10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 43 || श्रीकृष्ण का श्रीराधा और गोपियों के साथ विहार तथा मानवती गोपियों के अभिमानपूर्ण वचन सुनकर श्रीराधा के साथ उनका अन्तर्धान होना
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 43 || श्रीकृष्ण का श्रीराधा और गोपियों के साथ विहार तथा मानवती गोपियों के अभिमानपूर्ण वचन सुनकर श्रीराधा के साथ उनका अन्तर्धान होना
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! वृक्षों, लताओं और भ्रमरों से व्याप्त तथा शीतल मंद पवन से वीजित वृंदावन में मुरली के छिद्रों को मुखोद्गत समीर से भरते– वेणु बजाते हुए नन्दनन्दन श्रीहरि बारंबार देवताओं का मन मोहने लगे। तदनंतर वेणु गीत सुनकर प्रेम विह्वल कीर्ति नंदनी श्रीराधा ने प्रियतम नन्दनन्दन को दोनों बांहों में भर लिया। गोकुलचंद्र श्रीकृष्ण ने गोकुल की चकोरी राधा को प्रेमपूर्वक निहारते हुए फूलों की सेज पर उनके मन को लुभाते हुए उनके साथ आनंदमयी क्रीड़ा की। श्रीकृष्ण के साथ विहार का सुख पाकर स्वामिनी श्रीराधा ब्रह्मानंद में निमग्न हो गईं। उन्होंने स्वामी को वश में कर लिया और वे परमानंद का अनुभव करने लगीं ।
राजन् ! प्रेमानंद प्रदान करने वाले रमणीय रमावल्लभ श्रीहरि को गोपरामाओं ने रासमण्डल में सब ओर से पकड़ लिया। उनमें सौ यूथों की युवतियां विद्यमान थीं। नरेश्वर ! रमणीय नन्दनन्दन श्रीहरि ने रास मण्डल में जितनी व्रज सुंदरियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके उनके साथ विहार किया। जैसे संत पुरुष ब्रह्म का साक्षात्कार करके परमानंद में निमग्न हो जाते हैं, उसी प्रकार वे वृंदावन विहारिणी समस्त गोप सुंदरियँ बांके विहारी के साथ विहार का सुख पाकर ब्रह्मानंद में डूब गईं। श्रीवल्लभश्याम सुंदर ने अपने शोभाशाली युगल करकमलों द्वारा उन संपूर्ण व्रज वनिताओं को अपने हृदय से लगाया, क्योंकि उन्होंने अपनी भक्ति से भगवान को वश में कर लिया था। उन गोप सुंदरियों के मुखों पर पसीने की बूंदें छा रही थीं। व्रजवल्लभ श्रीकृष्ण बड़े प्यार से अपने पीताम्बर द्वारा उन पसीनों को पोंछा। उन गोपांगनाओं की तपस्या के फल का मैं क्या वर्णन कर सकता हूँ ? उन्होंने सांख्य, योग, तप, उपदेश श्रवण, तीर्थ सेवन तथा गान आदि के बिना ही केवल प्रेममूलक कामना से श्रीहरि को प्राप्त कर लिया ।
तदनंतर समस्त गोपियाँ अभिमान में आकर परस्पर ओछी बातें करने लगीं, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के विहार सुख से पूर्णत: परितृप्त थीं। वे कहने लगीं- सखियों ! पहले श्रीकृष्ण हम लोगों को छोड़कर मथुरापुरी चले गए थे, जानती हो क्यों ? क्योंकि वे स्वयं परम सुंदर हैं, अत: नगर में परम सुंदरी रूपवती स्त्रियों को देखने गए थे। परंतु वहाँ जाने पर भी उन्हें मन के अनुरूप सुंदरियाँ नहीं दृष्टिगोचर हुईं, तब उन्होंने एक सुंदरी राजकुमारी के साथ विवाह किया। वह थी– भीष्मक राजनंदनी रुक्मणि !
किंतु उसे भी रूपवती न मानकर इन्होंने पुन: बहुत से विवाह किए। सोलह हजार स्त्रियाँ घर में ला बिठाईं। किंतु सखियों ! उन सबको भी मन के अनुकूल रूपवती न पाकर बारंबार शोक करते हुए श्यामसुंदर श्रीकृष्ण पुन: देखने के लिए व्रज में आए हैं।
अरी वीर ! सर्वद्रष्टा परमेश्वर हमारे रूप देख कर उसी तरह प्रसन्न हुए हैं, जैसे पहले रास में हुआ करते थे। इसलिए हम लोग त्रिभुवन की समस्त सुंदरियों में श्रेष्ठ, सुलोचना, चंद्रमुखी तथा नित्य सुस्थिर यौवना मानी गई हैं। हमारे समान रूपवती स्वर्गलोक की देवांगनाएँ भी नहीं हैं, क्योंकि हमने अपने कटाक्षों द्वारा श्री कृष्ण को शीघ्र ही वश में कर लिया और कामुक बना दिया। अहो ! जिस हंस ने पहले मोती चुग लिए हैं, वहीं दु:खपूर्वक दूसरी वस्तु कैसे खाएगा ? हर जगह मोती नहीं सुलभ होते। वे तो केवल मानसरोवर में ही मिलते हैं, उसी प्रकार भूतल पर सर्वत्र सुंदरी स्त्रियाँ नहीं होतीं। यदि कहीं हैं तो इस व्रज में ही हैं ।
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! जगदीश्वर श्रीकृष्ण आत्माराम हैं। वे उन मानवती गोप सुंदरियों का ऐसा कथन सुन कर श्रीराधा के साथ वहीं अन्तर्धान हो गए। नरेश्वर ! निर्धन मनुष्य भी धन पाकर अभिमान से फूल उठता है, फिर जिसको साक्षात नारायण प्राप्त हो गए, उसके लिए क्या कहना है।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ’रासक्रीड़ा विषयक’ तैंतालीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
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