10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 48 || अश्व का हस्तिनापुर में जाना, उसके भालपत्र को पढ़कर दुर्योधन आदि का रोषपूर्वक अश्व को पकड़ लेना तथा यादव सैनिकों का कौरवों को घायल करना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 48 || अश्व का हस्तिनापुर में जाना, उसके भालपत्र को पढ़कर दुर्योधन आदि का रोषपूर्वक अश्व को पकड़ लेना तथा यादव सैनिकों का कौरवों को घायल करना

श्रीगर्गजी कहते हैं – राजन् ! तदनंतर यमुना नदी को पार करके वह अश्व आस पास के देशों का निरीक्षण करता हुआ कुरुदेश की राजधानी में गया, जहाँ बलवान विचित्र वीर्यकुमार चक्रवर्ती राजा धृतराष्ट्र राज्य करते थे। वहाँ उस अश्व ने अनेकानेक उपवनों, तड़ागों और सरोवरों से युक्त सुंदर कौरव नगर को देखा ।

नरेश्वर ! वह नगर दुर्ग से तथा गंगारूपिणी खाई से घिरा हुआ था। वहाँ सोने–चांदी के महल थे और बड़े–बड़े शूरवीर वहाँ निवास करते थे। राजन् ! उस कौरव नगर से वनवासी मृगों का शिकार करने के लिए सुयोधन निकला। वह वीरजनों से युक्त हो रथ पर बैठा था। उसने उस यज्ञ संबंधी घोड़े को भाल पत्र सहित देखा।

महाराज ! दुर्योधन बड़ा मानी था। घोड़े को देखकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने रथ से उतरकर अनायास ही घोड़े को पकड़ लिया। कर्ण, भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, भूरि और दु:शासन आदि के साथ उसने हर्षित होकर उसका भालपत्र पढ़ा। उसमें लिखा था– चंद्रवंश अंतर्गत यादवकुल में राजा उग्रसेन विराजते हैं। इंद्र आदि देवता भी जिनकी आज्ञा के पालक हैं, भक्त परिपालक भगवान श्रीकृष्ण उनके सहायक हैं। वे उन्हीं की भक्ति से आकृष्ट हो द्वारकापुरी में निवास करते हैं। उन्हीं की आज्ञा से राजाधिराज चक्रवर्ती उग्रेसन हठपूर्वक अपने यश के विस्तार के लिए अश्वमेध यज्ञ करते हैं। उन्होंने यह श्रेष्ठ और शुभ लक्षणों से संपन्न घोड़ा छोड़ा है। उस घोड़े के रक्षक हैं श्रीकृष्ण पौत्र अनिरुद्ध, जो वृक दैत्य का वध करने वाले हैं। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल वीरों की अनेक चतुरंगिणी सेनाओं के साथ अनिरुद्ध अश्व की रक्षा में चल रहे हैं। जो राजा इस पृथ्वी पर राज्य करते हैं और अपने को शूरवीर मानते हैं, वे भाल पत्र से शोभित इस यज्ञ संबंधी अश्व को बलपूर्वक ग्रहण करें। धर्मात्मा अनिरुद्ध राजाओं द्वारा पकड़े गए उस अश्व को अपने बाहुबल और पराक्रम से अनायास हठपूर्वक छुड़ा लेंगे। जो घोड़े को न पकड़ सकें, वे धनुर्धर अनिरुद्ध के चरणों में नतमस्तक होकर चले जाएं ।

श्रीगर्गजी कहते हैं– उस पत्र को बांचकर वे शत्रुभूत कौरव क्रुद्ध हो उठे। उन मानियों के नेत्र लाल हो गए और वे परस्पर कहने लगे ।

कौरव बोले– अहो ! इन धृष्ट यादवों ने घोड़े के भाल पत्र में क्या लिख रखा है ? क्या यादवों के सामने कोई राजा ही नहीं है ? पूर्वकाल में अपने राजसूय यज्ञ में हमने जिन यादवों को परास्त किया है, वे ही मूर्ख अब फिर अश्वमेध करने चले हैं। इसलिए हम इन सबको जीतेंगे। घोड़े को कदापि वापस नहीं देंगे। यादवों को जीतने के पश्चात् हम लोग स्वयं अश्वमेध यज्ञ करेंगे। कौन है उग्रसेन ? क्या है कृष्ण ? और वह घोड़े की रक्षा करने वाला भी कौन है ? समस्त यादवों के साथ आकर ये लोग हमारे सामने क्या पौरूष दिखाएंगे ? कृष्ण आदि समस्त यदुवंशी जरासंध के डर से मथुरापुरी छोड़कर समुद्र की शरण में गए हैं। वे हम लोगों के ही भय से युद्ध छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं। पहले हम लोगों ने कृपा करके इन यादवों को राज्य दे दिया और अब वे कृतघ्न यादव अपने को चक्रवर्ती मानने लगे हैं। पाण्डवों का मान रखने के लिए हमने पहले यादवों को नहीं मारा था, किंतु वे पाण्डव भी हमारे शत्रु ही हैं। अत: हमने उन्हें देश निकाला दे दिया है। इन भागे हुए यादवों को आज युद्ध में पराजित करके हम उग्रसेन को सहसा उनके चक्रवर्तीपन का मजा चखाएंगे ।

राजन् ! वे समस्त श्रीकृष्ण विमुख कौरव लक्ष्मी और राजवैभव के घमंड में आकर ऐसी बात कहने लगे। फिर सबने शीघ्र ही नाना प्रकार के अश्त्र शस्त्र ले लिए और उस घोड़े को नगर में प्रवेश कराया। इसके बाद वे वहीं ठहर गए। अश्व के दूर चले जाने पर श्रीकृष्ण की प्रेरणा से साम्ब तुरंत ही मार्ग प्रदान करने वाली यमुना नदी को पार करके दस अक्षौहिणी सेना पीछे लिए, कवच बांध, अक्रूर और युयुधान आदि के साथ रोषपूर्वक हस्तिनापुर के निकट आ पहुँचे।

उन्होंने देखा– घोड़ा चुराने वाले कौरव सामने खड़े हैं। श्रीकृष्ण ही जिनके आराध्यदेव हैं तथा जो लोक और परलोक दोनों पर विजय पाने के इच्छुक हैं, उन बलवान यादवों ने कौरवों को देखकर उन सबको तिनके के समान समझते हुए कहा- अहो ! किसने हमारे घोड़े को बांधा है ? किसके ऊपर आज यमराज प्रसन्न हुए हैं और कौन युद्धस्थल में नाराचों द्वारा बड़ी भारी पीड़ा प्राप्त करने के लिए उत्सुक है ? अहो ! जिनके चरणों में देवता और दानव भी वंदना करते हैं, जो पहले राजसूय यज्ञ कर चुके हैं, जिनकी समानता करने वाला संसार में दूसरा कोई नहीं है तथा जो नरेशों के भी ईश्वर हैं, उन वृष्णिकुल तिलक चक्रवर्ती राजाधिराज उग्रसेन को क्या वे राजा नहीं जानते, जो अपने ही विनाश के लिए घोड़े को पकड़ रहे हैं ? हेमांगद, इंद्रनील, बक, भीषण और बल्वल– इन समस्त नरेशों को हमने संग्राम भूमि में पराजित किया है।

कौरवों के अनुगामी बोले– हम लोगों ने ही घोड़े को पकड़ा है। तुम लोग हमारा क्या कर लोगे ? हम अपने सायकों द्वारा तुम सब यादवों को यमलोक पहुँचा देंगे। उग्रसेन कितने दिनों से श्रीकृष्ण के हाथ से राज्य पाकर घमंड करने लगा है ? हम उसे बाँधकर स्वयं राज्य करेंगे। अनिरुद्ध हमारे भय से कहाँ भाग गया है ? बताओ, हम युद्ध में अपने बाणों द्वारा उसकी पूजा करेंगे, इसमें संशय नहीं है।

श्रीगर्गजी कहते है– राजन् ! कौरवों की यह बात सुनकर यादव क्रोध से मूर्च्छित हो उठे। उन्होंने कौरव सैनिकों के मुखों पर धनुष से अनेक बाण फेंके। उन बाणों से कितने ही कौरवों की जीभें कट गईं, किन्हीं के दाँत टूट गए और किन्ही के मुख छिन्न-भिन्न हो गए थे। वे अधिक मात्रा में रक्त वमन करते हुए घायल हो अपना क्षत विक्षत मुँह लिए शीघ्र ही दुर्योधन के पास गए और पूछने पर बताया कि यादवों ने हमारी यह दुर्दशा की है।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘कौरवों द्वारा श्याम कर्ण अश्व का अपहरण’ नामक अड़तालीसवां अध्याय पूरा हुआ ।



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