10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 31 || वृक द्वारा सिंह का और साम्ब द्वारा कुशाम्ब का वध
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 31 || वृक द्वारा सिंह का और साम्ब द्वारा कुशाम्ब का वध
श्रीगर्ग कहते हैं– राजन् ! अपनी सेना की पराजय होती देख गदहे पर चढ़ा हुआ ‘सिंह’ नामक दैत्य रोष से आग बबूला हो उठा और रथ पर बैठे हुए वृक पार बाणों द्वारा प्रहार करने लगा। नरेश्वर ! उन बाणों को अपने ऊपर आया देख युद्धस्थल में श्रीकृष्ण नंदन वृक ने खेल–खेल में ही बाण मारकर उन्हें काट गिराया। सिंह ने फिर बाण मारे और श्रीकृष्ण कुमार ने फिर उन्हें काट डाला ।
राजन् ! फिर तो रणक्षेत्र में असुरराज सिंह के क्रोध की सीमा न रही। उसने धनुष पर आठ बाण रखे। उनमें से चार बाणों द्वारा उस वीर ने वृक के घोड़ों को यमलोक पहुँचा दिया, एक बाण से हंसते हुए उसने वेगपूर्वक उनके रथ की बहुत ही ऊँची और भयंकर ध्वजा काट डाली और एक बाण से सारथि का सिर धड़ से अलग करके पृथ्वी पर गिरा दिया। फिर एक बाण से रोषपूर्वक रणभूमि में उनके प्रत्यंचा सहित धनुष को काट दिया और एक बाण से उस वेगशाली दैत्य ने वृक की छाती में चोट पहुँचाई ।
उसके उस अद्भुत कर्म को देखकर सब वीरों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसी समय वृक ने सहसा उस दैत्य पर शक्ति से आघात किया। वह शक्ति उसके शरीर को छेदकर और गदहे को विदीर्ण करके बाहर निकल गई। राजन् ! जैसे साँप बिल में घुस जाता है, उसी प्रकार वह शक्ति सिंह को घायल करके धरती में समा गई। गदहा तो वहीं मर गया और दैत्य भी तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़ा। परंतु वह दैत्य पुन: उठकर सिंह के समान जोर–जोर से गर्जना करने लगा। उसने वृक के ऊपर एक शिखा रहित शूल लेकर चलाया। अपने ऊपर आते हुए उस शूल को वृक ने समरांगण में अपने हाथों से पकड़ लिया। राजन् ! फिर उसी शूल से अत्यंत कुपित हुए कृष्णकुमार ने शत्रु पर आघात किया। सिंह का शरीर विदीर्ण हो गया। वह हाय–हाय करता हुआ पृथ्वी पर गिरा और मर गया। उसी समय समरांगण में दानवों का महान हाहाकार प्रकट हुआ। देवताओं ने फूलों की वर्षा की और श्रेष्ठ यादव वीर की जय–जयकार करने लगे ।
तब क्रोध से भरे हुए कुशाम्ब ने युद्ध के मैदान में रथ पर आरूढ़ हो शीघ्र आकर साम्ब आदि समस्त यादवों को अपने सायकों द्वारा बींधना आरंभ किया। उसके बाणों से छिन्न–भिन्न होकर बहुत से विशाल गजराज धराशायी हो गए, रथ उलट गए और युद्ध में बहुत से घोड़ों की गर्दनें कट गईं तथा बहुत से पैदल योद्धा बिना सिर और भुजाओं के हो गए। राजन् ! इस प्रकार कुशाम्ब अनेक वीरों को मारता काटता हुआ युद्धभूमि में विचरने लगा। उसका ऐसा पराक्रम देखकर युद्ध कुशल जाम्बतीनंदन साम्ब ने युद्ध के लिए कुशाम्ब को ललकारा ।
साम्ब बोले- वीर ! आओ और सहसा मेरे साथ युद्ध करो। दूसरे करोड़ों दीन मनुष्यों को डराने से क्या लाभ होगा ?
ऐसा कहते हुए साम्ब की ओर देखकर बलवान कुशाम्ब हँसने लगा। उसने साम्ब की छाती में आठ बाण मारे। श्रीहरि के पुत्र साम्ब उसकी इस धृष्टता को सहन न कर सके। उन्होंने अपने कोदण्ड पर सात बाणों का संधान करके उनके द्वारा उस शत्रुभूत दानव की छाती में गहरी चोट पहुँचाई। दोनों ही युद्ध के लिए रोषावेश से भरे थे और दोनों ही अपनी अपनी जीत चाहते थे। संग्राम भूमि में वे दोनों योद्धा स्कन्द तथा तारकासुर के समान शोभा पाते थे। युद्धस्थल में साम्ब ने कुशाम्ब पर और कुशाम्ब ने साम्ब पर आपस में सर्पसदृश बाणों की वर्षा आरंभ की। कुशाम्ब ने अपने धनुष पर सौ चमकीले बाणों का संधान करके उनके द्वारा साम्ब को रथहीन कर दिया और उनके धनुष को भी काट डाला। जब धनुष कट गया और रथ टूट गया तथा घोड़े और सारथि मारे गए, तब साम्ब दूसरे रथ पर आरूढ़ हुए तथा कुपित हो धनुष हाथ में लेकर बोले ।
साम्ब ने कहा– दैत्य ! ऐसा विशाल पराक्रम प्रकट करके अब तुम कहाँ जाओगे ? क्षणभर संग्राम भूमि में ठहर कर मेरा उत्तम पराक्रम देख लो ।
ऐसा कहकर साम्ब ने अपने कोदण्ड पर एक उग्र सायक का संधान किया और उसे दिव्यमंत्र से अभिमंत्रित करके कुशाम्ब के रथ पर छोड़ दिया। उस बाण से आहत हो कुशाम्ब का रथ घोड़े और सारथि सहित अलात चक्र की भाँति भूतल पर चक्कर काटने लगा। चक्कर काटते काटते वह शीघ्र ही एक योजन तक चला गया। रथ सहित दैत्य को घूमते देख जाम्बवती नंदन साम्ब के मुख पर हास्य की छटा छा गई और वे धनुष पर एक बाण रखकर बोले ।
साम्ब ने कहा– असुरेश्वर ! तुम्हारे जैसे महान वीर, जो देवेंद्र के तुल्य पराक्रमी हैं, स्वर्गलोक में रहने के योग्य है। इस धरती पर उनकी शोभा नहीं होती है। अत: मेरे इस दूसरे बाण से रथ सहित तुम संदेह स्वर्ग में चले जाओ। यह तुम्हारे ऊपर मेरी बड़ी कृपा होगी ।
ऐसा कहकर साम्ब ने आकाश में पहुँचाने वाला दिव्यास्त्र छोड़ा। नरेश्वर ! उस बाण से रथ सहित कुशाम्ब चक्कर काटता हुआ धरती से ऊपर को उठा और बहुत से लोकों को लांघकर सूर्यमंडल में जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर घोड़े और सारथि सहित उसका रथ सूर्य की ज्वाला में जल गया तथा उस दैत्य का शरीर भी तत्काल दग्ध होकर पृथ्वी पर आसुरीपुरी में बल्वल के समीप गिर पड़ा। उस पापी दानव के गिरने और मर जाने पर समस्त दैत्य भयभीत हो हाहाकार करने लगे। उस समय यादवों की सेना में बार–बार दुन्दुभियाँ बजने लगीं। देवता साम्ब के रथ पर सानंन्द पुष्पवर्षा करने लगे ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘सिंह और कुशाम्ब का वध’ नामक इकतीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
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