10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 25 || अनुशाल्व द्वारा प्रद्युम्न को उपहार सहित अश्व का अर्पण तथा बल्वल दैत्य द्वारा उस अश्व का अपहरण

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 25 || अनुशाल्व द्वारा प्रद्युम्न को उपहार सहित अश्व का अर्पण तथा बल्वल दैत्य द्वारा उस अश्व का अपहरण 

श्रीगर्गजी कहते हैं– उन दोनों का युद्ध देख कर यादव परस्पर कहने लगे– अनुशाल्व धन्य है। शत्रु सैनिक आपस में चर्चा करने लगे कि गद महान वीर हैं। वे सब इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि गद वहीं सचेत होकर उठे और बोल पड़े– मेरा शत्रु मुझ पर प्रहार करके रण क्षेत्र से कहाँ गया ! कहाँ गया ?

-ऐसा कहकर उन्होंने अनुशाल्व को हाथ से पकड़कर रोषपूर्वक खींचा और अनिरुद्ध के निकट बड़े वेग से दे मारा। अनुशाल्व औंधे मुँह गिरा और मूर्च्छित हो गया। यह देख अनिरुद्ध ने स्वयं पानी छिड़ककर और व्यजन डुलवाकर उसे होश कराया। उसी समय असुरेश्वर अनुशाल्व मूर्च्छा से जाग उठा और अपने सामने मेघ के समान श्याम वर्ण वाले परम सुंदर श्रीकृष्ण पौत्र को देखकर उन्हें प्रणाम करके बोला– श्रीकृष्ण पौत्र अनिरुद्ध ! आपने मेरे प्राणों की रक्षा की है, अत: मैंने जो अपराध किया है उसे क्षमा कर दें। सच्चिदानंद स्वरूप भगवान वासुदेव को नमस्कार है। संकर्षण को प्रणाम है। प्रद्युम्न को नमस्कार है और आप अनिरुद्ध को प्रणाम है।¹आप अपना घोड़ा लीजिए और मैं भी इसकी रक्षा के लिए आपके साथ चलूंगा।

ऐसा कहकर उसने नगर में जाकर अनिरुद्ध को घोड़ा लौटा दिया। साथ ही दस हजार हाथी, एक लाख घोड़े, पचास हजार रथ तथा एक सहस्र शिविकाएं उन्हें भेंट कीं। नृपश्रेष्ठ ! इनके अतिरिक्त राजा अनुशाल्व ने एक हजार ऊँट, एक सहस्र गवय (वन गाय अथवा घड़रोज ) पिंजरे में बंद हो हजार सिंह, एक हजार शिकारी कुत्ते, एक सहस्स्र शिविर (तंबू–कनात), एक लाख रुनझुन शब्द करती हुई धनुष की प्रत्यंचाएँ, दस हजार पर्दे, एक लाख दुधारू गायें, सहस्र भार सुवर्ण, चार सहस्र भार चांदी और एक भार मोती अनिरुद्ध को अर्पित किए। तब अनिरुद्ध ने अत्यंत प्रसन्न हो उसे मणिमय हार भेंट किया।

अनुशाल्व अपने राज्य पर श्रेष्ठ सचिव को स्थापित कर यादवों के साथ स्वयं भी अन्यान्य देशों को गया। भूपते ! तत्पश्चात् छूटा हुआ मणिमय और सुवर्ण मय आभूषणों से विभूषित वह अश्व वीरों से भरे दूसरे दूसरे देशों का दर्शन करता हुआ भ्रमण करने लगा। अनुशाल्व हार गया, यौवनाश्व तथा भीषण भी परास्त हो गए– यह सुनकर अन्यान्य मंडलेश्वर नरेशों ने अपने यहाँ आने पर उस घोड़े को नहीं पकड़ा। महाराज ! इस तरह घूमते हुए उस घोड़े को छ: मास बीत गए और उतने ही शेष रह गए।

नरेश्वर ! मणिपुर के राजा तथा रत्नपुर के भूपाल ने घोड़े को पुन: पकड़ा, किंतु अनिरुद्ध के भय से उसको छोड़ दिया। राजन् ! वह श्रेष्ठ अश्व शूरवीरों से रहित समस्त राष्ट्रों को छोड़कर प्राची दिशा में गया, जहाँ दैत्यराज बल्वल निवास करता था। यह दैत्य नारदजी के मुख से यज्ञ संबंधी घोड़े का समाचार सुन कर नैमिषारण्य में होने वाले यज्ञ का विनाश करके वहाँ से शीघ्र ही अपने नगर को लौटा। रास्ते में उसने देखा, वह यज्ञ संबंधी घोड़ा प्रयागतीर्थ में त्रिवेणी का जल पी रहा है। राजन ! उसे देखते ही बल्वल ने भगवान श्रीकृष्ण की कोई परवा न करके उसे शीघ्र ही जा पकड़ा। उसी समय समस्त वृष्णिवंशी योद्धा दणडकारण्य का दर्शन करते हुए चर्मण्वती नदी पार करके चित्रकूट में आ पहुँचे। वहाँ श्रीराम क्षेत्र में दान करके अश्व को देखते हुए उसके पीछे लगे वे सब लोग तीर्थ राज प्रयाग में आ गए।

राजन ! वहाँ पहुँचकर उन श्रेष्ठतम यादव वीरों ने देखा कि पत्र सहित अश्व को दुरात्मा असुर बल्वन ने बलपूर्वक पकड़ रखा है। बल्वल नील अंजन के ढेर की भाँति दिखाई पड़ता था। उसके शरीर की ऊंचाई दो योजन की थी। उस उग्रदैत्य के नेत्र अंगार के समान जान पड़ते थे। उसकी दाड़ी–मूँछ तपाई हुई ताम्र शिखा के समान दिखाई देती थी। बड़ी-बड़ी दाढ़ और उग्र भ्रकुटि के कारण उसका मुख भयंकर प्रतीत होता था। वह ब्राह्मण द्रोही असुर अपनी जीभ लपलपा रहा था और उसमें दस हजार हाथियों के अधर–पल्लव रोष से फड़क उठे और वे बोले- अरे ! तू कौन है ? हमारा यह यज्ञ पशु लेकर तू कहाँ जाएगा ? अत: इसे शीघ्र छोड़ दे, नहीं तो हम लोग युद्ध में तुझे मार डालेंगे। यह सुनकर उस असुर ने कहा– मनुष्यों ! मेरी बात सुनो।

बल्वल ने कहा– मैं देवताओं को दु:ख देने वाला दैत्य बल्वल हूँ, जिसके सामने सारे मनुष्य भय से व्याकुल हो जाते हैं। यह सुनकर यादवों ने बल्वल को बाणों से मारना आरंभ किया। नरेश्वर ! उनके बाणों की चोट खाकर बल्वल घोड़े सहित सहसा अंतर्धान हो गया।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘बल्वल द्वारा अश्व का अपहरण’ नामक पचीसवां अध्याय पूरा हुआ।




1. ओम नमो वासुदेवाय नम: संकर्षणाय च। प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नम: (25/7)


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