10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 47 || श्रीकृष्ण सहित यादवों का व्रजवासियों को आश्वासन देकर वहाँ से प्रस्थान
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 47 || श्रीकृष्ण सहित यादवों का व्रजवासियों को आश्वासन देकर वहाँ से प्रस्थान
श्रीगर्गजी कहते हैं– राजेंद्र ! श्रीकृष्ण का यह चरित्र शास्त्रों में गुप्त रूप से वर्णित है। जिसे मैंने तुम्हारे सामने प्रस्तुत किया है। अब तुम भगवान के अनेक चरित्रों को विस्तारपूर्वक सुनो। इस प्रकार श्रीकृष्ण नंदनगर में आठ दिनों तक रह कर सब लोगों को आनंद प्रदान करते रहे। इसके बाद पुन: उन्होंने वहाँ से जाने का विचार किया ।
श्रीकृष्ण की माता यशोदा अपने प्राणों से भी प्यारे पुत्र को जानने के लिए उद्यत देख पहले की भाँति ही उच्च स्वरों से रोदन करने लगी। नृपेश्वर ! वहाँ गोपियों के भी नेत्र आंसुओं से भर आए और वे घर–घर में पहले के दुखों को याद करके करुण भाव से रोदन करने लगीं। सांत्वना देने में कुशल श्रीहरि ने जितनी व्रजांगनाएँ थीं उतने ही रूप धारण करके उन सबको पृथक पृथक आश्वासन दिया तथा श्रीराधा को भी धीरज बंधाया। इसके बाद भगवान माता यशोदा से बोले– "मैया ! शोक न करो, मैं इस उत्तम अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान पूरा करवाकर शीघ्र ही यहाँ आऊँगा। यदि तुम नहीं विश्वास करती हो तो मेरी यह बात सुन लो, मैया ! आज से तुम प्रतिदिन मुझे पुत्र रूप में अपने पास देखोगी। मैं भक्ति भाव से स्मरण करने पर काल के भय को भी नाश करने वाला हूँ।"
इस प्रकार यशोदाजी को आश्वासन देकर नेत्रों में आंसू भरे श्रीहरि नंदसदन से बाहर निकले और गोपों के साथ अपने पौते अनिरुद्ध की सेना में गए। नृपश्रेष्ठ ! अनिरुद्ध की सेना में पहुँच कर साक्षात नारायण श्रीहरि ने यादवों को घोड़ा छोड़ने के लिए आज्ञा दी। श्रीकृष्णचंद्र से प्रेरित होकर उनके पौत्र अनिरुद्ध ने यत्नपूर्वक अश्व का पूजन किया और पुन: पूर्ववत विजय यात्रा के लिए उसे छोड़ दिया ।
अनिरुद्ध आदि सब यादव नेत्रों में आंसू भरे नंद को नमस्कार करके बड़े कष्ट से वहाँ से जाने के लिए अपने अपने वाहनों पर आरूढ़ हुए। श्रीकृष्ण के पुत्र और पौत्र सबके आकार उन्हीं के समान सुंदर थे। श्रीकृष्ण के साथ उन सब यादवों को जाने के लिए उद्यत देख गोविंद के विरह से व्याकुल हो वे गोपगण वहाँ फूट-फूट कर रोने लगे। पहले के विरह जनित दुखों को याद करके उनके कंठ, ओठ और तालू सूख गए थे। नंदराज के नेत्रों में भी आंसू छलक रहे थे। वे दुख से पीड़ित हो सूखे हुए मुँह से कुछ बोल न सके। केवल रोदन करने लगे। श्रीकृष्ण भी आसूं बहाते हुए मैं फिर आऊँगा, ऐसा कह कर सबसे पृथक पृथक मिले और सबको आश्वासन दिया।
उन्होंने कहा– गोपालगण ! चैत्रमास में जब द्वारकापुरी में यज्ञ आरंभ होगा तब में तुम सबको बुलवाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। मेरे मित्र गोपगण तुम प्रतिदिन गोकुल में मुझ गोपाल को देखोगे। अत: अभी यहीं व्रजमंडल में निवास करो।
इस प्रकार आश्वासन दे उनके दिए हुए उपहार को लेकर नंदजी को प्रणाम करके श्रीहरि वृष्णिवंशियों के रथ पर बैठकर वहाँ से चल दिए। नंद आदि दुखी गोप श्रीकृष्णचंद्र के चरण कमल में लगे हुए मन को पुन: हटाने में असमर्थ हो केवल शरीर से गोकुल को लौटे। नरेश्वर ! उस दिन से प्रेममग्न गोप और गोपीगण योगियों के लिए भी परम दुर्लभ श्रीकृष्ण को अपने समीप देखने लगे ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘यादवों का व्रज से अन्यत्र गमन’ नामक सैंतालीसवां अध्याय पूरा हुआ ।
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