10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 35 || बल्वल के चारों मंत्रीकुमारों का वध, बल्वल द्वारा मायामय युद्ध तथा अनिरुद्ध के द्वारा उसकी पराजय
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 35 || बल्वल के चारों मंत्रीकुमारों का वध, बल्वल द्वारा मायामय युद्ध तथा अनिरुद्ध के द्वारा उसकी पराजय
श्रीगर्गजी कहते हैं– महाराज ! तदनंतर उस संग्राम में अनुशाल्व दुर्मुख से, इंद्रनील दुरात्मा से, हेमांगद दुर्मद से, सारण दु:स्वभाव से युद्ध करने लगे। इस प्रकार रणक्षेत्र में परस्पर द्वंद्वयुद्ध होने लगा। सारण ने बड़े वेग से अपनी गदा द्वारा दैत्य दु:स्वभाव को मार डाला। हेमांगद ने युद्धस्थल में दुर्मुद को तीन बाणों से पीट दिया, दुर्मुद ने भी रणक्षेत्र में हेमांगद को अपने बाणों से घायल किया, फिर हेमांगद ने शक्ति द्वारा उस दैत्य का वध कर डाला।
इंद्रनील ने खेल-खेल में दुर्नेत्र को अपने बाणों से काल के गाल में भेज दिया। अनुशाल्व ने बाण मार कर दुर्मुख के रथ को चौपट कर डाला। फिर दुर्मुख ने भी दूसरे रथ पर आरूढ़ हो बाणों द्वारा अनुशाल्व को रथहीन कर दिया। तब अनुशाल्व ने एक परिघ लेकर युद्धस्थल में दुर्मुख को मार डाला। इस प्रकार दुर्नेत्र, दु:स्वभाव, दुर्मुख और दुर्मुद के मारे जाने पर शेष दैत्य प्राण बचाने के भाग चले ।
राजन् ! इसी समय राजकुमार कुनंदन आकाश से चक्कर काटता हुआ गिरा और मुँह से रक्त वमन करता हुआ रण क्षेत्र में मूर्च्छित हो गया। उसका रथ अंगार की भाँति बिखर गया और घोड़े तत्काल मर गए। पुत्र को मूर्च्छित हुआ देख बल्वल कुपित हो उठा। उसने अनिरुद्ध पर बड़े वेग से धनुष द्वारा दस बाण चलाए। उन दसों बाणों को आया देख रुक्मवती कुमार अनिरुद्ध ने अपने तेज धार वाले स्वर्ण भूषित सायकों द्वारा काट डाला। तब रोष से भरे हुए दैत्य बल्वल ने पुन: धनुष पर बाण का संधान करके अनिरुद्ध से इसी प्रकार कहा, जैसे पहले युद्ध में प्रद्युम्न से शकुनि ने कहा।
बल्वन बोला– युदुकुल के प्रमुख वीर ! तुम युद्ध के अभिमानी और धनुर्धर हो। आज इस बाण से समर भूमि में तुम्हें मार डालूँगा। मैं झूठ नहीं बोलता। यदि जीवित रहने की इच्छा हो तो अपने प्राणों की रक्षा करो। उसकी बात सुन कर अनिरुद्ध ने भी अपने कोदण्ड पर एक बाण रखा। जैसे प्रद्युम्न ने शकुनि को उत्तर दिया था उसी प्रकार बल्वल से हंसते हुए कहा ।
अनिरुद्ध बोले– कौन प्राणी किसके द्वारा मारा जाता है और कौन किससे रक्षित होता है। सदा काल ही सबको मारता है और वही संकट से सबकी रक्षा करता है। मैं करूंगा, मैं करता हूं, संहर्ता हूँ और पालक भी मैं ही हूँ, जो ऐसी बात करता है वह काल से ही विनाश को प्राप्त होता है।¹ मैं तुमको नहीं जीत सकूँगा और तुम भी मुझे नहीं जीत सकोगे। विश्वात्मा कालरूपी जगदीश्वर ही तुमको और मुझको जीतेंगे। दानव ! न जाने वे काल पुरुष किसको जय अथवा पराजय देते हैं। मैं तो अपनी विजय के लिए उन काल देवता की ही मन से वंदना करता हूँ। अत: तुम भी अपने मन से काल को ही बलवानों में श्रेष्ठ समझो और मेरी बात मान कर अपने बड़े भारी अज्ञान को त्याग कर युद्ध करो ।
अनिरुद्ध की यह बात सुनकर बल्वल को आश्चर्य हुआ। उनके वचनों से संतोष प्राप्त करके उनसे कहा, ठीक उसी तरह जैसे वृत्रासुर ने देवराज इंद्र से वार्तालाप किया था ।
बल्वल बोला– यदुकुल तिलक ! इस भूतल पर कर्म ही प्रधान है, कर्म ही गुण और ईश्वर है। कर्म से ही लोगों को ऊँची और नीची स्थिति प्राप्त होती है। जैसे बछड़ा हजारों गायों के बीच में अपनी माता को ढूंढ लेता है उसी प्रकार जिसने शुभ या अशुभ कर्म किया है उसका वह कर्म विद्वान रहकर फल प्रदान के समय उसको खोज लेता है। अत: मैं अपने सुदृढ़ कर्म के द्वारा संग्राम भूमि में तुम पर विजय पाऊँगा। मैंने तो प्रतिज्ञा कर ली अब तुम तुरंत उसका प्रतिकार करो।
अनिरुद्ध ने कहा– दैत्य ! तुम कर्म को प्रधान मानते हो, परंतु काल के बिना उसका कोई फल नहीं मिलता है ! जैसे भोजन बना देने पर भी उसकी प्राप्ति में विघ्न पड़ जाता है, पाक के विभिन्न प्रकार हैं। उसकी सिद्धि के लिए जो पाक का निर्माण किया जाता है वह बिना कर्ता के संभव नहीं होता अत: बहुत से विद्वान कर्म और काल की अपेक्षा कर्ता को ही श्रेष्ठ बताते हैं। वह कर्ता भगवान श्रीकृष्णचंद्र ही हैं। जो गोलोकधाम के स्वामी तथा परात्पर परमेश्वर हैं। उन्होंने ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि समस्त देवताओं की सृष्टि की है।²
बल्वल बोला– श्री कृष्ण पौत्र ! तुम धन्य हो और अपने वचनों द्वारा ऋषियों का अनुकरण करते हो। तुम तीनों गुणों से अतीत हो। तथापि प्राणियों के लिए अपने स्वभाव का परित्याग दुष्कर है। यादवश्रेष्ठ अब सावधान होकर अपने ऊपर प्राप्त होने वाले मेरे इस प्राण संहारी बाणों को देखो और अपना मन युद्ध में ही लगाए रखो ।
ऐसा कहकर बल्वल ने अपने बाण द्वारा मायासुर की माया प्रकट की। उस समय घोर अंधकार छा गया। कोई भी दिखाई नहीं देता था। बहुत से लोगों को यह भी पता नहीं चलता था कि कौन अपना है और कौन पराया। योद्धाओं के ऊपर ऊँचे पर्वतों के समान शिलाएँ गिर रही थीं। बरसती हुई जलधाराओं के कारण चारों ओर से सब लोग व्याकुल हो गए थे। बिजलियाँ चमकतीं और बादल जोर जोर से गर्जना करते थे। वे बादल गर्म-गर्म रक्त की और मलमिश्रित जल की वर्षा करते थे। आकाश से रुण्ड और मुण्ड गिर रहे थे। उस समय समस्त श्रेष्ठ यादव संग्राम में परस्पर व्याकुल और भयातुर हो वहाँ से पलायन करने लगे।
तब अनिरुद्ध ने उस संग्राम भूमि में भगवान श्रीकृष्ण के युगल चरणारविंदों का चिंतन करके लीलापूर्वक मोहनास्त्र द्वारा उस माया को नष्ट कर दिया। उस समय सारी दिशाएँ प्रकाशित हो गईं। सूर्य मंडल का घेरा समाप्त हो गया। बादल जैसे आए थे वैसे ही लीन हो गए। और चपलाएँ शांत हो गई ।
राजन् ! माया दूर हो जाने पर वह प्रचंड पराक्रमी मायावी दैत्य दानवों के साथ सामने दिखाई दिया। उसने नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र ले रखे थे। बल्वल ने कुपित होकर यादवों के वध के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। परंतु अनिरुद्ध ने पुन: ब्रह्मास्त्र चलाकर उस ब्रह्मास्त्र को शांत कर दिया। इससे बल्वल का क्रोध उदित हो उठा। उसने युद्ध में विजय पाने के लिए अत्यंत मोह में डालने वाली 'गान्धर्वी माया' प्रकट की। नृपश्रेष्ठ ! अब वहाँ गंदर्भ नगर दिखाई देने लगा। संग्राम का कोई चिह्न नहीं दिखता था।
करोड़ों सुवर्णमय महल दृष्टिगोचर होने लगे। उस नगर में बहुत सी गंदर्भ सुंदरियाँ वीणा ताल और मृदंग की ध्वनि के साथ नृत्य करती हुईं मधुर कंठ से गीत गाने लगीं। कुंदुक की क्रीड़ाओं, हावभाव और कटाक्षों तथा कटि और वेणी के प्रदर्शनों द्वारा वे कमल नयनी सुंदरियाँ सब लोगों का मनोरंजन करने लगीं। उनका सौंदर्य देख कर यादव वीर कामवेदना से विह्वल हो गए और वे अस्त्र-शस्त्रों को भूमि पर डाल कर आपस में कहने लगे। हम सब लोग कहाँ आ गए। दैवयोग से स्वर्गलोक में तो नहीं पहुँच गए, जहाँ मन को मोह देने वाली सुंदरी कलकंठी सुरांगनाएँ नृत्य करती हैं, इनके लावण्य जलधि में मृग होकर हम कामवेदना से व्याकुल हो गए हैं। हमारी विजय कैसे होगी। यहाँ रणक्षेत्र तो दिखाई ही नहीं देता है।
जब सब लोग इस प्रकार बातें कर रहे थे उसी समय क्रोध से भरा हुआ बल्वल तलवार हाथों में लेकर समस्त यादवों को शीघ्र मार डालने के लिए आया। आकर उसने उस तलवार से सहस्रों मोहित यादव वीरों को युद्धस्थल में मार डाला और वे पृथ्वी पर गिर पड़े। यह देखकर अनिरुद्ध ने रोषपूर्वक उससे कहा। अरे तुम संग्रामभूमि में अधर्म युद्ध करोगे। जिसकी सभी श्रेष्ठ पुरुषों ने निंदा की है। मोहितों को मारने से तुम्हारी प्रशंसा नहीं होगी। यदि तुम्हारे शरीर में शक्ति है तो आओ मेरे साथ युद्ध करो ।
अनिरुद्ध की यह बात सुनकर बल के घमंड से भरा हुआ बल्वल पैदल ही ढाल और तलवार लिए गर्जना करता हुआ अनिरुद्ध पर चढ़ आया। उसे आते देख प्रद्युम्न पुत्र अनिरुद्ध रोषपूर्वक रथ से कूद पड़े। और जैसे देवराज इंद्र अपने वज्र से पर्वत को विदीर्ण करते हैं उसी प्रकार उन्होंने कालदण्ड से उस दैत्य पर प्रहार किया। उस आघात से दैत्य की छाती फट गई और वह पृथ्वी को कंपित करता हुआ गिर पड़ा तथा चार दिनों तक संग्रामभूमि में मूर्च्छित पड़ा रहा। उस समय उस दैत्य के गिरते ही सारी माया स्वत: शांत हो गई। युद्धस्थल दिखाई देने लगा। और वहाँ खड़े हुए यादव आश्चर्य से चकित हो गए ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘अनिरुद्ध की विजय’ नामक पैंतीसवा अध्याय पूरा हुआ ।
1. क: केन हन्यते जन्तुस्तथा क: केन रक्ष्यते। हनिष्यति सदा कालस्तथा रक्षति दु:खत:।। अहं करोमि कर्ताहं हर्तां पालकोऽप्यहम्। यो वदेच्चेदृशं वाक्यं से विनश्यति कालत:।। (अ॰ 35।14–15) 2. स कर्ता कृष्णचंद्रस्तु गोलोकेश: परात्पर:। येन वै निर्मिता: सर्वे ब्रह्मविष्णुशिवादय:।। (अ॰ 35।25)
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