10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 38 || नन्दिकेश्वर द्वारा सुनंदन का वध, भगवान शिव के त्रिशूल से आहत हुए अनिरुद्ध की मूर्च्छा, साम्ब द्वारा शिव की भर्त्सना, साम्ब और शिव का युद्ध तथा रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण का शुभागमन
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 38 || नन्दिकेश्वर द्वारा सुनंदन का वध, भगवान शिव के त्रिशूल से आहत हुए अनिरुद्ध की मूर्च्छा, साम्ब द्वारा शिव की भर्त्सना, साम्ब और शिव का युद्ध तथा रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण का शुभागमन
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! भैरव को निद्रित देख मृत्युंजय शिव कुपित हो उठे। उन्होंने वीरमानी अभिमन्यु पर आक्रमण करने के लिए अपने वृषभ नन्दिकेश्वर को प्रेरित किया। वृषभ उसी समय क्रोध से भरकर दोनों सींगों, दाँतों और पिछले पैरों से यादवों पर प्रहार करता हुआ सेना में विचरने लगा। उसने सामने खड़े हुए सुनंदन पर अपने एक सींग से शीघ्र ही आघात किया। उस सींग के आघात से सुनंदन का वक्ष विदीर्ण हो गया और वे पंचतत्त्व को प्राप्त हो गए ।
तब हाथी पर बैठे हुए अनिरुद्ध धनुष लिए, कवच बांध कर मत डरो, मत डरो– ऐसा करते हुए अत्यंत क्रोधपूर्वक वहाँ आए। श्रीकृष्ण पुत्र वीर सुनंदन को वहाँ मारा गया देख अनिरुद्ध को बड़ा दु:ख हुआ। वे शोक में डूब कर कांपने लगे। उस महावीर के मारे जाने पर शोक में पड़े हुए अनिरुद्ध से शिवजी ने कहा– महाबली अनिरुद्ध ! तुम रणक्षेत्र में शोक न करो। युद्ध में भाग जाना शूरवीरों के लिए अकीर्तिकारक माना गया है। इसलिए तुम भी संग्राम स्थल में मेरे साथ यत्नपूर्वक युद्ध करो। मेरे सामने युद्ध की अभिलाषा से आए हुए तुम्हारे भी प्राण जाने वाले ही हैं। तुम उनकी रक्षा करो ।
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! भगवान शिव की यह बात सुनकर यदुकुल तिलक अनिरुद्ध ने शोक त्याग दिया और शिवजी के मस्तक पर पांच बाण मारे। वे पांचों बाण महेश्वर के जटाजूट में उलझ गए और गीध के पंखों से युक्त वनस्पति की शाखा के समान दिखाई देने लगे। तब रुद्रदेव ने अपने कोदण्ड पर एक बाण रखा और उसके द्वारा सहसा अनिरुद्ध के धनुष की प्रत्यंचा काट दी। अनिरुद्ध ने फिर शीघ्र ही अपने सुदृढ़ धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा ली और एक सायक द्वारा शंकरजी के धनुष की प्रत्यंचा को भी खण्डित कर दिया। तब उन दोनों में अद्भुत एवं रोमांच कारी युद्ध का समाचार सुनकर विमान पर बैठे हुए इंद्र आदि देवता कौतुहलवश वहाँ आ गए और आकाश में स्थित हो वह युद्ध देखकर भय से विह्वल हो परस्पर कहने लगे ।
देवता बोले– ये दोनों त्रिभुवन की सृष्टि और संहार करने वाले हैं। इसलिए रणमण्डल में दिन दोनों का युद्ध निष्फल है। कौन इस युद्ध को जीतेगा और किसकी पराजय होगी ? (यह कैसे कहा जा सकता है) ।
श्रीगर्गजी कहते हैं– राजन् ! तदनंतर तीन दिनों तक उन दोनों में बड़ा भारी युद्ध हुआ। फिर रुद्रदेव ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर रोषपूर्वक ब्रह्मास्त्र का संधान किया, जो वहीं तीनों लोकों का प्रलय करने में समर्थ था। परंतु अनिरुद्ध ने ब्रह्मास्त्र से ब्रह्मास्त्र का, वज्रास्त्र से पर्वतास्त्र का और पर्जन्यायस्त्र से आग्नेयास्त्र का निवारण कर दिया। तब पिनाशक धारी शिव अत्यंत क्रोध के कारण प्रज्वलित से हो उठे। उन्होंने तीन शिखाओं वाले त्रिशूल से प्रद्युम्न नंदन अनिरुद्ध पर आघात किया।
वह त्रिशूल अनिरूद्ध को विदीर्ण करके हाथी को भी चीरता हुआ निकल गया और उन दोनों के बीच में ऊपर को पुंख भाग और नीचे को मुख किए स्थित हो गया। हाथी का तत्काल मृत्यु हो गई और युद्धस्थल में अनिरुद्ध भी मूर्च्छित हो गए। वे दोनों रणभूमि में वक्ष:स्थल विदीर्ण हो जाने के कारण एक–दूसरे से लगे हुए ही गिर पड़े। उस समय हाहाकार मच गया। सब यादव रोने लगे। जैसे यमराज के आगे पापी डर जाते हैं, उसी प्रकार रुद्रदेव के आगे सब यादव भयभीत हो गए।
अनिरुद्ध मृतक के समान मूर्च्छित होकर गिर पड़े हैं, यह समाचार सुन कर साम्ब शंकित हो स्कन्ध छोड़कर वहाँ गए। यादववीर को मूर्च्छित हुआ देख साम्ब के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली और वे धनुष हाथ में लेकर क्रोधपूर्वक शिव से बोले– रुद्र ! संग्राम में अनिरुद्ध तथा वीर सुनंदन को मारकर तुम दानवों का पालन कैसे करोगे ? मैंने पहले वेद में और भागवत शास्त्र में ब्राह्मणों के मुँह से सुन रखा था कि शिव वैष्णव हैं और वे सदा श्रीकृष्ण संज्ञक परब्रह्म का भजन सेवन करते हैं। आज प्रद्युम्न कुमार के धराशायी होने पर वह सब कुछ व्यर्थ हो गया। सुनंदन श्रीकृष्ण के पुत्र हैं, किंतु उन्हें भी तुमने युद्ध में मार डाला।
महेश्वर ! शिव ! तुम व्यर्थ युद्ध करते हो। तुम्हें धिक्कार है। तुम श्रीकृष्ण से विमुक हो, अत: मैं रणभूमि में क्षरप्रों तथा सायकों द्वारा तुम्हें शीघ्र ही मार गिराऊंगा। तुम खड़े रहो, खड़े रहो ।
साम्ब की यह बात सुनकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए और इस प्रकार बोले ।
शिव ने कहा– यादव श्रेष्ठ ! तुम धन्य हो ! तुम मुझसे जो कह रहे हो, वह सब सत्य है। देव दानव वंदित ये भगवान श्रीकृष्णचंद्र मेरे स्वामी हैं। किंतु वीर ! जब कुनंदन मारा गया तथा रणक्षेत्र में बल्वल मूर्च्छित हो गया, तब मैं उसकी सहायता के लिए, अथवा यों कहो कि भक्त की रक्षा के लिए यहाँ आ गया। मैं अपने दिए हुए वचन को सत्य करने के लिए आया हूँ और भक्त का प्रिय करने की इच्छा से समरांगण में किंचित कुपित होकर युद्ध करता हूँ । भगवान भूतनाथ शिव जब इस प्रकार कह रहे थे, तभी रोष से भरे हुए साम्ब ने बड़ी शीघ्रता के साथ अपने धनुष से छूटे हुए क्षुरप्रों एवं सायकों द्वारा उन्हें घायल कर दिया। उन बाणों से आहत होने पर भी रुद्र देव को थोड़ी सी वेदना नहीं हुई, जैसे फूलों से मारने पर गजराज को कुछ पता नहीं चलता है। अब शिव ने अपना धनुष उठाया और युद्ध में जाम्बवती कुमार को अनेक तीखे बाण मारे। साम्ब शिव को और शिव साम्ब को परस्पर घायल करने लगे। उन दोनों का युद्ध देख कर देवता ऐसा मानने लगे कि अब समस्त लोकों का संहार होने वाला है। राजन् ! पृथ्वी पर और आकाश में महान कोलाहल मच गया। समस्त वृष्णिवंशी भयभीत हो अपने रक्षक भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करने लगे ।
तब यादवों पर महान विपत्ति आई हुई जान कर श्रीयदुकुल पालक शत्रुसूदन घोड़े और सारथि से युक्त रथ के द्वारा वहाँ आ पहुँचे। उनकी अंग कांति श्याम थी। मस्तक पर किरीट शोभा पा रहा था। नेत्र नूतन नील कमल की शोभा छीन लेते थे। करोड़ों नवीन सूर्य की कांति धारण किए भगवान श्याम सुंदर हाथों में कौमोद की गदा, शंख, चक्र, पद्म, धनुष, बाण और खड्ग लिए हुए थे। श्री वत्सचिह्न, कौस्तुभणि, पीताम्बर तथा वनमाला से अलंकृत श्रीहरि नीली अलकों तथा कुण्डल, कंगण आदि आभूषणों से विभूषित हो, करोड़ों कामदेवों के समान शोभा पा रहे थे। जैसे राजहंस मुख से मुक्ताफल गिरा रहे हों, उसी प्रकार श्वेत फेन कणों को उगलने वाले सुग्रीव आदि अत्यंत वेगशाली तथा सुंदर सामगान करने वाले घोड़ों से उनका रथ जुता हुआ था।[1] जैसे सर्दी से डरे हुए लोग सूर्य का उदय देखकर सुखी हो जाते हैं, उसी प्रकार यादव अपने स्वामी श्रीकृष्ण का शुभागमन देख कर हर्ष से विह्वल हो गए। उस समय यादव सेना में जय–जयकार होने लगा। आकाश में स्थित हुए देवता फूलों की वृष्टि करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण को अपनी सहायता के लिए आया जान साम्ब हर्ष से उत्फुल्ल हो उठे और धनुष त्याग कर उनके चरणों में गिर पड़े ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘अनिरुद्ध आदि की सहायता के लिए श्रीकृष्ण का आगमन’ नामक अड़तीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
1. श्याम: किरीटी नवकञ्जनेत्रो नवार्ककोटिद्युतिमादधान:। कौमोदकी शंखरथांकपद्मकोदण्डबाणैर्नियुतोअसिधारी।।
श्रीवत्सिचह्नेन तु कौस्तुभेन पीताम्बरेणापि च मालयाढ्य:। नीलालकै: कुण्डलकंकणाद्यैर्विभूषित: कोटिमनोजतुल्य:।।
समुद्रलद्भि: सितफेनशीकरान् मुक्ताफलानीव च राजहंसकै:। सुग्रीवमुख्यैरतिवेगवत्तरैर्हयैर्युत: सुंदरसामगायनै)।।
( अध्याय 38। 38 – 40 )
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