10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 34 || दैत्यों और यादवों का घोर युद्ध, बल्वल, कुनंदन तथा अनिरुद्ध के अद्भुत पराक्रम
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 34 || दैत्यों और यादवों का घोर युद्ध, बल्वल, कुनंदन तथा अनिरुद्ध के अद्भुत पराक्रम
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! तत्पश्चात् बल्वल ने बड़ी प्रसन्नता के साथ पुत्र को रथ पर चढ़ाया और उसके साथ ही अपनी सेना लेकर बड़ी उतावली के साथ वह युद्ध के लिए चला। उसके समस्त सैनिक नाना प्रकार के शस्त्र लिए हुए थे। वे अनेक प्रकार के वाहनों पर बैठे थे तथा भाँति-भाँति के कवचों से सुसज्जित हो नाना प्रकार के रूपों में बड़े भयंकर दिखाई देते थे। वे गजराज के समान हष्ट–पुष्ट शरीर वाले और सिंह के समान पराक्रमी थे। वे पृथ्वी को कंपित करते हुए वृष्णिवंशी यादवों के सम्मुख गए। उन बहुत से दैत्यों को आया हुआ देख अनिरुद्ध शंकित हो गए और उन्होंने समस्त यादवों की रक्षा के लिए चक्रव्यूह की रचना की। चारों और से शूरवीर यादव सब प्रकार के अस्त्र–शस्त्र लिए हाथी, घोड़े और रथों द्वारा खड़े होकर बड़ी शोभा पाने लगे। राजन् ! उनके मध्यभाग में इंद्रनील आदि राजा खड़े हुए। उनके बीच में अक्रूर और कृतवर्मा आदि अच्छे वीर स्थित हुए। राजेंद्र ! उनके बीच में गद आदि श्रीकृष्ण के भाई विराजित हुए। उनके मध्य भाग में साम्ब और दीप्तिमान आदि महान वीर खड़े हुए ।
पृथ्वीनाथ ! इस प्रकार चक्रव्यूह बना कर उसके बीचों बीच प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्ध कवच धारण करके खड़े हुए। नरेश्वर ! वहाँ सागर के तटपर यादवों के साथ दानवों का बड़ा घोर युद्ध हुआ, मानो उनके समुद्रों के साथ बहुत–से दूसरे समुद्र जूझ रहे हों। उस संग्रामस्थल में रथीरथियों के साथ, हाथी–सवार हाथी सवारों के साथ, अश्वारोही अश्वारोहियों के साथ और पैदल वीर पैदल वीरों के साथ परस्पर युद्ध करने लगे।
राजन् ! तीखे बाणों, ढाल तलवारों, गदाओं, ऋषियों, पाशों, फरसों, शतघ्नियों और भुशुण्डियों द्वारा यादव वीर बल्वल के सैनिकों का वध करने लगे। उनकी मार खाकर भयभीत हो सब के सब अपना रणस्थल छोड़कर भाग चले। सैनिकों के पैरों से उड़ी हुई बहुत सी धूल राशि ने आकाश और सूर्य को ढक दिया। सब ओर अंधकार फैल गया और उस अंधेरे में समस्त महादैत्य युद्ध से पीठ दिखाकर पलायन करने लगे। यादवों के सायकों से घायल होकर उन असुरों में से कितने ही कुएँ में गिर गए, कई औंधे मुँह होकर गड्ढे में गिर पड़े और कितने ही पोखरे तथा बावली में डूब गए। अपनी सेना में भगदड़ मची देख बल्वल रोष से भर गया और चारों मंत्री कुमारों तथा अपने पुत्र के साथ यादवों का सामना करने के लिए आया। उस महासमर में बल्वल के साथ अनिरुद्ध, दुर्नेत्र के साथ बृहद्बाहु, दुर्मुख के साथ बलवान अरुण, दु:स्वभाव के साथ न्यग्रोध, दुर्मुद के साथ कवि तथा कुनंदन के साथ श्रीकृष्ण पुत्र सुनंदन युद्ध करने लगे ।
राजेंद्र ! इस प्रकार वहाँ देवताओं को भी विस्यम में डाल देने वाला संग्राम छिड़ गया। कार्तिक मास के संपूर्ण दिन वहाँ युद्ध में व्यतीत हो गए। राजन् ! बारंबार अपना धनुष टंकारते हुए बल्वल ने कुपित हो रणभूमि में इंद्र नील को तीन और हेमांगद को छ: बाण मारे। अनुशाल्व को दस, अक्रूर को दस, गद को बारह, युयुधान को पांच, कृतवर्मा को पाँच, उद्धव को दस और प्रद्युम्न को सौ बाणों द्वारा समरांगण में उस असुर ने घायल कर दिया। उसके बाणों के आघात से रथों सहित वे सभी वीर दो घड़ी तक चक्कर काटते रहे। रणभूमि में उनके घोड़े मर गए तथा रथ चूर–चूर हो गए। मानद नरेश ! उसके हाथ की फुर्ती देखकर अनिरुद्ध आदि समस्त यादव चकित हो गए। फिर वे सब के सब दूसरे रथों पर आरूढ़ हो गए ।
राजन् ! उधर बल्वल भी दूसरे–दूसरे वीरों को देखने के लिए चला। तब क्रोध से लाल आंखें किए अनिरुद्ध ने कहा– ओ दैत्य ! मेरे सामने खड़ा रह, खड़ा रह। पराक्रम दिखा कर तू कहाँ जाएगा ? मेरे तीखे बाणों को भी देख ले। अनिरुद्ध की यह बात सुनकर दैत्य युवराज कुनंदन बल्वल के देखते–देखते शीघ्र ही बोल उठा ।
राजपुत्र ने कहा– प्रद्युम्ननंदन ! रणभूमि में दैत्यराज को देखने की योग्यता तुममें नहीं है। इसलिए पहले इस युद्धस्थल में तुम मेरा बल देख लो ।
अनिरुद्ध बोले– दैत्य कुमार ! तू अभी बालक है। युद्ध करने की योग्यता नहीं रखता है। अत: अपने घर जाकर कृत्रिम खिलौनों से खेल ।
राजकुमार ने कहा– आज तुम यहाँ बड़े-बड़े वीरों के साथ मुझ बालक का खेल देखो। यदि घर जाकर खेलूँगा तो वहाँ कोई नहीं देखेगा ।
ऐसा कहकर कुनंदन ने अपने प्रचण्ड कोदण्ड पर सौ सायक रखे और उनके द्वारा अपना बल दिखाते हुए उसने रथ पर बैठे हुए अनिरुद्ध को घायल कर दिया। उन बाणों के आघात से सारथि, घोड़े तथा रथ के साथ वे स्वयं भी आकाश मार्ग में चक्कर काटते हुए कपिलाश्रम में जा गिरे। अनिरुद्ध के चलने जाने पर तत्काल हाहाकार मच गया ।
तब रणस्थल में कुपित हुए साम्ब आदि यादव उस दैत्य कुमार को मारने के लिए आए। उन बहुसंख्यक योद्धाओं को आया देख युवराज को बड़ा हर्ष हुआ। उस बलवान वीर ने युद्धस्थल में साम्ब को दस, मधु को पांच, बृहदबाहु को तीन, चित्रभानु को पाँच, वृक को दस, अरुण को सात, संग्रामजित को पाँच, सुमित्र को तीन, दीप्तिमान को तीन, भानु को पाँच, वेदबाहु को पाँच, पुष्कर को सात, श्रुतदेव को आठ, सामने खड़े हुए सुनंदन को बीस, विरूप को दस, चित्रबाहु को नौ, न्यग्रोध को दस तथा कवि को नौ तीखें बाणों द्वारा घायल कर दिया। साथ ही उस मानी कुनंदन ने बड़ी प्रसन्नता के साथ विजय सूचक शंख ध्वनि की। उसके बाणों से रथ और घोड़ों सहित चक्कर काटते हुए कोई एक योजन पर गिरे, कोई पाँच कोस पर और कोई दो योजन पर ।
नृपश्रेष्ठ ! उस समय यादव सेना में हाहाकार होने लगा। सब यादव बलराम और श्रीकृष्ण का नाम ले लेकर रोने लगे। उस समय गद आदि सब योद्धा तथा इंद्रनील आदि राजा क्रोध से भरे हुए आए और तीखे बाणों की वर्षा करने लगे। उन सभी वीरों को आया देख महाबली राजकुमार ने सायकों से उन्हें बींध डाला। वे सब के सब रणभूमि में मूर्च्छित हो गए। राजन् ! तत्पश्चात् बल्वल कुमार ने अपने बाण समूहों द्वारा यादव वीरों को मारना आरंभ किया। उसके आघात से बहुसंख्यक योद्धा पंचतत्त्व को प्राप्त हो गए। संग्रामभूमि में उसके बाण समूहों द्वारा रक्त की नदी प्रकट हो गई, जिसमें जीवित हाथी डूबकर मर जाते थे। उस समय यादव सेना तथा आकाश में हाय हाय की आवाज गूंजने लगी। इंद्र और वरुण आदि देवता भी आश्चर्यचकित हो भयभीत हो गए। अपनी विजय देखकर समस्त असुरों के मुख पर प्रसन्नता छा गई ।
श्रीगर्गजी कहते हैं– उधर कपिल मुनि ने देखा कि अनिरुद्ध मूर्च्छित पड़े हैं। इनका रथ नष्ट हो गया है तथा बाणों से इनका वक्ष:स्थल विदीर्ण हो गया है। तब कृपालु मनि ने अपने तपोबल से हाथ द्वारा स्पर्श करके अनिरुद्ध को चैतन्ययुक्त कर दिया। तदनंतर यदुकुल तिलक अनिरुद्ध ने उठकर उन सिद्ध महर्षि को नमस्कार किया और समस्त यादवों को हर्ष प्रदान करते हुए वे सेतु मार्ग से रणक्षेत्र आ गए ।
राजन् ! तत्पश्चात् दूसरे रथ पर आरूढ़ हो बलवान अनिरुद्ध ने प्रतिशांर्ग नामक धनुष उठाया और रोष पूर्वक दैत्य राजकुमार के रथ पर एक बाण मारा। उस बाण ने सारथि और घोड़ों सहित उसके रथ को लेकर आकाश में चार मुहूर्त (आठ घड़ी) तक चक्कर कटाया। उस समय समस्त दानवों और वृष्णिवंशी वीरों ने यह प्रत्यक्ष देखा कि रथ सहित कुनंदन आकाश में चक्कर काट रहा है। उसके बाद साम्ब आदि वीर दूसरे रथ पर आरूढ़ हो वेगपूर्वक आए। साथ ही अनुशाल्व आदि समस्त धनुर्धर भी तत्काल आ पहुँचे ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘दैत्यों और यादवों के युद्ध का वर्णन’ नामक चौंतीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
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