10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 32 || मय को बल्वल का समझाना, बल्वल की युद्ध घोषणा, समस्त दैत्यों का युद्ध के लिए निर्गमन, विलम्ब के कारण सैन्यपाल के पुत्र का वध तथा दु:खी सैन्य पाल को मंत्रीपुत्रों का विवेकपूर्वक धैर्य बंधाना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 32 || मय को बल्वल का समझाना, बल्वल की युद्ध घोषणा, समस्त दैत्यों का युद्ध के लिए निर्गमन, विलम्ब के कारण सैन्यपाल के पुत्र का वध तथा दु:खी सैन्य पाल को मंत्रीपुत्रों का विवेकपूर्वक धैर्य बंधाना

श्रीगर्ग कहते हैं– राजन् ! तदनन्तर सोने के सिंहासन पर बैठे और शोक में डूबे हुए दैत्य बल्वल से मय उसी प्रकार बोला, जैसे कुम्भश्रुति अपने ज्येष्ठ बंधु से बात कर रहा हो ।

नरेश्वर ! आज तुमने यादवों का बल देख लिया। दैत्य समूहों सहित तुम्हारे चार मंत्री मारे गए। अब तुम्हारे नगर में प्रमुख लोगों में से तुम बचे हो और मैं। दैत्यराज ! अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो ।

बल्वल बोला– अब मैं यादवों का शीघ्र विनाश करने के लिए रणभूमि में जाऊँगा। तुम मेरे महल में छिपे रहो। हरि श्रीकृष्ण तो पहले नंद का पुत्र कहा जाता था। अब यह निर्लज्ज वसुदेव उसे अपना पुत्र मानता है। वह गोपियों के घर से माखन, दूध, घी, दही और तक्र आदि चुराया करता था। रासमण्डल में रसिया बन कर नाचता था। अब जरासंध के भय से उसने समुद्र की शरण ली है। जिसने अपने मामा को मारा है, वह क्या पुरुषार्थ करेगा ।

बल्वल की यह बात सुनकर मय को बड़ा क्रोध हुआ। वह बोला ।

मय ने कहा– ओ निंदक ! जिससे ब्रह्मा, शिव, माया (दुर्गा) और इंद्र भी डरते हैं, ऐसे सबको भय देने वाले नित्य निर्भय श्रीकृष्ण की तू निंदा कर रहा है। जो मूर्ख अज्ञानता वश और कुसंग के कारण श्रीकृष्ण की निंदा करता है, वह तब तक कुम्भीपाक में पड़ा रहता है, जब तक ब्रह्माजी की आयु पूरी नहीं हो जाती।¹ जिन्होंने चण्डपाल और शिशुपाल की मण्डली का खण्डन किया है, जो दानवों के दल का दमन करने वाले हैं, उन परमात्मा मदनमोहन माधव का तू अपने कुल की कुशलता के लिए भजन कर ।

मय का यह वचन सुनकर बल्वल परम ज्ञान को प्राप्त हो गया। राजेंद्र ! उसने क्षणभर विचार करते हंसते हुए कहा । 

बल्वल बोला– मैं जानता हूँ कि भगवान श्रीकृष्ण संपूर्ण विश्व के पालक हैं, बलरामजी साक्षात भगवान शेषनाग हैं, प्रद्युम्न कामदेव के अवतार हैं और यहाँ आए हुए अनिरुद्ध साक्षात ब्रह्माजी हैं। इन्हीं के हाथ से हमारा वध होने वाला है, यह सोचकर ही मैंने इस अश्व का अपहरण किया है। उनके बाणों से मारा जायक यदि में मृत्यु को प्राप्त हो जाऊँगा, तो शीघ्र ही सुखपूर्वक भगवान विष्णु के परमपद को चला जाऊँगा। पहले भी बहुत से दानव तथा राक्षस वैर भाव से भगवान का भजन करके वैकुण्ठधाम में जा चुके हैं। अत: मैं भी उसी वैरभाव का आश्रय ले रहा हूँ।

ऐसा कह कवच धारण करके दानव शिरोमणि बल्वल ने तुरंत ही अपने सेनापति को बुलाया और इस प्रकार कहा– सेनापते ! तुम प्रयत्नपूर्वक ढिंढोरा पिटवाकर इस पुरी में मेरा यह आदेश प्रसारित कर दो कि वीरों में से जो लोग भी बच गए हैं, वे अनिरुद्ध के साथ युद्ध के लिए चलें। जो मेरी आज्ञा नहीं मानेंगे, वे बेटे अथवा भाई ही क्यों न हों, युद्ध किए बिना वध के योग्य समझे जाएँगे।

बल्वल का ऐसा आदेश सुनकर सेनापति ने गली–गली और घर–घर में डंका बजाकर बड़े वेग से उसकी आज्ञा घोषित कर दी। ढिंढोरे के साथ की गई इस घोषणा को सुन कर समस्त दैत्य भय से आतुर हो गए और शीघ्र ही सब प्रकार के अस्त्र–शस्त्र लेकर वे बल्वल के सभा भवन में आ गए। तब सबसे पहले सैन्यपाल लाख दैत्यों से घिरकर, कवच और धनुष से सुसज्जित हो, रथ के द्वारा नगर से बाहर निकला। दुर्नेत्र, दुर्मुख, दु:स्वभाव और दुर्मद– ये मंत्रियों के चार पुत्र भी युद्ध के लिए निकले ।

बल्वल के साथ महामत्त गजराज, चपल अंग वाले तुरंग तथा देवविमानों के समान आकार वाले रथ थे। विद्याधरों के समान पैदल योद्धा भी साथ चल रहे थे। इस चतुरंगिणी सेना के साथ तत्काल मय के दिए हुए एवं इच्छानुसार चलने वाले यान पर बैठकर बल्वल स्वयं युद्ध के लिए प्रस्थित हुआ। उसके साथ चार लाख बड़े–बड़े असुर थे। सैन्यपाल का पुत्र भूखा था और घर पर भोजन कर रहा था, इसलिए युद्ध के निमित्त शीघ्र नहीं निकल सका। सोना में उसे नहीं आया देख बल्वल के सैनिकों ने डरते–डरते दैत्यराज से उसके अनुपस्थित होने की बात बताई। तब बल्वल के आदेश से कई वीर गए और उसे रोषपूर्वक रस्सियों से बाँधकर राजा के सामने ले आए। इस सफलता से उनके मुख और नेत्र खिल उठे थे ।

सैन्यपाल के पुत्र को देखकर प्रचण्ड शासक बल्वल ने बहुत फटकारा और वेगपूर्वक उसके मुख पर भुसुण्डी मार दी। सैन्यपाल के पुत्र का वध हुआ देख सब दैत्य भयभीत हो उठे। सैन्यपाल संग्राम में अपने पुत्र को मार दिया गया सुनकर दु:ख से आतुर हो हाथों से माथा पीटता हुआ रथ से गिर पड़ा। वह पुत्र के दु:ख से दु:खी हो अत्यंत विलाप करने लगा– हा पुत्र ! हा वीर ! मुझ वृद्ध पिता को छोड़कर रणक्षेत्र में शतघ्नी के मार्ग से तुम स्वर्ग को चले गए। मेरा दर्शन तक नहीं किया। बेटा ! तुम राजा के शासन से युद्ध किए बिना ही कहाँ चले गए ? इस तरह विलाप करता हुआ सैन्यपाल समरांगण में रो रहा था। तब मंत्रियों के पुत्रों ने शोकमग्न सैन्यपाल के सामने आकर कहा ।

मंत्री पुत्र बोले- सेनापते ! तुम तो शूरवीर हो, रणभूमि में आकर रोदन न करो। शोक करने पर भी जो मर गया, वह तुम्हारे पास लौट कर नहीं आएगा। मृत्यु जीवधारियों के पीछे जन्मकाल से ही लगी रहती है। वही इस समय प्राप्त हुई है। धीर पुरुष मृत्यु के लिए शोक नहीं करते। मूर्ख लोग ही मृत पुरुष के लिए सदा शोक में डूबे रहते हैं। कोई गर्भ में मर जाते हैं, किसी की जन्म लेते ही मृत्यु हो जाती है, कोई बचपन में और कोई जवानी में काल कवलित हो जाते हैं, कोई कोई ही बुढ़ापे में मरते हैं। कोई शस्त्र से, कोई अस्त्र से, कोई दु:ख से और कोई ऊंचे स्थान से गिरने के कारण मृत्यु के वशीभूत होते हैं। दैववश कर्म के अधीन हुए सभी जीव एक दिन मृत्यु को प्राप्त होंगे। कौन किसका पिता और पुत्र है ? अथवा कौन किसकी माता या प्रियतमा पत्नी है। विधाता कर्म के अनुसार प्राणियों में संयोग और वियोग कराया करता है। संयोग में बड़ा आनंद मिलता है और वियोग में प्राण–संकट की घड़ी आ जाती है। ऐसी अवस्था सदा मूर्खों की ही हुआ करती है। आत्माराम पुरुष निश्चय ही हर्ष– शोक के वशीभूत नहीं होते हैं। तुम दु:खी होकर जब अपने प्राणों का त्याग कर रहे हो तो आत्माघाती बनोगे। इसका परिणाम यह होगा कि नरक में पड़ोगे और फिर जन्म लोगे, इसमें संशय नहीं है। इसलिए इस महासमर में तुम श्रेष्ठ यादव वीरों के साथ युद्ध करो। क्षत्रिय वृत्तिवाले लोगों के लिए धर्म युद्ध से बढ़कर परम कल्याण का साधन कोई दूसरा नहीं है। जो समरांगण में धर्म युद्ध करते हुए शत्रु के सामने वीर गति को प्राप्त होते हैं, वे समस्त लोकों को लांघकर भगवान विष्णु के परम धाम में चले जाते हैं ।

श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! उन दैत्यों के इस प्रकार समझाने पर सैन्यपाल ने सब शोक त्याग दिया तथा रोष से भर कर वहाँ आए हुए समस्त वीरों का निरीक्षण किया। संग्राम भूमि में सब पर दृष्टिपात करके रोष से जलते हुए सैन्यपाल ने शीघ्र ही यह बात कही ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘सैन्यपाल के पुत्र का वध’ नामक बत्तीसवां अध्याय पूरा हुआ ।

1. कृष्णं निन्दति यो मूढ़ो ह्याज्ञानाच्च कुसंगत:। कुम्भीपाके स पतति यावद्वै ब्रह्मणो वय: ।।

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