10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 28 || यादवों का पाञ्चजन्य उपद्वीप में जाना, दैत्यों की परस्पर मंत्रणा, मयासुर का बल्वल को घोड़ा लौटा देने के लिए सलाह देना, परंतु बल्वल का युद्ध के निश्चय ही अडिग रहना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 28 || यादवों का पाञ्चजन्य उपद्वीप में जाना, दैत्यों की परस्पर मंत्रणा, मयासुर का बल्वल को घोड़ा लौटा देने के लिए सलाह देना, परंतु बल्वल का युद्ध के निश्चय ही अडिग रहना

श्रीगर्ग कहते हैं- नृपेंद्र ! प्रात:काल शौचादिकर्म करके यदुनंदन अनिरुद्ध यादवों के साथ ! उसी प्रकार सागर के उस पार गए, जैसे पूर्वकाल में कपियों के साथ श्रीरामचंद्रजी गए थे। वहाँ जाकर उन अनिरुद्ध आदि यादवों ने पाञ्चजन्य उपद्वीप देखा, जिसका विस्तार सौ योजन था। राजेंद्र ! उस उपद्वीप में आसुरी पूरी शोभा पाती थी, जो बीस योजन तक फैली हुई थी। उसमें दैत्यों के समुदाय निवास करते थे। पुंनाग, नागकेसर, चम्पा, कोविदार, निम्ब, जम्बू, कदम्ब, प्रियाल, पनस (कटहल), साल, ताल, मौल श्री, चम्पक तथा मदन नाम वाले वृक्ष एवं पुष्प उस रमणीय नगरी की शोभा बढ़ाते थे। उसमें रत्नों के महल बने हुए थे। 

यादवों का आगमन सुनकर दुष्ट बल्वल ने महात्मा यादवों की सेना की गणना करने के लिए मायवी मय को भेजा। उसने तोते का रूप धारण करके वहाँ जाकर सब यादवों को देखा और लौटकर अत्यंत विस्मित हो पुरी के भीतर बल्वल से कहा।

मय बोला- दैत्यराज ! बलवान वृष्णिवंशी योद्धाओं की गणना कौन कर सकता है ? जहाँ वे प्रद्युम्न पुत्र अनिरुद्ध लाख–लाख करौड़ सैनिकों के साथ सुशोभित हैं। समस्त यादव समुद्र के ऊपर से बाणों से सेतु का निर्माण करके तुम्हारे ऊपर चढ़ आए हैं। राजन देखो, उनकी सेना देवताओं को भी विस्मय में डालने वाली है। दैत्यराज ! मैं बूढ़ा हो गया हूँ, परंतु आज तक सागर के ऊपर बाणों का बना हुआ पुल न तो देखा था और न सुना ही था। आज तुम्हारे सामने ही यह देखने को मिल रहा है। 

रघुकुल शिरोमणि श्रीराम ने पूर्वकाल में लंका के निकट जो सेतु निर्माण किया था, वह पत्थरों और वृक्षों से बनाया गया था और उनके नाम के प्रताप से पानी के ऊपर प्रस्तर ठहर सके थे। वह सारा सेतु मैंने प्रत्यक्ष देखा ता, परंतु आज जो देखा है, वह तो बहुत ही अद्भुत है। राजन् ! पूर्व कालमें श्रीकृष्ण ने कंस आदि तथा शकुनि आदि दैत्यों को युद्ध में मारा था और समस्त राजाओं को परास्त कर दिया था। श्रीकृष्ण तो साक्षात भगवान हैं। पूर्वकाल में ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए गोलोक से भूमि पर पधारे हैं। वे दुष्ट पापियों का विनाश करने के लिए कुशस्थली में विराजमान हैं। इसीलिए अनिरुद्ध आदि महाबली समस्त श्रेष्ठ यादव भीषण, बक तथा अन्य नरेशों को परास्त करके यहाँ आए हैं। श्रीकृष्ण के पुत्र, पौत्र तथा जाति भाई श्रेष्ठ यादव आकाश भी जीतने का हौसला रखते हैं, फिर भूतल पर विजय पाने की तो बात ही क्या ? अत: बल्वल ! तुम मरने से बचे हुए दैत्यों की भलाई और अपने कुल की कुशलता के लिए अनिरुद्ध को घोड़ा लौटा दो। देवद्रोही दैत्यों को सुख मिले, इस उद्देश्य से अनिरुद्ध को घोड़ा देकर श्रीकृष्णचंद्र का भजन करते हुए तपस्या से प्राप्त हुए अपने राज्य को भोगो। 

इस प्रकार शुभ वचनों से समझाये जाने पर भी बल्वल श्रीकृष्ण से विमुक हो लंबी सांस खींचकर भय से रोष पूर्वक बोला।

बल्वल ने कहा- दैत्य ! तुम बिना युद्ध के ही कैसे भयभीत हो रहे हो, और मेरे सामने ऐसी बात बोल रहे हो जो शूरवीरों के लिए हास्य जनक है। तुम बुढ़ापे के कारण बुद्धि और बल दोंनों से हीन हो गए हो, इसलिए इस समय में तुम्हारी बात नहीं मान सकता। यद्यपि श्रीकृष्ण साक्षात भगवान हैं और ये यादव श्रीकृष्ण के ही वंशज हैं, तथापि में शिवजी का भक्त हूँ। मेरे सामने ये क्या पुरुषार्थ करें ? इसलिए तुम भय न करो। तुम्हारी मायाएं कहाँ चली गईं ? मैं तो तुम्हारे सहारे ही युद्ध करने जा रहा हूँ। अनिरुद्ध बड़े शूरवीर हैं तो क्या हम लोग शौर्य से संपन्न नहीं हैं ? मेरे रहते इस भूमण्डल में यादवों का यह बड़ा भारी गर्व क्या है ? मेरे धनुष से छुटे हुए सायकों द्वारा अनिरुद्ध अपनी वीरता के गर्व का फल प्राप्त करें। दैत्यप्रवर ! आज रणभूमि में मेरे तीखे बाण मानी अनिरुद्ध को उसके कवच छिन्न–भिन्न करके रक्त से लथपथ कर देंगे। आज योगिनियों के झुंड मनुष्यों की खपड़ियों से जी भर कर रक्तपान करें। वैरियों के कच्चे मांस को चबाकर आज महाकाली संतुष्ट हो जाए। अपने महान कोदण्ड से करोड़ों भल्लों की वर्षा करते हुए मुझ वीर के बाहुबल को समस्त सुभट प्रत्यक्ष देखें। 

बल्वल की यह बात सुनकर महाबुद्धिमानी मायावी मय श्रीकृष्ण के माहात्मय को जानने के कारण उस मदान्ध दैत्य से इस प्रकार बोला।

मय ने कहा– जब तुम रणक्षेत्र में श्रीकृष्ण के पुत्रों एवं यादवों को जीत लोगे तब तुम्हे परास्त करने के लिए श्रीकृष्ण अथवा बलराम यहाँ पदार्पण करेंगे। मय की बात सच्ची और हित कारक थी तो भी कालपाश से बंधे हुए उस महादैत्य ने उसे सुनकर भी स्वीकार नहीं किया, उलटे वह रोष से जल उठा।

बल्वल ने कहा– बलराम और श्रीकृष्ण मेरे शत्रु हैं। समस्त वृष्णिवंशी यादव मेरे वैरी हैं। जिन्होंने मेरे मित्रों को मारा है, मैं उन सबको मौत के घाट उतार दूँगा। यहाँ यादवों का ‌वध करके पीछे में भी यज्ञ करूँगा और उस यज्ञ के दिग्विजय प्रसंग में द्वारकापुरी पर विजय पाऊंगा।

मय बोला– दैत्यराज ! घमंड न करो। यह कालरूपी घोड़ा तुम्हारे नगर में आया है। अब तक मरने से जो बच गए हैं, उन महान असुरों को मरवा डालने के लिए ही इसका यहाँ पदार्पण हुआ है। असुरेश्वर ! अनिरुद्ध के समस्त बाण इसी क्षण तुम्हारी पुरी को छिन्न–भिन्न तथा शूरवीरों से हीन कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है। जिन्होंने हिरण्याक्ष आदि दैत्यों तथा रावण आदि निशाचरों को काल के गाल में भेजा था, वे ही श्रीकृष्ण यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं, ऐसा मैंने सुना है। बल्वल ! इस छोटे से राज्य के अभिमान में आकर तुम उन्हें नहीं जानते हो। मेरे कहने से घोड़ा अनिरुद्ध को दे दो। यह हमारे लिए युद्ध का समय नहीं है।

बल्वल बोला– मैं तुम्हारी बात समझता हूँ। तुम यादवों के साथ युद्ध नहीं करोगे। इसलिए पूर्वकाल में जैसे रावण का भाई विभीषण श्रीराम के पास चला गया था, उसी प्रकार तुम भी अनिरुद्ध के पास चले जाओ।

श्रीगर्गजी कहते हैं– राजन् ! बल्वल की यह बात सुनकर मायावियों में श्रेष्ठमय ने वहाँ अपने मानसिक दु:ख को दूर करने के लिए इस प्रकार विचार किया– पूर्वकाल में वैर भाव से भगवच्चिंतन करने के कारण बहुत से निशाचर और दैत्य वैकुण्ठधाम को जा पहुँचे। अत: जो भी उस भाव को अपने हृदय में स्थान देता है, उसकी अवश्य उत्तम गति होती है। ऐसा विचार करके मायासुर ने सहसा उस महान असुर से कहा।

मयासुर बोला– बल्वल ! तुम महान वीर हो। अब मैं तुझे युद्ध से नहीं रोकूंगा। तुम रणभूणि में जाकर युद्ध करो और अपने सायकों से यादवों को मार डालो। अब मैं भी तुम्हारे कहने से संग्राम भूमि में जाकर युद्ध ही करूँगा। 

ऐसा कहकर बल्वल को हर्ष प्रदान करता हुआ मयासुर मौन हो गया। राजन् ! तब ऊर्ध्वकेश, नद, सिंह और कुशाम्ब आदि चार मंत्रियों अत्यंत कुपित होकर बल्वल से कहा।

मंत्री बोलो– दैत्यराज ! पहले हम लोग समस्त श्रेष्ठ यादवों का वध करने के लिए युद्ध के मुहाने पर जाएँगे, क्योंकि हमें बहुत दिनों से संग्राम करने का अवसर नहीं मिला। राजेंद्र ! चिंता मत करो। हम लोग मयदैत्य के साथ रह कर कोटि–कोटि मनुष्यों को क्षणभर में मार गिराएँगे।

श्रीगर्गजी कहते हैं- नृपश्रेष्ठ ! उन मंत्रियों का भाषण सुनकर बल्वल को बड़ी प्रसन्नता हुई। उस रणकोविद दैत्य ने उन्हें युद्ध करने के लिए आज्ञा दे दी।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘दैत्यों की मंत्रणा का वर्णन’ नामक अट्‌ठाईसवां अध्याय पूरा हुआ ।



Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य