10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 26 || नारदजी के मुख से बल्वल के निवास स्थान का पता पाकर यादवों का अनेक तीर्थों में स्नान–दान करते हुए कपिलाश्रम तक जाना और वहाँ कपिल मुनि को प्रणाम करके सागर के तट पर सेना का पड़ाव डालना
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 26 || नारदजी के मुख से बल्वल के निवास स्थान का पता पाकर यादवों का अनेक तीर्थों में स्नान–दान करते हुए कपिलाश्रम तक जाना और वहाँ कपिल मुनि को प्रणाम करके सागर के तट पर सेना का पड़ाव डालना
श्रीगर्गजी कहते हैं– राजन् ! यज्ञ पशु के अपहृत हो जाने पर समस्त यादवगण शोक करने लगे कि हम कहाँ जाएं और इस पृथ्वी पर क्या करें ? अनिरुद्ध आदि सब लोगों को उस समय कोई उपाय नहीं सूझा। नरेश्वर ! तब श्री नारद रूपधारी भगवान वहाँ आ पहुँचे। देवर्षि नारद को आया देख यादवों सहित अनिरुद्ध ने आसन पर बैठा कर उनका पूजन किया और बड़े प्रसन्न होकर वे उन मुनिश्वर से बोले।
अनिरुद्ध ने कहा- भगवन् ! वक्ताओं में श्रेष्ठ मुने ! दुरात्मा दैत्य बल्वल हमारा घोड़ा लेकर कहाँ चला गया ? यह सब मुझे बताइये। आपका दर्शन दिव्य है। आप सूर्यदेव की भाँति तीनों लोकों में विचरते हैं। त्रिभुवन के भीतर वायु के समान विचरण करने वाले आप सर्वज्ञ तथा आत्मसाक्षी हैं। इसलिए सब बात मुझसे कहिए। अनिरुद्ध का प्रश्न सुनकर नारदजी माधव प्रद्युम्न कुमार से बोले।
नारदजी ने कहा– नृपेश्वर ! बल्वल ने तुम्हारे घोड़े को समुद्र के बीच में बसे हुए पाञ्चजन्य नामक उपद्वीप में ले जाकर रख दिया है। उसका मित्र या बंधु शकुनि यादवों के हाथ से मारा गया था, अत: यादवों का वध करने के लिए उसने यह कार्य किया है। वह महान असुर सुतलोक से दैत्य समूहों को बुलाकर वहाँ राज्य करता है। भगवान शिव का वरदान पाकर वह घमंड से भरा रहता है।
अनिरुद्ध बोले- देवर्षे ! चंद्रमौलि भगवान शिव ने उस दैत्य को कौन सा श्रेष्ठ वर प्रदान किया है ? उसके किस कार्य से शिवजी संतुष्ट हो गए थे।
तब मुनिवर नारद ने कहा– प्रद्युम्न कुमार ! मेरी बात सुनो। एक समय उस दैत्य ने कैलाश पर्वत पर एक पैर से खड़े रह कर बारह वर्षों तक अत्यंत कठोर तप किया। उस तपस्या से संतुष्ट होकर महादेव जी ने कहा– वर मांगो। उनकी बात सुन कर वह बोला– सदा शिव ! आपको मेरा नमस्कार है। कृपानिधान ! देव ! महासमर में आप मेरी रक्षा करें। नरेश्वर ! तब तथास्तु कहकर महादेवजी वहीं अंतर्धान हो गए। फिर वह दैत्य पाञ्चजन्य उपद्वीप में बलपूर्वक राज्य करने लगा। वह युद्ध के बिना स्वत: तुम्हें घोड़ा नहीं देगा।
तब अनिरुद्ध कहने लगे– मुनिश्रेष्ठ ! मैं सेना सहित दुष्ट बल्वल को मार कर घोड़ा छुड़ा लूँगा। यदि यह भगवान शिव के वरदान से युद्ध करेगा तो मुझे विश्वास है कि शिवजी उस युद्ध में श्रीकृष्ण द्रोही दुष्ट की रक्षा नहीं करेंगे।
ऐसा कहकर अनिरुद्ध ने विजय यात्रा के लिए सहसा समस्त यादवों को आज्ञा दी। नृपेश्वर ! नारदजी के हृदय में युद्ध देखने का कौतूहल था। वे अनिरुद्ध से विदा ले आकाश मार्ग से उस स्थान पर गए। समस्त यादव तत्काल तीर्थराज में विधिवत स्नान–दान करके रोषपूर्वक युद्ध यात्रा के लिए सुसज्जित हो गए।
राजन् ! वे हाथियों, घोड़ों तथा रथों के द्वारा उस उपद्वीप में गए। प्रतिदिन दो लाख सिपाही उनके जाने के लिए मार्ग तैयार करते थे। वे भिन्दिपालों की सहायता से सर्वत्र सेना के लिए पहले ही मार्ग तैयार कर देते ते, जिस पर रथ, हाथी और घोड़े सुख से यात्रा करते थे। राजेंद्र ! उस निष्कण्टक मार्ग में पैदल सिपाही भी तीव्रगति से चलते थे। यादव सेना के भार से पीड़ित हो शेषनाग मन ही मन कहते थे– न जाने भूतल पर क्या हो गया है ?
नरेश्वर ! अनिरुद्ध सेना के आगे होकर अलक्षित भाव से चलते थे। वे अश्व की रक्षा के बहाने पापियों का विनाश सा करते थे। राजन् ! प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्ध अश्व की रक्षा के लिए जहाँ-जहाँ गए, वहाँ-वहाँ वे श्रीकृष्ण के समग्र यश का गान सुनते थे। उनको वे रत्न, वस्त्र और आभूषण बाँटते थे। उनकी सेनाओं में जो कुछ भी उत्तम धन था, वह सब श्रीकृष्ण कथा से आकृष्टचित्त हो वे प्रसन्नतापूर्वक दे डालते थे।
राजन् ! इस प्रकार श्रीहरि का यशोगान सुनते और काशी तथा गया आदि तीर्थों को देखते हुए वहाँ अनेक प्रकार के दान दे, वे पूर्वदिशा की ओर चले गए। यादवों ऐसी भयंकर सेना देखकर गिरि–व्रजपुर के स्वामी जरासंध पुत्र सहदेव शंकित हो गए। वे नाना प्रकार के रत्नों की भेंट ले, भय से विह्वल हो, दोनों हाथ जोड़कर अनिरुद्ध के चरणों में गिर पड़े। शरणागत वत्सल अनिरुद्ध ने सहदेव को प्रसन्नतापूर्वक रत्नमयी माला भेंट की और उन्हें उनके राज्य पर स्थापित करके शीघ्र ही श्रेष्ठ वृष्णिवंशी वीरों के साथ वे कपिलाश्रम को गए। उन श्रेष्ठ यादव वीर ने वहाँ गंगासागर संगम में स्नान किया और सिद्ध मुनीन्द्र कपिल का दर्शन करके सेना सहित उनके चरणों में मस्तक झुकाया। राजन ! उस स्थान से दक्षिण दिशा में समुद्र के तट पर महलों के समान ऊँचे–ऊँचे शिविर लग गए। राजेंद्र ! उन शिविरों में अनुयायियों सहित अनिरुद्ध आदि शूरवीर और विजयाभिलाषी समस्त यादवों ने निवास किया।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ’अश्व के लिए उपद्वीप में गमन’ नामक छब्बीसवां अध्याय पूरा हुआ।
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