10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 40 || यज्ञ संबंधी अश्व का ब्रजमंडल में वृंदावन के भीतर प्रवेश, श्रीदामा का उसे बांधकर नंदजी के पास ले जाना, नंदजी का समस्त यादवों और श्रीकृष्ण से सानंद मिलना, यादव सेना का वृंदावन में और श्रीकृष्ण का नंदपत्तन में निवास

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 40 || यज्ञ संबंधी अश्व का ब्रजमंडल में वृंदावन के भीतर प्रवेश, श्रीदामा का उसे बांधकर नंदजी के पास ले जाना, नंदजी का समस्त यादवों और श्रीकृष्ण से सानंद मिलना, यादव सेना का वृंदावन में और श्रीकृष्ण का नंदपत्तन में निवास

श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! श्रीकृष्ण के द्वारा मुक्त हुआ पत्र और चामरों से विभूषित वह अश्व संपूर्ण देशों का नेत्रों से अवलोकन करता हुआ आगे बढ़ा। नरेश्वर बल्वल को पराजित हुआ सुनकर अनेक देशों के नरेश भगवान श्रीकृष्ण के भय से अपने यहाँ आए हुए अश्व को पकड़ न सके। राजेंद्र ! इस प्रकार आगे–आगे जाता हुआ यदुवीर उग्रसेन का अश्व एक महीने में भारतवर्ष के अंतर्गत ब्रजमंडल में जा पहुँचा। राजन् ! वहाँ से यमुना को पार कर वृंदावन का दर्शन करते हुए वह श्रेष्ठ अश्व एक तमाल वृक्ष के नीचे खड़ा हो गया। वहाँ दूब चरते हुए घोड़े को देखकर बहुत से ग्वाल बाल गौएं चराना छोड़कर कौतुहल वश उसके पास आ गए और ताली पीटने लगे। राजन् ! इस प्रकार जब सब ग्वाल बाल घोड़े को देख रहे थे, उसी समय गोप नायक श्रीदामा वहाँ आए और उन्होंने वहाँ विचरते हुए उस चंचल अश्व को अनायास ही पकड़ लिया।

गाय बांधने वाली रस्सी को घोड़े के गले में बांध कर वे अन्य गोपों के साथ किसने इसको छोड़ा है– यह बातचीत करते हुए नंदराय के निकट गए। उस घोड़े को आया देख नंदरायजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उसके भाल में बंधे हुए पत्र को बांचकर गद्गद वाणी में सब लोगों से कहा– यह उग्रसेन का घोड़ा है, जो मेरे गांव में आ गया है। मेरे प्रपौत्र अनिरुद्ध सब ओर से इसका पालन करते हैं। मैं मित्रों से मिलने के लिए इस यज्ञ संबंधी अश्व को ग्रहण करता हूँ। इसके बाद श्रीकृष्ण की सी आकृति वाले प्रियकारी प्रपौत्र अनिरुद्ध को देखूंगा। ऐसा कहकर और यशोदा के सामने सारा अभिप्राय बताकर नंदराय जी अनिरुद्ध को देखने के लिए अन्याय गोपों के साथ नंदगांव से बाहर निकले ।

नृपेश्वर ! उस समय भोज, वृष्णि तथा अंधक आदि समस्त कुलों के यादव घोड़े के पीछे लगे वहाँ आ पहुँचे। नृपेंद्र ! गंगासागर से लौटते समय मार्ग में नेपाल तीर्थ, मिथिला, अयोध्या, बर्हिष्मती, कान्य कुब्ज (कन्नौज), बल भद्र जी के स्थान (दाऊजी), गोकुल (महावन), सूर्य कन्या यमुना तथा जहाँ भगवान केशव देव विराजते हैं, उस मथुरापुरी का भी दर्शन करते हुए श्रीकृष्ण सहित सब लोग वृंदावन होते हुए नंद गांव में आए।

नंदग्राम को दूर से देखकर रथारूढ़ नंदनंदन श्रीकृष्ण सबसे आगे होकर यादवों के साथ वहाँ आए। निकट पहुँच कर श्रीहरि ने देखा– पिता नंदराय जी एक सुसज्जित गजराज को आगे रख कर गोपों के साथ खड़े हैं। नृपेश्वर ! तरह–तरह के बाजे बजवाते, शंखनाद कराते, जय–जयकार की ध्वनि फैलाते नंदरायजी फूलों के हार, मंगल कलश तथा बाजा आदि से विभूषित थे। राजन् ! उस समय नंदजी का दर्शन करके उद्धव आदि समस्त यादवों ने उनको नमस्कार किया। सबके नेत्रों में हर्ष के आंसू छलक आए थे ।

उसी समय नंदराय का दाहिना अंग फड़क उठा। नरेश्वर ! वह उत्तम शकुन देखकर वे मन ही मन कहने लगे– क्या मैं आज अपने नेत्रों से प्रियवादी श्रीकृष्ण को देखूंगा। क्योंकि प्रिय की सूचना देने वाला मेरा दाहिना नेत्र फड़क रहा है। यदि श्रीकृष्ण मेरे नेत्रों के समक्ष आ जाएँ तो आज मैं ब्राह्मणों को वस्त्राभूषणों से अलंकृत एक लाख गौएं दान दूंगा ।

नपेश्वर ! ऐसा संकल्प करके जब नंदजी चुप हुए, तभी ब्रजवासियों के मुख से उन्होंने अपने पुत्र के शुभागमन का समाचार सुना। श्रीकृष्ण का आगमन सुनकर विरह में डूबे हुए नंदराय उन श्रीहरि को देखने के लिए रोते हुए सबसे आगे चलने लगे। वे गद्गदवाणी से बार बार कह रहे थे– हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे कृष्णचंद्र ! तुम कहाँ चले गए थे ? क्या मुझ दुखिया को नहीं देखते हो ।

पिता को देखकर पितृवत्सल श्रीकृष्ण रथ से कूदकर तत्काल उनके चरणों में गिर पड़े। श्रीनंदराय ने सुदीर्घकाल के बाद आए हुए अपने पुत्र को उठाया और उन्हें छाती से लगाकर वे नेत्रों के जल से नहलाने लगे। श्रीकृष्णचंद्र भी करुणा से आकुल हो नेत्रों से अश्रुधारा बहाने लगे। तत्पश्चात् प्रेम में डूबे हुए श्री दामा आदि मित्रों को देखकर प्रेम परिलुप्त श्रीकृष्ण ने उन सबको बारी–बारी से अपने हृदय से लगाया। अहो ! इस भूतल पर कौन ऐसा मनुष्य है, जो भक्तों के माहात्मय का वर्णन कर सके ? एक ओर से नंद आदि गोप रो रहे थे और दूसरी ओर से श्रीकृष्ण यादव आदि। सब लोग विरह से व्याकुल होने के कारण परस्पर कुछ बोल नहीं पाते थे। श्रीकृष्ण के मुख पर आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उन्होंने गद्गदवाणी से प्रेमानंद में डूबे हुए समस्त गोपों को आश्वासन दिया। उन सबने साक्षात परिपूर्णतम जगदीश्वर श्रीकृष्ण को वैसा ही देखा, जैसा वे मथुरा जाते समय दिखाई दिए थे ।

नूतन जलधर के समान उसकी श्याम कांति थी। वे किशोर अवस्था के बालक से प्रतीत होते थे। उनके नेत्र शरत्काल के प्रभात में खिले हुए कमलों की कांति को छीन लेते थे। उनका मुख अपनी छवि से शरत्पूर्णिमा के शोभा संपन्न पूर्ण चंद्रमंडल का छबि को आच्छादित किए लेता था। करोड़ों कामदेवों का लावण्य उनके लावण्य में विलीन हो गया था। लीला–जनित आनंद से वे और भी सुंदर प्रतीत होते थे। अधरों पर मुस्कराहट और हाथों में मुरली लिए द्विभुज श्रीकृष्ण अत्यंत मनोहर दिखाई देते थे। विद्युत की सी पीतकान्ति से सुशोभित वस्त्र तथा मीना कार कुण्डल धारण किए भगवान श्रीहरि सारा अंग चंदन से अनुलिप्त तथा कौस्तुभमणि से दीप्तिमान था। घुटनों तक लटकती हुई मालती सुमनों की माला और वनमाला से वे विभूषित थे। मस्तक पर मोरपंख का मुकुट तथा उत्तम रत्नों का बना हुआ किरीट जगमगा रहा था। ओठ परिपक्व बिम्बाफल से भी अधिक लाल थे तथा ऊँची नासिका से उनका मुखमंडल अद्भुत शोभा पा रहा था।

राजेंद्र ! श्रीकृष्ण के ऐसे रूपामृत का, आनंद में डूबे हुए व्रजवासी नेत्रों से पान कर रहे थे, मानो साधारण मानव वसुधा पर सुलभ हुई सुधा का पान कर रहे हों ।[1]

राजन् ! तत्पश्चात् प्रेमरस में डूबे हुए नंदरायजी प्रसन्नता के साथ अनिरुद्ध को और साम्ब आदि समस्त यादवों को शुभाशीर्वाद दिया। इसके बाद समस्त यादवों और पुत्र–पौत्रों से घिरे हुए महाबुद्धिमान नंदजी अपनी पुरी में प्रविष्ट हुए। उस समय उनके मन का संपूर्ण दु:ख दूर हो गया था। द्वार पर पहुँचते ही श्रीकृष्ण रथ से कूद पड़े और साम्ब आदि के साथ माता को आनंद प्रदान करने के साथ माता को आनंद प्रदान करते हुए तुरंत उनके भवन में जा पहुँचे। माता यशोदा घर के द्वार तक आ गई थीं। वे रो रही थीं और उनका गला रुंध गया था। उस दशा में उन्हें देख कर श्रीकृष्ण फूट–फूट कर रोते हुए माता के चरणों में पड़ गए। माता यशोदा ने अपने प्राणों से भी प्यारे पुत्र को छाती से लगाकर उन्हें गद्गदकण्ठ से आशीर्वाद दिया। नंद, उपनंद, छहों वृषभानु तथा वृषभानुवर– ये सब लोग श्रीकृष्ण को देखने के लिए आए। यादवों सहित श्रीकृष्ण ने वहाँ पधारे हुए गोपों से विधिपूर्वक मिलकर उन सबका समादर किया। उन सबने प्रसन्न मुख होकर श्रीकृष्ण की कुशल पूछी और भगवान श्रीकृष्ण ने भी उन सबका उत्तम कुशल समाचार पूछा ।

नपेश्वर ! तत्पश्चात् वृंदावन में यमुना के तटपर महात्मा अनिरुद्ध की सेना के सारे शिविर लग गए। अनिरुद्ध, साम्ब और उद्धव आदि ने तो शिविरों में ही निवास किया, किंतु भगवान श्रीकृष्ण नंदनगर में ही ठहरे। राजन् ! श्रीकृष्ण सहित नंदरायजी ने वहाँ पधारे हुए समस्त यादव सैनिकों को भोजन दिया और पशुओं के लिए भी चारे–दाने आदि का प्रबंध कर दिया ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘व्रजमंडल में प्रवेश’ नामक चालीसवां अध्याय पूरा हुआ ।

1. नवीननीरदश्यां कशोरवयसं शिशुम्। शरत्प्रभातकमलकान्तिमोचनलोचनम्।।
शरत्पूर्णेन्दुशोभाढ्यं शोभास्वाच्छादनाननम्। कोटिमन्थलावण्यं लीलानन्दितसुन्दरम्।।
सस्मितं मुरलीहस्तं द्विभुजं ह्यतिसुंदरम्। तड़िद्वस्त्रधरं देवं मत्स्य कुण्डलिनं हरिम्।।
चन्दनोक्षितसर्वांग कौस्तुभेन विराजितम्। आजानुमालतीमालावनमालाविभुषितम्।।
मयूरपिच्छचूडं च सद् रत्नमुकुटोज्ज्वलम्। पक्वबिम्बाधिकोष्ठं च नासिकोन्नतशोभनम्।।
एवं कृष्णस्य राजेंद्र रूपं नेत्रैर्व्रजौकस:। पपुरानंदसमग्रा: पीयूषं मानवा इव।।
( अ॰ 40। 32 – 37 )


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