकर धनुर्धर शूरवीर राजकुमार चुप रह गया। उसका मन घोड़े को पकड़ ले जाने का था। उसी समय यादव सेना का कोलाहल सुनाई पड़ा, जो समस्त लोकों के मान का मर्दन करने वाला था। दुन्दुभियों का महानाद, धनुषों की टंकार, हाथियों की चीत्कार, घोड़ों की हिनहिनाहट, रथों का झणत्कार, वीरों की गर्जना तथा शतघ्नियों का महानाद– इन सबका तुमल शब्द समस्त लोकों के ले भयदायक था। उसे सुनकर राजकुमार बिंदु को बड़ा विस्मय हुआ। इतने में ही रथियों, हाथियों और घोड़ों के साथ भोज, वृष्णि, अंधक, मधु, शूरसेन तथा दशार्हवंश के समस्त यादव वहाँ आ पहुँचे। वे सेना की धूलि से आकाश को व्याप्त तथा पैरों की धमक से पृथ्वी को कंपित करते हुए आए और सब के सब पूछने लगे– यज्ञ का घोड़ा कौन ले गया, कहा गया ?

उस समय समस्त अन्वेषकों ने पुष्पवाले वृक्षों से व्याप्त अत्यंत अद्भुत उपवन में चामर बंधे हुए घोड़े को देखा, जिसे राजकुमार बिन्दु ने अनायास ही पकड़ लिया था। देखकर सबने अनिरुद्ध के निकट जाकर इसकी सूचना दी। सूचना पाकर धर्मज्ञ अनिरुद्ध विस्मित हुए। उन्होंने हंसते हुए बिंदु के पास उद्धवजी को भेजा। महाराज ! उस समय अवन्तीपुरी में महान कोलाहल छा गया। वहाँ एकत्र हुई भयंकर सेना को देख कर सब लोग भयभीत हो उठे थे। इसी समय अपने भाई की खोज–खबर लेने के लिए भयभीत अनुबिंदु एक करोड़ वीरों के साथ अपनी पुरी से बाहर निकला। वह दुग्धराशि के समान धवल एवं भाल पत्र से युक्त यज्ञ संबंधी अश्व को वहाँ अपने भाई द्वारा पकड़ा गया देख उसे मना करता हुआ बोला।

अनुबिंदु ने कहा- भैया ! भगवान श्रीकृष्ण जिनके देवता हैं, उन यादवों का यह घोड़ा है। आप उनके साथ जो हमारा संबंध है, उसके बहाने या अपने कुल की कुशलता के लिए इस घोड़े को छोड़ दीजिए। यादवों की यह सेना तो देखिए। भैया ! पहले जो राजसूय यज्ञ हुआ था, उसमें इन यादवों ने देवता, दैत्य, मनुष्य और असुर सब पर विजय पाई थी। अनुबिंदु की यह बात सुनकर बड़ा भाई बिंदु हार मान गया। उसने घोड़े पर चढ़ कर आए हुए उद्धवजी से कहा।

बिंदु बोला- मंत्रिवर ! मैंने मित्रों के साथ मिलने के लिए घोड़े को पकड़ रखा है। अत: आप सब लोगों को निमंत्रित किया जाता है। आज आप लोग यहीं ठहरें। 

राजन् ! यह सुनकर उद्धव बिंदु की सराहना करके बड़े प्रसन्न हुए और अनिरुद्ध के निकट जाकर उन्होंने सब समाचार बताया। नरेश्वर ! उद्धवजी का कथन सुनकर अनिरुद्ध का मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने सेना सहित अवन्तीपुरी में शिप्रा नदी के तट पर पड़ाव डाल दिया। महाराज ! वहाँ दस योजन दूर तक के भू भाग में रंग बिरंगे अनेक शिविर पड़ गए। सभी सुवर्ण कलशों से युक्त थे। वे सुंदर शिविर वहाँ अद्भुत शोभा पा रहे थे। राजकुमार बिंदु ने वहाँ आए हुए सब लोगों का भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य– इन चारों प्रकार के भोजनों द्वारा आतिथ्य सत्कार किया। इसी तरह अवन्ती नरेश ने सेना वर्ती पशुओं को भी घास पात और अन्न आदि प्रदान किए। उन्होंने वृष्णिवंशी वीरों का इस प्रकार स्वागत सत्कार किया। राजाधिदेवी, उनके पति तथा दोनों राजकुमार सब के सब श्रीहरि के समस्त पुत्रों को देक कर बड़े प्रसन्न हुए। 

तदनन्तर रात में प्रद्युम्न अनिरुद्ध अपने बाबा के गुरु सान्दीपनि मुनि को बुलाकर उनके चरणों में प्रणाम किया। उन्हें आसन देकर बैठाया और उत्तम रीति से उनका पूजन करके कहा- भगवन ! द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से चक्रवर्ती यदुकुलतिलक महाराज उग्रसेन अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं। ब्रह्मन मुनिश्रेष्ठ ! आप मुझ पर कृपा करके उस श्रेष्ठ यज्ञ में अपने पुत्र सहित अवश्य पधारें। अनिरुद्ध का यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण दर्शन के अभिलाषी सान्दीपनि मुनि ने वहाँ चलने का निश्चय किया।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘अवन्ति का गमन’ नामक बाईसवां अध्याय पूरा हुआ।


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