10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 37 || भगवान शिव का अपने गणों के साथ बल्वल की ओर से युद्धस्थल में आना और शिवगणों तथा यादवों का घोर युद्ध, दीप्तिमान का शिवगणों को मार भगाना और अनिरुद्ध का भैरव को जृम्भणास्त्र से मोहित करना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 37 || भगवान शिव का अपने गणों के साथ बल्वल की ओर से युद्धस्थल में आना और शिवगणों तथा यादवों का घोर युद्ध, दीप्तिमान का शिवगणों को मार भगाना और अनिरुद्ध का भैरव को जृम्भणास्त्र से मोहित करना

वज्रनाभ ने पूछा- ब्रह्मन ! कुनंदन के मारे जाने और बल्वल के रणभूमि में मूर्च्छित हो जाने पर करुणामय भगवान शिव ने उसकी सहायता क्यों नहीं की ! भगवान शिव वहाँ आए क्यों नहीं ? दैत्यों ने घोड़े को कैसे छोड़ा ? और यज्ञ किस तरह पूर्ण हुआ ? ये सब बातें विस्तारपूर्वक मुझे बताने की कृपा करें । 

सौति कहते हैं- ब्रह्मन ! वज्रनाभ का यह प्रश्न सुनकर ज्ञानियों में श्रेष्ठ गर्गजी संपूर्ण कथा का स्मरण करके उन यादव शिरोमणि से बोले ।

श्रीगर्गजी ने कहा- राजन् ! जब बल्वल मुर्च्छित हो गया और शूरवीर कुनंदन मारा गया, तब देवर्षि नारद की प्रेरणा से भगवान शिव ने बड़ा कोप किया। नरेश्वर ! भक्तों की रक्षा करने वाले शिव क्रोध पूर्वक नंदी पर आरूढ़ हो, मस्तक पर जटाजूट के भीतर चंद्रलेखा धारण किए, सर्पों के हार और मुण्ड माला से अलंकृत हो, सारे अंग में भस्म रमाए भयंकर रूप से आए। दस बाँह, पाँच मुक और पंद्रह नेत्रों से युक्त रुद्रदेव सिंह का चर्म का वस्त्र धारण किए मद मस्त एवं भय कारक प्रतीत होते थे। उनके हाथों में त्रिशूल, पट्टिश, धनुष, बाण, कुठार, पाश, परिघ और भिन्दिपाल शोभा दे रहे थे। वे सहस्रों सूर्यों के तुल्य तेजस्वी और समस्त भूतगणों से आवृत थे। अनिरुद्ध आदि समस्त श्रेष्ठ वृष्णिवंशी वीरों का युद्धस्थल में वध करने के लिए वे बड़ी उतावली के साथ कैलास से पृथ्वी तल को कंपित करते हुए आए ।
नरेश्वर ! उस समय आकाश और भूतल पर बड़ा हंगामा मचा। देवता, दैत्य और मनुष्य सभी विस्मित और भयभीत हो उठे। समस्त गणों और परिवार के साथ प्रलयंकर शंकर को रोषपूर्वक आया देख यादवों को बड़ा भय हो गया। अनिरुद्ध का मुँह भय के कारण निस्तेज हो गया। समरांगण में वे दु:खी हो गए और उनका हृदय कांपने लगा। उस समय क्रोध से भरे हुए गिरीश ने हाथ में त्रिशूल लेकर समस्त यादवों से यह निष्ठुर बात कही ।

शंकर बोले– कहाँ गए अनिरुद्ध और कहाँ गए सुनन्दन ? मेरे भक्त कुनन्दन का वध करके साम्ब आदि यादव कहाँ चले गए ? मेरे भक्त दैत्य शिरोमणि बल्वल को मूर्च्छित करके और उसके सेवकों को युद्ध में मारकर वृष्णिवंशी जाएँगे कहाँ ? मैं युद्धस्थल में अपने भक्तों के इन सभी शत्रुओं को मार डालूँगा। मैं, विष्णु और ब्रह्मा – ये सभी संकट से भक्तजनों की रक्षा करते हैं ।

श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! ऐसा कहकर रुद्रदेव ने अनिरुद्ध के पास भैरव को भेजा और कहा– शूर तुम समरांगण में विजयी प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्ध से युद्ध करने के लिए जाओ। फिर उन्होंने सुनन्दन से युद्ध करने के लिए वीरभद्र और साम्ब से लड़ने के लिए मयूर वाहन कार्तिकेय को प्रेरित किया। उन विरूपाक्ष शिव ने भानु के साथ युद्ध करने के लिए भृंगी को आदेश दिया और अन्य यादव सैनिकों से जूझने के लिए भूतों और प्रेतों को प्रेषित किया। भगवान रुद्र की आज्ञा पाकर वे भूत, प्रेत, विनायक, भैरव, प्रमथ, वेताल, ब्रह्म राक्षस, उन्माद और कूष्माणड करोड़ों की संख्या में युद्ध में आए।

भूत यादवों को अंगारों से मारने लगे। विनायक पटिटशों से, भैरव शूलों से और प्रमथ खट्वांगो से प्रहार करने लगे। ब्रह्म राक्षस मनुष्यों और घोड़ों को पकड़ कर खा जाते थे। यातुधान समरांगण में मनुष्यों के मुण्ड चबाते और वेताल खप्परों में रक्त ले लेकर पीते थे। पिशाच वहाँ नाचते और प्रेत गीत गाते थे। वे बारंबार योद्धाओं के मस्तकों को गेंद की भाँति इधर उधर फेंकते थे। अट्‌टहास करते हुए चारों ओर दौड़ते और हाथियों तथा रथारोहियों को रणमण्डल में चबाते हुए दिखाई देते थे। पिशाचिनी और डाकिनियाँ युद्ध स्थल में अपने बालकों को रक्त पिलातीं और रोओ मत– ऐसा कहती हुई उनकी आंखें पोंछती थीं। उन्माद और कूष्माण्ड स्वर्गगामी शूरवीरों के मुण्डों की मालाएँ तैयार करके भगवान शंकर को भेंट करते थे ।

नृपेश्वर ! उस समय यादव सेना में हाहाकार मच गया। भय से भागते हुए घोड़े, हाथी और पैदल वीर सहस्रों की संख्या में युद्धक्षेत्र में गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो गए। शिवगणों का ऐसा बल देखकर श्रीकृष्ण कुमार दीप्तिमान अपने धनुष पर अत्यंत अद्भुत बाणों का संधान करके छोड़ना आरंभ किया। राजन् ! वे तीखे बाण कोटि-कोटि भूतों, प्रेतों और विनायकों के शरीर में उसी तरह घुसने लगे, जैसे वन में मोर प्रवेश करते हैं। बाणों से विदीर्ण होकर समस्त भूतगण भागने लगे। कोई युद्धस्थल में गिर गए और कोई मर गए। कितने ही बाणों का आघात लगने से पहले ही धराशायी हो गए ।

प्रेतगणों के पलायन कर जाने पर भैरव क्रोध से भर गए थे। वे कुत्ते पर सवार हो, त्रिशूल हाथ में लिए काल की भाँति आ पहुँचे। नरेश्वर ! उन काल भयंकर भैरव देखकर कोई भी उनके साथ जूझने के लिए तैयार नहीं हुआ। केवल अनिरुद्ध उनके साथ युद्ध करने लगे। अनिरुद्ध ने युद्धस्थल में भैरव को पाँच बाण मारे। भैरव ने भी परिघ के प्रहार से उनके उत्तम रथ को चूर–चूर कर दिया। फिर अनिरुद्ध ने भी दूसरे रथ पर आरूढ़ होकर अपने सुदृढ़ धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर मायावी भैरव को रणभूमि में दस बाणों द्वारा घायल कर दिया। उन बाणों से आहत हो भैरव को कुछ मूर्च्छा सी आ गई। फिर उन्होंने अग्नि के समान प्रज्वलित तीन शिखाओं वाला त्रिशूल अनिरुद्ध पर फेंका। शूल को या देख प्रद्युम्न कुमार ने अपने बाणों द्वारा उसके टुकड़े–टुकड़े कर डाले। अपने त्रिशूल को छिन्न-भिन्न हुआ देख बलवान रुद्रकुमार भैरव ने माया द्वारा अपने मुख से अग्नि की सृष्टि की। उस अग्नि से भूमि, वृक्ष और दसों दिशाएं जलने लगीं। पैदल वीरों, रथारोहियों, घोड़ों तथा हाथियों के शरीर सुंदर फूलवाले सेमर की रुई के समान जलने लगे। कितने ही वीर आग की ज्वाला की लपेट में आ गए और कितने ही आग में भस्म हो गए। सारी सेना अग्नि ज्वाला से व्याप्त हो गई। कितने ही योद्धा भगवान श्रीकृष्ण का चिंतन करने लगे ।

अपनी सेना को भय से व्याकुल देख और भैरव की रची हुई माया को जान कर धनुर्धरों में श्रेष्ठ अनिरुद्ध ने अपने धनुष। पर एक बाण रखा। उस सायक को पर्जन्यास्त्र से अभिमंत्रित कर के श्रीकृष्ण के चरणारविंदों का चिंतन करते हुए शीघ्र ही आकाश में छोड़ दिया ।

राजन ! उस बाण के छूटते ही मेघ प्रकट होकर पानी बरसाने लगे। आग बुझ गई और ऐसा प्रतीत होने लगा, मानों वर्षा काल आ गया हो। मोर, कोयल, चातक, सारस और मेंढ़क आदि बोलने लगे। यत्र तत्र इंद्र गोप (वीरबहुटी नामक कीड़े) शोभा पाने लगे। आकाश इंद्रधनुष और बिजली की चमक से दीप्तिमान हो उठा। अपना प्रयास निष्फल हुआ देख भैरव ने अपने मुख से भैरव गर्जना की। जिससे सबका मन संत्रस्त हो उठा। उस भैरवनाद से समस्त लोकों और पातालों सहित सारा ब्रह्माण्ड गूंज उठा। दिग्गज विचलित हो उठे, तारे टूटने लगे और उनसे भूखण्ड मंडल चमक उठा। उसी समय समस्त मनुष्य बहरे हो गए और गिर गए ।

फिर सर्पों से विभूषित भैरव ने क्रुद्ध हो हाथ से हाथ को दबाते, दांतों से ओठ को चबाते, जीभ लपलपाते और लाल–लाल नेत्रों से देखते हुए यदुकुल तिलक अनिरुद्ध को तिनके के समान समझकर एक तीखा फरसा हाथ में लिया। उसी समय रणनीति में कुशल अनिरुद्ध ने जृम्भणास्त्र का प्रयोग करके भैरव को उसी प्रकार मोहाच्छन्न कर दिया, जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर विजय के अवसर पर भगवान शंकर को मोहित कर दिया था। राजन् ! उस अस्त्र के प्रभाव से अनिरुद्ध के देखते–देखते भैरव रणभूमि में गिर पड़े और जंभाई लेते हुए निद्रासुख का आस्वादन करने लगे ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘भैरव मोहन’ नामक सैंतीसवां अध्याय पूरा हुआ ।

Comments

Popular posts from this blog

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 19 || लीला-सरोवर, हरिमन्दिर, ज्ञानतीर्थ, कृष्‍ण-कुण्‍ड, बलभद्र-सरोवर, दानतीर्थ, गणपति तीर्थ और मायातीर्थ आदि का वर्णन

21.01 *श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन वृत्त*

06. द्वारकाखण्ड || अध्याय 14 || द्वारका क्षेत्र के समुद्र तथा रैवतक पर्वत का माहात्‍म्‍य