10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 39 || भगवान शंकर द्वारा श्रीकृष्ण का स्तवन, शिव और श्रीकृष्ण की एकता, श्रीकृष्ण द्वारा सुनंदन, अनिरुद्ध एवं अन्य सब यादवों को जीवनदान देना तथा बल्वल द्वारा यज्ञ संबंधी अश्व का लौटाया जाना
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 39 || भगवान शंकर द्वारा श्रीकृष्ण का स्तवन, शिव और श्रीकृष्ण की एकता, श्रीकृष्ण द्वारा सुनंदन, अनिरुद्ध एवं अन्य सब यादवों को जीवनदान देना तथा बल्वल द्वारा यज्ञ संबंधी अश्व का लौटाया जाना
श्रीगर्गजी कहते हैं– भगवान श्रीकृष्ण को वहाँ उपस्थित देख महादेवजी भयभीत एवं शंकितचित्त हो गए और धनुष तथा त्रिशूल आदि त्याग कर उन श्रीपति से भक्तिपूर्वक बोले ।
शंकर ने कहा– सच्चिदानंदस्वरूप सर्वत्र व्यापक विष्णुदेव ! मेरे अविनय को दूर कीजिए। मन को दबाइये और विषयों की मृग तृष्णा शांत कीजिए। प्राणियों के प्रति मेरे हृदय में दया का विस्तार कीजिए और मुझे संकार सागर से उबारिए। देवनदी गंगा जिनकी मकरंदराशि है, जिनका मनोहर सौरभ समूह सच्चिदानंदमय है तथा जो भवबंधन के भय एवं खेद का छेदन करने वाले हैं, श्रीपति के उन चरणारविंदों की मैं वंदना करता हूँ। प्रभो ! परमार्थ दृष्टि से आप में और मुझमें कोई भेद न होने पर भी मैं ही आपका हूं, आप मेरे नहीं हैं, क्योंकि समुद्र की ही तरंगें हुआ करती हैं, तरंगों का समुद्र कहीं नहीं होता। हो गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले ! हे पर्वत भेदी इंद्र के अनुज ! हे दानव कुल के शत्रु ! तथा हे सूर्य और चंद्रमा को नेत्रों के रूप में धारण करने वाले परमेश्वर ! आप प्रभु का दर्शन हो जाने पर क्या इस संसार का तिरस्कार नहीं हो जाता है ? परमेश्वर मैं भवताप से भीत हूँ और आप मत्स्य आदि अवतारों द्वारा अवतारी होकर वसुधा का पालन करते हैं, अत: मेरा भी पालन कीजिए। दामोदर ! गुणों के मंदिर ! सुंदर वदनारविंद ! गोविंद ! भवसागर को मथ डालने के लिए मंदराचल रूप श्रीकृष्ण ! आप मेरे बड़े भारी भय को भगाइये। नारायण ! करुणामय ! मैं आपके युगलचरणों की शरण लूं। यह छ: पदों वाली स्तुतिरूपिणी षट्पदी (भ्रमरी) मेरे मुखरूपी कमल में सदा निवास करे ।[1]
भगवान शंकर के इस प्रकार स्तुति करने पर बलराम के छोटे भाई श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर अपने चरणों में झुके हुए चंद्रशेखर शिव से सारा अभिप्राय पूछा ।
श्रीकृष्ण बोले- शिव ! मेरे कुबुद्धि पुत्र ने तुम्हारा क्या अपराध किया था, जिससे तुमने युद्ध में उसे मार डाला और अनिरुद्ध को मूर्च्छित कर दिया ? किसलिए यदुकुल का विनाश किया ? तुम युद्धस्थल में आए ही क्यों ? और आये भी तो युद्ध क्यों करने लगे ? यह सब बात विस्तारपूर्वक मुझे बताओ ।
शंकर ने कहा– देवदेव ! जगन्नाथ ! राधिका वल्लभ ! जगन्मय ! करुणाकर ! मैं निर्लज्ज हूं, अपराधी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। देव ! क्या आप नहीं जानते, मैं आपके सामने क्या कहूंगा ? प्रभो ! आपकी माया से मोहित होकर मैं भक्त की रक्षा करने के लिए यहाँ आया था, आप मेरे इस सारे अपराध को क्षमा कर दीजिए। हरे ! मैं ही संपूर्ण जगत का शासक हूं, इस अभिमान से मैंने युद्धस्थल में, जिनके श्रीकृष्ण ही देवता हैं, उन शूरवीर वृष्णिवंशियों को मारा है। श्रीकृष्ण ! यही कारण है कि संत पुरुष परमवाञ्छित महान ऐश्वर्य को स्वयं छोड़कर आपके निर्भय चरणकमल का सदा चिंतन करते हैं। मनुष्यों को सुख और दु:ख तभी तक प्राप्त होते हैं, जब तक उनका मन श्रीकृष्ण में नहीं लगता है। श्रीकृष्ण में मन लग जाने पर वह दुर्जय भक्तियोग रूपी खड्ग प्राप्त होता है, जो मनुष्यों के कर्मरूपी वृक्षों का मूलोच्छेद कर डालता है। जो लोग मेरी भक्ति के बल से घमंड में आकर आप मेरे स्वामी यदुकुल तिलक का अपमान करते हैं, वे सब निश्चय ही नरक में जाएंगे ।[2]
ऐसा कहकर भगवान शंकर चुप हो नेत्रों में आंसू भरकर भक्तिभाव से श्रीकृष्ण के युगल चरणारविंदों में दण्ड की भाँति प्रणत हो गए। भगवान श्रीकृष्ण ने रुद्रदेव को उठाकर अपने पास खड़ा किया और उन्हें आश्वासन देकर, मिलकर उनकी ओर सुधा भरी दृष्टि से देखा ।
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण बोले– शिव ! सभी देवता अपने भक्त का पालन करते हैं। तुमने भी यदि भक्त का पालन किया तो इसमें कौन सा निंदित कर्म कर डाला ? तुम मेरे हृदय में हो और मैं तुम्हारे हृदय में। हम दोनों में कोई अंतर नहीं है। खोटी बुद्धि वाले मूढ़ पुरुष ही हम दोनों में अंतर या भेद देखते हैं। सदाशिव ! मेरे भक्त तुमको नमस्कार करते हैं और तुम्हारे भक्त मुझको। जो मेरी इस बात को नहीं मानते हैं, वे नरक में पड़ेंगे ।[3]
ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने युद्धस्थल में मारे गए अपने पुत्र सुनंदन को अमृतवर्षिणी दृष्टि से देख कर जीवित कर दिया। तत्पश्चात् अनिरुद्ध के हृदय से शूल को धीरे–धीरे खींचा और उन्हें भी जीवनदान दिया।
इसके बाद सर्व समर्थ परमेश्वर श्रीकृष्ण ने युद्ध स्थल में मारे गए समस्त यादवों को सुधावर्षिणी दृष्टि से देखकर जीवित कर दिया। इतने में ही दुन्दुभि नाद के साथ देवता उत्साह सूचक पुष्प वर्षा करने लगे। ऐसा करके उन्होंने भगवान गरुड़ध्वज को प्रसन्न किया। संपूर्ण त्रिलोकी के नेता भगवान श्रीकृष्ण को आया देख वे श्रेष्ठ यादव वेगपूर्वक उठकर खड़े हो गए और प्रसन्नता के साथ जय–जयकार करने लगे ।
श्रीकृष्ण का यह कथन सुनकर प्रमथनाथ शिव लज्जित हो गए और कुछ सोच–विचार कर उन मदुसूदन से बोले ।
तदनंतर महादेवजी से सुरक्षित हो बल्वल उठा और रोषपूर्वक कहने लगा– अनिरुद्ध कहाँ गया ? तब शंकरजी ने अपने शुभ वचनों द्वारा उस दैत्य को समझाया और श्रीकृष्ण की महिमा को जान कर वह महामनस्वी दैत्य आनंदित हो गया। राजन् ! तदनंतर गोविंद को प्रणाम और उनकी स्तुति करके दैत्य बल्वल ने बहुतु सी द्रव्यराशि के साथ घोड़ा लौटा दिया ।
इसके बाद यज्ञ के घोड़े को साथ लेकर भगवान श्रीकृष्ण पुत्र–पौत्रों के साथ सेतु मार्ग से समुद्र के तट पर आए। वहाँ से पश्चिम दिशा की ओर चले। भगवान श्रीकृष्ण के चले जाने पर रुद्रदेव बल्वल को उसके राज्य पर स्थापित करके अपने गणों और भैरव के साथ कैलास को चले गए। जो लोग भगवान श्रीकृष्ण के इस चरित्र को अपने घर पर सुनते हैं, भगवान श्रीकृष्ण उनकी सदा सहायता करेंगे ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में अनिरुद्ध विजय वर्णन नामक उन्तालीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
1. ओम अविनयमपनय विष्णो दमय मन: शमय विष्यमृगतृष्णाम्। भूतदयां विस्तारय तारय संसारसागरत:।।
दव्यधुनीमकरन्दे परिमलपरिभोगसच्चिदानंदे। श्रीपतिपदारविंदे भवभयखेदच्छिदे वन्दे।।
सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरंग क्वचन समुद्रो न तारंग।।
उद्धतनग नगभिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे। दुष्टे भवति प्रभवति न भवति किं भवतिरस्कार:।।
मत्स्यादिभिरवतारैरवतारवतावता सदा वसुधाम्। परमेश्वर परिपालयो भवता भवतापभीतोअहम्।।
दामोदर गुणमंदर सुंदरवदनारविंद गोविंद। भवजलधिमथनमंदर परं दरमपन्य त्वं मे।।
नारायण करुणामय शरणं करवाणि तावकौ चरणौ। इति षट्पदी मदीये वदनसरोजे सदा वसतु।।
(अ ॰ 39 / 2 - 8 )
2. देव देव जगन्नाथ राधिकेश जगन्मय। पाहि पाहि कृपाकारिन्निस्त्रपं मां कृतागसम्।।
त्वं न जानासि किं देव कथयिष्यामि किं त्वहम्। भक्तस्य पालनं कर्तुं मायया तव मोहित:।।
अहमागतावान् देव त्वं सर्वं क्षन्तमर्हसि। शास्ताहं सर्वलोकस्य मानादिति मया हरे।।
मारिता: संगरे शूरा वृष्णय: कृष्णदेवता:। तस्मात् संत: स्वयं त्यक्तवा परमैश्वर्यमीप्सतम्।।
ध्यायन्ते सततं कृष्ण पादाब्जं ते निरापदम्। सुखं दुखं नृणां तावद् यावत्कृष्णे न मानसम्।।
कृष्णे मनसि संजातो भक्तिखड्गो दुरत्यय:। नराणां कर्मवृक्षाणां मूलच्छेदं करोति य:।।
मद्भक्तिबलदर्पिष्ठ मत्प्रभुं त्वां यदूत्तमम्। न मन्यन्ते च ते सर्वे यास्यन्ति निरयं ध्रुवम्।।
( अ॰ 39। 13 – 19 )
3. ममासि हृदये त्वं तु भवतो हृदये ह्यहम्। आवयोरन्तरं नास्ति मूढ़ा: पश्यन्तिं दुर्धिय:।।
त्वां नमन्ति च मद्भक्तास्त्वद्भक्ता मां सदाशिव। ये न मन्यन्ति मद्वाक्यं यास्यन्ति नरकं च ते।।
( अ॰ 39। 23 – 24 )
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