10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 42 || रासक्रीड़ा के प्रसंग में श्रीवृंदावन, यमुना–पुलिन, वंशीवट, निकुंज भवन आदि की शोभा का वर्णन, गोप सुन्दरियों, श्यामसुंदर तथा श्रीराधा की छबि का चिंतन
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 42 || रासक्रीड़ा के प्रसंग में श्रीवृंदावन, यमुना–पुलिन, वंशीवट, निकुंज भवन आदि की शोभा का वर्णन, गोप सुन्दरियों, श्यामसुंदर तथा श्रीराधा की छबि का चिंतन
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! हेमंत ऋतु के प्रथम मास में पूर्णिमा की रात को राधिकावल्लभ श्याम सुंदर ने वृंदावन में पहले की ही भाँति सबको वश में कर लेने वाली बंशी बजायी। वह बंशी ध्वनि सबके मन को आकृष्ट करती हुई सब ओर फैल गई। उसे सुनकर गोप सुंदरियाँ प्रेमवेदना से पीड़ित एवं त्रस्त हो गईं। मेघों की गति को रोकती, तुम्बुरू को बार–बार आश्चर्य में डालती, सनक–सनंदन आदि के ध्यान में बाधा पहुँचाती, ब्रह्माजी को विस्मित करती, उत्कण्ठावलियों से राजा बलि को भी चपल बनाती, नागराज शेष में चंचलता लाती तथा ब्रह्माण्ड कटाह की भित्तियों का भेदन करती हुई वह वंशीध्वनि सब ओर फैल गई ।[1]
राजेंद्र ! इतने में ही चराचर प्राणियों के सूर्य किरण जनित संताप का मार्जन करते हुए चंद्रमा का उदय हुआ, जैसे परदेश से आया हुआ प्रियतम अपनी प्रिया के विरह शोक को दूर कर देता है। दूसरों को मान देने वाले नरेश ! उसी समय यमुना ने दिव्य व्रजभूमि का स्वरूप भी दिव्य हो गया। श्यामवर्णा यमुना नदी का उत्कर्ष बहुत बढ़ गया। वहाँ मणियों में श्रेष्ठ रत्न, मोती, माणिक्य, शुभ्ररत्न (हीरा), हरित रत्न (पन्ना) आदि से निर्मित कर तोलिकाओं से, जो वैदूर्य, नीलम, हरिन्मणि, इंद्रनील, वज्रमणि और पीत मणियों से निर्मित सोपानों एवं रत्न मंडपों से युक्त थी, यमुना जी की अतिशय शोभा हो रही थी। यमुना नदी वहाँ श्रीकृष्ण सदन में लौटती हुई सब नदियों से उत्कृष्ट शोभा पा रही थीं। स्वच्छंद उछलते हुए मत्स्यगणों के साथ बहती तथा सुंदर श्याम अंग से पापराशि का हरण करती हुई वे अपनी ऊंची–ऊंची चंचल लहरों तथा प्रफुल्ल कमलों से सुशोभित थीं ।
उस गोवर्धन गिरी का भजन–सेवन करो। जो शत–शत चंद्रमाओं के प्रकाश से युक्त, मंदार और चंदन लताओं से वेष्टित कल्पवृक्ष जहाँ अद्भुत शोभा पाते हैं, जहाँ रासमण्डल तथा मणिमय मण्डप विद्यमान हैं तथा जिसके शिखर पर करोड़ों मंजुल निकुंज कुटीर दीप्तिमान हैं। यमुना के तट प्रदेश, नीर राशि तथा तीर के संपर्क में आकर मंदगति से प्रवाहित होने वाली अत्यंत सगंधित वायु से कंपित वृंदावन का सारा भाग सुवासित है तथा श्रीखण्ड, कुंकुमयुक्त मृत्तिका एवं अगुरु से चर्चित होकर वह वन परम कल्याण मय जान पड़ता है। बसंत ऋतु में सुलभ नूतन पल्लवों और फूलों के रंगों से सेवित वृंदावन मंदार, चंदन, चंपा, कदंब, निरंब, अमड़ा, आम कटहल, अगुरु, नारंगी, श्रीफल, ताड़, पीपल, बरगद और नवल नारियल से सुशोभित है। खजूर, श्रीफल (बेल) और लवंगताएं उस वन की शोभा बढ़ाती थीं। अंजीर, साल, तमाल, कदंब, संतान (कल्पवृक्ष), कुंद, बेर, केला और मोतियों से वह संपन्न था। सेमल, मौलसिरी, केतकी और शिरीष आदि वृक्ष उसके वैभव थे ।
नृपेंद्र ! सत्पुरुषों के मन को मोद प्रदान करने वाली लता–बल्लरी और कमलों के समूह से जिसकी आभा मनोहारिणी प्रतीत होती है, वह तुलसी–लता से संपन्न श्रेष्ठ वृंदावन श्रीमल्लिका, अमृतलता और मधुमयी माधवी–लताओं से सुशोभित है। व्रजमण्डल के मध्यभाग में तुम ऐसे वृंदावन का चिंतन करो। यमुना के तट पर मधुर कण्ठ वाले विहंगमों से युक्त वंशीवट शोभा पाता है। उसका पुलिन बालुकाओं से संपन्न है। श्रीपाटल, महुआ, पलाश, प्रियाल, गूलर, सुपारी, दाख और कपित्थ (कैथ) आदि वृक्ष यमुना तट की शोभा बढ़ाते हैं।
कोविदार (कचनार), पिचुमन्द (नीम), लता जाल, अर्जुन (सरल), देवदारू, जामुन, सुंदुर बेंत, नरकुल, कुब्जक, स्वर्णयूथी, पुन्नाग, नागकेसर, कुटज और कुरबक से भी वह आवृत है। चक्रवाक, सारस, तोते, श्वेत राजहंस, कारण्डव और जल कुक्कुट यमुना तट पर सदा कल कूजन किया करते हैं। दात्यूह (पपीहा), कोयल, कबूतर, नीलकण्ठ और नाचते हुए मोरों के कलरव से मुखरित यमुना पुलिन का तुम सदा स्मरण करो ।
श्यामा, चकोर, खञ्जरीट, सारिका (मैना), पारावत (परेवा), भ्रमर, तीतर, तीरती, कनकलता, मधुलता, मधुयुक्त जूही– इन सबसे जो आवेष्टित है, हरिण, मर्कट और मर्कटियाँ जहाँ सदा विचरती रहती हैं और पद्मरागमणि के शिखर जिसकी शोभा बढ़ाते हैं, वह वृंदावन का निकुञ्ज भवन, श्री कौस्तुमणि और इन्द्रनील मणियों से अलंकृत है। वहाँ कोटि–कोटि चंद्रमण्डल की शोभा से युक्त सुनहरे चंदोवे लगे हैं, जो रेशम के सूत से निर्मित हुए हैं। उस निकुंज भवन का द्वार मणिमय बंदनवारों से विलसित है। मोतियों की झालरों से युक्त सुवर्ण के समान पीली पताकाएं वहाँ फहराती रहती हैं। कबूतर और हंस आदि पक्षी उसे घेरे रहते हैं। मंदार, कुंद, कनेर, जूही और नूतन चंपा के फूलों की विचित्र मालाओं से उस निकुंज भवन काम्देव के मन को भी मोह लेने वाला था।
वहाँ दीवारों पर सुंदर रत्नमय दर्पण लगे हैं और श्वेत चामर उस भवन की शोभा बढ़ाते हैं। नूतन पल्लवों और पुष्पों से अलंकृत सिंहासनों, शय्यासनों में सुवर्ण और मूंगे के पाये लगे हैं, जिनसे उस भवन की अनुपम शोभा होती है। श्रीचंदन और अगरु के जल, सुगन्धित पुष्पों की मकरन्दराशि तथा कस्तुरी के सौरभ से आमोदित केसर पंक से उस भवन में सब ओर छिड़काव किया गया है। हिलते हुए वसंत वृक्षों के पल्लवों से जिनका अनुमान होता है, ऐसे शीतल तथा गजराज की सी गतिवाले मंद-मंद समीरण से उस भवन का सर्वांग सुगंध से भीना हुआ था। वहाँ के वृक्षों की शाखाएँ अत्यंत नम्र–झुकी हुई थीं तथा अधिकाधिक पुष्प समूहों से वह अलंकृत था। श्रीहरि के ऐसे निकुंज भवन का तुम चिंतन करो ।
नरेश्वर ! श्रीहरि के वेणुवादन से निकला हुआ गीत अत्यंत प्रेमोन्माद की वृद्धि करने वाला था। उसे सुनकर समस्त व्रज सुंदरियों का मन प्रियतम श्रीकृष्ण के वश में हो गया। वे घर का सारा काम–काज छोड़कर व्रज में चली आईं। राजन् ! जिन्हें पतियों ने रोक लिया, वे भी प्रियतम श्रीकृष्ण के द्वारा हृदय हर लिए जाने के कारण स्थूल शरीर छोड़कर तत्काल श्रीकृष्ण के पास चली गई। इस पर सुनहरा दुकूल बिछा हुआ था, उस सिंहासन पर, उसके मध्यभाग में श्याम सुंदर नंदनंदन श्री सुंदरी राधिका के साथ बैठे थे। उनके गले में मकरन्दपूरित मालती की माला शोभा पा रही थी। उनकी अंगकांति स्याम थी। वे प्रात:काल के सूर्य के समान दीप्तिमान किरीट से सुशोभित थे। उनकी प्रभा चारों ओर फैल रही थी। अधर से लगी हुई श्री मुरली के कारण उन श्रीहरि की मनोहरता और भी बढ़ गई थी। वहाँ आई हुई व्रजसुंदरियों ने कोटि–कोटि कामदेव के समूहों को मोहित करने वाले पीताम्बरधारी श्याम सुंदर को देखा ।
राजन् ! मीनाकार कुण्डलधारी प्रिया–प्रियतम श्रीहरि को देखकर गोपियाँ तत्काल मूर्च्छित हो गईं। उनके अंगों में किसी प्रकार की चेष्टा नहीं दिखाई देती थी। तब श्रीकृष्ण ने अमृत के समान मधुर वचनों द्वारा उन सबको सान्त्वना दी– धीरज बँधाया। तब समस्त गोपसुंदरियों ने विरहजनित दु:ख का परित्याग कर प्राणवल्लभ गोविंद की ओर से बड़े प्यार से देखा। मालती वन से व्याप्त दिव्यवृक्षों एवं दिव्यलताओं के जाल से मंडित तथा भ्रमरों की गुञ्जारों से मुखरित शोभाशाली वृंदावन में साक्षात मदनमोहन देव श्रीहरि गोपांगनाओं के साथ विचरने लगे। अपने हस्तकमल से श्रीराधिका के करकमल को पकड़कर हँसते हुए साक्षात भगवान नंदनंदन यमुनाजी के तट पर आए। यमुना के किनारे शोभायमान निकुंज भवन में श्रीकृष्ण विराजमान हुए। राजन् ! मधुपति के उस भवन में श्रीकृष्णचंद्र के चरणारविंदों के चिंतन में संलग्न हुई गोपागंनाओं के पैरों में झनकारते हुए नूपुरों की ध्वनि के साथ खनखनाते हुए हाथ के कंगनों, पांव के मंजीरों और कटिप्रदेश की रत्ननिर्मित चंचल किंकिणियों के मधुर रव को तुम मन के कानों से सुनो ।
मंद–मंद मुस्कान की कांति से उन गोपसुंदरियों के कोमल कपोल प्रांत सुस्पष्ट चमकते या चमत्कारपूर्ण शोभा धारण करते थे। शोभामयी दंत पंक्ति से विद्युद् विलास–सा प्रकट करने वाली उन सखियों के वेष बड़े मनोहर थे। कोटीर रत्न के हार और हरितमणि के बाजूबंद से विभूषित तथा सूर्यमंडल के समान दीप्तिमान कुण्डलों से मण्डित हुई उन गोप सुंदरियों में कोई–कोई युवती मुग्धा बताई गई है।
कोई तरुणी मध्या और कोई सुंदरी प्रगल्भा नायिका थी। कोई तरुणी 'तरुं नयति–इति तरुणी।' इस व्युत्पत्ति के अनुसार तरु को भी विनय शिक्षा देती थी। कोई सखी उस सुंदर वन में अपने मधुर हास की छटा बिखेरती थी और कोई मदमत्त होकर चलती थी। कोई उसे भी हाथ से ठोंककर आगे दौड़ जाती थी और कोई उसको भी पकड़कर उस निकुंज भवन में कमल के फूलों से पीटती थी। कोई किसी के ढीले या टूटते हुए सुवर्णहार को हंसी–हंसी में खींच लेती और कोई उस वन–विहार में इस तरह मतवाली होकर दौड़ती कि उसके बंधे हुए केशपाश खुल जाते थे। उस निकुंज–भवन में श्रीजाह्नवी (गंगा), मधु–माधवी, शीला, रमा, शशिमुखी, विशाखा और माया आदि असंख्य गोपियां थीं। मैंने यहाँ थोड़ी–सी गोपांगनाओं के ही नाम बताए हैं। वहाँ की मणिमयी भूमियों पर कोई लीलाछत्र लेकर और कोई अतिमौक्तिक लता (मौगरा आदि) के फूलों की मालाएँ लेकर चलती थीं। कितनी ही सखियाँ चामर, व्यजन, दण्ड और फहराती हुई पीली पताकाएँ लिए चल रही थीं।
कुछ गोपांगनाएँ वहाँ श्री हरि (नटवर नंदकिशोर) का वेषधारण करके नाचती थीं। कोई हाथ में वीणा लेकर बजाती, कोई हाथ से ताल देती और कोई मृदंगवादन की कला दिखाती थी। कितनी ही सखियाँ वृषभानुनंदिनी का सा वेष धारण किए, केयूर और कुण्डलों से अलंकृत हो बंशी लेकर बजातीं और कई मणिमण्डित बेंत की छड़ी हाथ में लेकर चलती थीं। सुंदर हाव–भाव, रस और ताल से युक्त मंद मुस्कान के रस से सिक्त तथा झंकारते हुए नूपुरों के शब्द से युक्त विशद कटाक्षों, भौहों के कुटिल विलासों एवं संगीत नृत्यकला के ज्ञानों द्वारा गोपांगनाएँ वहाँ श्रीराधा तथा माधव को सतत संतुष्ट कर रही थीं। यमुना के तट पर उस निकुंज भवन में बंशीवट के पास की वनभूमि के निकट नटवर वेषधारी नंदनंदन श्रीकृष्ण श्रीराधा के साथ गिरिराज की घाटी में विचर रहे हैं। इस झांकी में तुम उनका चिंतन करो ।
श्री पद्मरागमणि समान अरुण आभा वाले चमकीले नखों से जिनके चरणारविंद उद्दीप्त जान पड़ते हैं, जो अपने पैरों में झंकारते हुए नूपुर धारण किए हुए हैं, जिनके संपूर्ण अंगदेश से दिव्य दीप्ति झर रही है, जो विचरण काल में अपने लाल–लाल पादतलों से भूप्रदेश को अरुण रंग से रंजित कर रहे हैं, शोभाशाली चरण पराग की सुंदर कांति बिखेरते हुए इधर–उधर टहल रहे हैं, जिनका युगल जानुदेश लक्ष्मीजी के करकमलों द्वारा सब ओर से लालित होता–दुलारा जाता है, जिनके रंभा के समान जांघों पर पीताम्बर शोभा पाता है, जिनका उदर भाग अत्यंत कृश है, नाभि सरोवर रोमावलि रूपी भ्रमरों से सुशोभित है, जो उदर में त्रिवेणीमयी तीन रेखा धारण करते हैं, जिनका वक्ष:स्थल भृगु के चरणचिह्न तथा कौस्तुभमणि से अलंकृत है, श्रीवत्सचिह्न एवं हारों से अत्यंत रुचिर दिखाई देता है, जिनके श्री अंगों की कांति नुतन मेघमाला के समान नील है, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं, जिनके विशाल भुजदण्ड हाती की सूंड के समान प्रतीत होते हैं, जो रत्नमय बाजूबंद और मणिमय कंगन धारण करते हैं, जिनके एक हाथ में दिव्यकमल है तथा दूसरे हाथ में दिव्य शंखकमल पर विराजित राजहंस के समान शोभा पाता है, जो शंखाकार ग्रीवा से सुंदर दिखाई देते हैं, जिनके कपोलों का मध्यभाग अत्यंत शोभाशाली है, चिबुक (ठोढ़ी) का भाग गहरा है और दांत कुंदन के समान चमकीले हैं, पके हुए बिम्बफल को अपनी अरुणिमा से लज्जित करने वाले अधरमन्द मुस्कान की छटा से छविमान हैं, नासिका तोते की चोंच के समान नुकीली है और जिनके वचनों से मानो अमृत झरता रहता है।
कटाक्ष अत्यंत चंचल हैं, नेत्र प्रफुल्ल कमलदल के समान मनोहर हैं, जिनकी प्रत्येक लीला उनके प्रति प्रेम की वृद्धि करने वाली है और भ्रूमंडल मानो मंद–मुस्कान रूपी प्रत्यंचा से युक्त कामदेव के धनुष हैं, जिनके मस्तक पर धारित रत्नमय किरीट विद्युत की छटा को विलज्जित कर रहा है तथा जो मार्तण्ड मण्डल के समान कान्तिमान कुण्डलों से मण्डित हैं, जिनके अधर पर बंशी विराजमान है, काली–काली घुंघराली अलकें चंचल भुजंग के समान जान पड़ती हैं, जिनका मुख सजल पद्मपत्र के समान स्वेद बिंदुओं से विलसित है, जो करोड़ों कामदेवों के घनीभूत सौंदर्याभिमान को हर लेने वाले हैं, जिनका श्रीविग्रह पतला है तथा जो वृंदावन में वंशीवट के समीप विचर रहे हैं, उन राधावल्लभ नटवर नंदकिशोर का तुम सब प्रकार से भजन सेवन करो ।[2]
जिनके लाल–लाल नखचंद्रों से युक्त चरणारविंद की शोभा कुछ कुछ लाल दिखाई देती है, मंजीर और नूपुरों की झंकार के साथ जिनके कटिप्रदेश की किंकिणी खनकती रहती है, घुंघुरू और सोने के कंगनों के मधुर शब्द से शोभित होने वाली तथा तरुपुंजों के निकुंज में विराजमान उन श्रीराधारानी का मैं ध्यान करता हूँ। श्रीराधा के शरीर पर नीले रंग के वस्त्र शोभा पाते हैं,जो सुनहरे किनारों के कारण सूर्य की किरणों के समान चमक रहे हैं। यमुना तट पर प्रवाहित होने वाली वायु की गति से वे वस्त्र चंचल हो गए हैं– उड़ रहे हैं और अत्यंत सूक्ष्म (महीन) होने के कारण बहुत ही ललित (सुंदर) दीख पड़ते हैं। ऐसे वस्त्रों से सुशोभित, अतिशय गौरवर्णा एवं मनोहर मंद हास वाली रासेश्वरी श्रीराधा का भजन करो।
जिनके बहुमूल्य मणिमय अंगद तथा रत्नमय हार प्रात:काल के सूर्यमंडल की भाँति दीप्तिमान हैं, जो कानों के ताटंक (बाली) और कण्ठ में सुशोभित मणिराज कौस्तुभ के कारण अत्यंत मनोहर छबि धारण करती हैं, जिनके गले में रत्नमयी कण्ठ माला तता फूलों के चौदह लड़ों के हार शोभा पाते हैं तथा जो रत्न निर्मित मुद्रिका से ललित (अत्यंत आकर्षक) प्रतीत होती है, उन व्रजराज नन्दनन्दन की पत्नी श्रीराधा का स्मरण करो। जिनके मस्तक पर चूड़ामणि की कांति से लसित अर्धचंद्राकार भूषण जगमगा रहा है, कण्ठगत आभूषणों और मुखमंडल में की गई पत्ररचना से जिनका रूप सौंदर्य विचित्र (अद्भुत) जान पड़ता है, जो श्रीपट्टसूत्र और मणिमय पट्टसूत्रों द्वारा निर्मित दो लड़ों की चंचल माला धारण करती हैं तथा जिन्होंने अपने एक हाथ में प्रकाशमान सहस्रदल कमल को धारण कर रखा है, उन श्रीराधा का भजन करो। श्रीयुत भुजाओं के मणिमय कंगनों से कुचमण्डल में विलसित रत्नमय हार की दीप्ति द्विगुणित हो उठती है, सुंदर नासिका के नकबेसर आदि आभूषण समूचे कपोल मण्डल को उद्भासित करते हैं।
उत्तम यौवनावस्था के अनुरूप उनकी मंद–मंद गति है। सिर पर बंधी हुई सुंदर वेणीनागिन के समान शोभा पाती है। खिली हुई चम्पा के फूलों की सी अंगों की पीत गौर आभा है तथा मुख की शोभा संध्याकाल में उदित करोड़ों चंद्रमाओं की कांति को तिरस्कृत करती है, ऐसी श्रीराधा का भजन करो। जो सुंदरहाव भाव से सुशोभित, नवविकसित नील कमल के समान नेत्रवाली, मंद मुस्कान की कान्तिमती कला को प्रकाशित करने वाली तथा चंचल कटाक्षों के कारण करनीय हैं, जिनकी कुंतलराशि की श्याम आभा बड़ी मनोहर है तथा जो पारिजात के हारों के मदुर मकरन्द पर लुभाई हुई भ्रमरी के गुंजारव से सुशोभित हैं, उन श्रीकृष्ण वल्लभा राधा का चिंतन करो।
श्रीखण्डचदन्दन, केसरपंक तथा अगुरुमिश्रित जल से जिनका अभिषेक हुआ है, भालदेश में जो कुंकुम की वेणी धारण करती हैं तथा जिनके मुखमंडल में रुचिर पत्र रचना के रूप में विचित्र चित्र चित्रित किया गया है, कल्पवृक्ष के पत्रों के समान जिनकी रुचिर गौर कान्ति है तथा जो नेत्रों में पूर्णरूप से अंजन की शोभा धारण करती हैं, उन गजगामिनी, पद्मिनी नायिका रासेश्वरी श्रीराधा का भजन करो। (3)
ऐसी रति से भी अधिक सुंदुर श्रीराधा को साथ लेकर श्रीकृष्ण निकुंज वन की शोभा देखने के लिए जब जा रहे थे, तब वहाँ गोपांगनाएँ मणिमय छत्र धारण किए, मनोहर चंवर लिए तथा फहराती हुई पताकाएँ ग्रहण किए उनके साथ साथ दौड़ने लगीं। आदि पुरुष नन्दनन्दन उत्तम धैवत और मध्यम आदि स्वरों से छ: राग तथा उनका अनुगमन करने वाली छत्तीसों रागिनियों का ललित वंशीरव के द्वारा गान करते हुए चल रहे थे, ऐसे श्रीकृष्ण का ध्यान करो।
जो श्रृंगार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, रौद्र, वीभत्स और भयानक रसों से नित्ययुक्त है और जिनके युगल चरण योगीश्वरी के हृदय कमल में सदा प्रकाशित होते हैं, उन भक्त प्रिय भगवान का भजन करो। जो समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ रूप से निवास करते हैं, आदिपुरुष हैं, अधियज्ञ स्वरूप हैं, समस्त कारणों के भी कारणेश्वर हैं, प्रकृति और पुरुष में से पुरुष रूप हैं तथा जिन्होंने अपने तेज से यहाँ समस्त छल–कपट–काम–कैतव को निरस्त कर दिया है, उन सर्वेश्वर श्रीकृष्ण हरि का भजन करो। शिव, धर्म, इंद्र, शेष, ब्रह्मा, सिद्धिदाता गणेश तथा अन्य देवता आदि भी जिनकी ही स्तुति करते हैं, श्रीराधा, लक्ष्मी, दुर्गा, भूदेवी, विरजा, सरस्वती आदि तथा संपूर्ण वेद सदा जिनका भजन करते हैं, उन श्रीहरि का मैं भजन करता हूँ ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘रासक्रीड़ा विषयक’ बयालीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
1. रुन्धन्नम्बुभृतश्चमत्कृतिपरं कुर्वन्मुहुस्तुम्बुरु ध्यानादन्तरयन् सनन्दनमुखान् विस्मापयन् वेधसम्।
औत्सुक्यावलिभिर्बलिं चटुलयन् भोगीन्द्रमाघूर्णयन् भिन्दन्नण्डकटाहभित्तिमभितो बभ्राम वंशीध्वनि:।।
(अध्याय 42 / 3)
2. श्रीपद्मरागनखदीप्तिपदारविंदं झंकारनूपुरधरं स्फुरदंदेशम्। कुर्वन्तमेव तु पदारुणभूमिदेशं श्रीमत्परागसुरुचारमितस्ततस्तु।। लक्ष्मीकराब्जपरिलालितजानुदेशं रम्भोरुपीतवसनं तु कृशोदराभम्। रोमावलिभ्रमरनाभिसरस्त्रिरखं काञ्चीधरं भृगुपदं मणिकौस्तुभाढ्यम्।। श्रीवत्सहाररुचिरं नवमेघनीलं पीताम्बरं करिकरस्फुटबाहुदण्डम्। रत्नांगदं च मणिकंकणपद्महस्तं श्रीराजहंसवरकन्धरशोभमानम्।। श्रीकम्बुकण्ठललितं विलसत्कपोलं मध्यं तु निम्नचिबुकं किल कुन्ददन्तम्। बिम्बाधरं स्मतलसच्छुकचञ्चुनासं पीयूषकल्पवचनं प्रचलत्कटाक्षम्।। श्रीपुण्डरीकदलनेत्रमनंगलीलं भ्रूमण्डलस्मितगुणावृतकामचापम्। विद्युच्छटोच्छलितरत्नकिरीटकोटिं मार्तण्डमण्डलविकुण्डलमण्डिताभम्।। वंशीधरं त्वहिविलोलगुडालकाढ्यं राधापतिं सजलपद्ममुखं चलंतम्। कंदर्पकोटिघनमानहरं कृशांग वंशीवटे नटवरं भज सर्वथा त्वम्।। (अध्याय 42। 42 -47)
3. आरक्तरक्तनखचन्द्रपदाब्जशोभां मञ्जीरनूपुररणत्कटिकिंकिणीकाम्।
श्रीघण्टिकाकनककंकणशब्दुक्तां राधां दधामि तरुपुञ्जनिकुञ्जमध्ये।।
नीलाम्बरै: कनकरश्मितटस्फुरद्भि: श्रीभानुजातटमरुद्गतिचञ्चलांगे:।
सूक्ष्मस्वरूपललितैरगतिगौरवर्णां रासेश्वरीं भज मनोहरमन्दहासाम्।।
बालार्कमण्डलमहांगदरत्नहारां ताटंकतोरणमणीन्द्रमनोहराभाम्।
श्रीकण्ठभालुमनोनवपंचदाम्नीं रत्नांगुलीयललितां व्रजराजपत्नीम्।।
चूडामणिद्युतिलसत्स्फुरदर्धचंद्रं ग्रैवेयकालपनपत्रविचित्ररूपाम्।
श्रीपट्टसूत्रमणिपट्टचलद्द्विदाम्नीं स्फूर्जत्सहस्रदलपद्मधरां भजस्व।।
श्रीबाहुकंकणलसत्कुचरत्नदीप्तिं श्रीनासिकाभरणभूषितगण्डदेशाम्।
सद्यौवनालसगतिं कलसर्पवेमीं संध्येन्दुकोटिवदनां स्फुटचम्काभाम्।।
सद्धावभावसहितां नवद्मनेत्रां स्फूर्जत्स्मितद्युतिकलां प्रचलत्कटाक्षाम्। कृष्णप्रियां ललितकुन्तलकुन्लाभां मन्दारहारमधुरभ्रमरीरवाढ्याम्।।
श्रीखण्डकुंकुममृदागुरुवारिसिक्तां श्रीबिन्दुकीरुचिरपत्रविचित्रचित्राम्। संतानपत्ररुचिरामलमश्रुनायां रासेश्वरीं गजगतिं भज पद्मिनीं ताम्।।
(अध्याय 42। 48 – 54 )
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