10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 50 || कौरवों की पराजय और उनका भगवान श्रीकृष्ण से मिलकर भेंट सहित अश्व को लौटा देना
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 50 || कौरवों की पराजय और उनका भगवान श्रीकृष्ण से मिलकर भेंट सहित अश्व को लौटा देना
श्रीगर्गजी कहते हैं– नृपेश्वर ! उसी समय भोज, वृष्णि और अंधक आदि समस्त यादव तथा मथुरा और शूरसेन प्रदेश के महासंग्राम कर्कश एवं बलवान योद्धा यमुनाजी को पार करके पैरों की धूलि से आकाश को व्याप्त और पृथ्वी को कंपित करते हुए वहाँ आ पहुँचे। घोड़े को सब ओर देखते और खोजते हुए महाबलवान श्रीकृष्ण आदि और अनिरुद्ध आदि महावीर भी आ गए। वृष्णिवंशियों ने दूर से ही वहाँ युद्ध का भयंकर महाघोष, कोदण्डों की टंकार, शतघ्नियों की गूंजती हुई आवाज, शूरों की सिंह गर्जना, शस्त्रों के परस्पर टकराने के चट चट शब्द, कोलाहल और हाहाकार सुना। सुनकर वे बड़े विस्मित हुए। जब उन्हें मालूम हुआ कि यादवों का कौरवों के साथ घोर युद्ध छिड़ गया है तो अनिष्ट की शंका मन में लिए अनिरुद्ध और श्रीकृष्ण आदि यदुकुल शिरोमणि महापुरुष बड़े वेग से वहाँ आए।
नरेश्वर ! अनिरुद्ध आदि के साथ हमारी सहायता करने के लिए सेना सहित श्रीकृष्ण आ पहुँचे हैं, यह देखकर साम्ब आदि ने उनको प्रणाम किया। श्रीकृष्ण के पधारने पर रणभेरियां बजने लगीं। शंख और गोमुखों के शब्द गूंज उठे, आकाश में स्थित देवता फूलों की वर्षा तथा भूतल पर विद्यमान यादव जय–जयकार करने लगे। समरांगण में सौ अक्षौहिणी सेना के साथ भूतल को कंपित करते हुए महाबली अनिरुद्ध आ पहुँचे हैं। यह देख कौरव योद्धा भय से भागने लगे। प्रलयकाल के समुद्र की भाँति उमड़ती हुई अंधक वंशियों की उस विशाल वाहिनी को देख कर वैश्य लोग डर के मारे भाग गए। घर–घर में अर्गला लग गई। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्री समुदाय दुर्योधन को कोसते हुए गाली देते हुए घर से निकल गए तथा रोदन करने लगे ।
तदनंतर मूर्च्छा छोड़कर दु:शासन का बड़ा भाई दुर्योधन तत्काल सोकर उठे हुए के समान जाग उठा। उस समय यादव सेना पर उसकी दृष्टि पड़ी। यादवों की वह विशाल सेना देखते ही दुर्योधन आशंकित हो गया और डर के मारे पैदल ही अपने नगर में चला गया। कर्ण, भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, भूरि और दुर्योधन आदि ने सभा भवन में जाकर धृतराष्ट्र को नमस्कार करके सारा हाल कह सुनाया। अपने पक्ष की परायज यादवों की विजय तथा श्रीकृष्ण का शुभागमन सुनकर राजा ने विदुर से पूछा ।
धृतराष्ट्र बोले– वीर ! सौ अक्षौहिणी सेना लेकर क्रोध से भरे हुए वासुदेव श्रीकृष्ण यहाँ चढ़ आए हैं। ऐसी दशा में हम लोग क्या करें। यह बताओ। महाराज धृतराष्ट्र की यह बात सुनकर विदुर ठहाका मारकर हंस पड़े और बोले ।
विदुर ने कहा– महाराज ! पहले तो अकेले बलरामजी ही कुपित होकर आए थे, जिन्होंने हस्तिनापुर को हल से खींचकर गंगा की ओर झुका दिया। अब उन्हीं के भाई आ पहुँचे हैं, जिन्होंने देवकी के हृदय कमल कोष से अवतार ग्रहण किया है। वे श्रीकृष्ण साक्षात् श्रीहरि हैं। राजन् ! जिन्होंने युद्ध में कंस और शकुनि आदि बहुत से दैत्यों को मार गिराया तथा अनेकानेक नरेशों एवं देवताओं को भी परास्त किया है। इसलिए महाराज ! देखिए, हमारे लिए यह युद्ध का समय नहीं है। आप कौरवों द्वारा श्याम कर्ण अश्व श्रीकृष्ण को लौटा दीजिए। इससे कौरवों और यादवों का विनाशकारी युद्ध नहीं होगा ।
अपने भाई विदुर के इस प्रकार समझाने पर बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र ने कौरवों से यह देश कालोचित बात कही ।
धृतराष्ट्र बोले– तुम लोग श्रीकृष्ण के निकट जाकर घोड़ा लौटा दो। देवाधिदेव श्रीहरि के सामने युद्ध करना तुम्हारे बलबूते के बाहर है। श्रीहरि यादवों की सहायता के लिए कुपित होकर आए हैं, तुम धीरे से उनके निकट जाकर उन्हें प्रसन्न करो ।
कौरवेंद्र का ऐसा आदेश सुनकर समस्त कौरव भयभीत हो गए। वे गंध, अक्षत सहित द्विव्य वस्त्र और नाना प्रकार के रत्न आदि विविध उपचार लेकर बलराम और श्रीकृष्ण के पवित्र नामों का कीर्तन करते हुए सब के सब श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ पैदल ही गए। कौरवों को आया देख यादव क्रोध से भर गए और उन्होंने शीघ्र ही युद्ध के लिए नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र ले लिए। तब समस्त कौरवों ने उनसे कहा हम लोग युद्ध के लिए नहीं आए हैं। हम भगवान श्रीकृष्ण का शुभ दर्शन करेंगे, जो समस्त दु:खों का नाश करने वाला है।
उनकी यह बात सुनकर यादवों को आश्चर्य हुआ। उन्होंने कौरवों की वह सारी चेष्टा भगवान श्रीकृष्ण को बताई। नरेश्वर ! तब श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर वह श्रेष्ठ यादव वीरों ने निहत्थे आए हुए कौरवों को प्रेमपूर्वक बुलाया। श्रीकृष्ण के बुलाने पर वे उनके पास गए। उन सबके मुख लज्जा से नीचे को झुके हुए थे। उन्होंने पृथक–पृथक प्रणाम करके कहा ।
सबसे पहले आचार्य द्रोण बोले– जगदीश्वर श्रीकृष्ण ! भद्र ! मेरी रक्षा कीजिए। आपकी माया से मोहित हुए इन कौरवों को भी बचाइये ।[1]
कृपाचार्य बोले- मधुसूदन ! कैटभनाशन लोकनाथ मेरे जन्म का यही फल है, यही हमारी प्रार्थनीय वस्तु है और यही मुझ पर आपका अनुग्रह है कि आप मुझे अपने भृत्य के भृत्य के परिचारक के दास के–दास के दास का–दास मान कर इसी रूप में याद रखें ।[2]
कर्ण ने कहा– माधव ! मेरा धन अपने भक्त के लिए क्षीण हो, अर्थात उन्हीं के काम आवे। मेरा यौवन अपनी ही पत्नी के उपयोग में आवे तथा मेरे प्राण अपने स्वामी के कार्य में ही चले जाएं और अंत में आप मेरे लिए प्राप्तव्य वस्तु के रूप में शेष रहें ।[3]
भूरि बोले- वरद ! नाथ ! हम आपसे कोई ऐसी वस्तु मांग रहे हैं जो दूसरों से नहीं मिल सकती। यदि आपकी मुझ पर सुमुखी दिव्य दृष्टि है तो वही दीजिए। देव ! हमने आज विवश होकर आपके सामने यह अंजलि बांधी है। जन्मान्तर में भी मेरी यह अंजलि आपके सामने इसी प्रकार बंधी रहे ।[4]
दुर्योधन ने कहा– मैं धर्म को जानता हूँ, किंतु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है। मैं पाप को भी समझता हूं, किंतु उससे निवृत्त नहीं हो पाता हूँ। कोई देवता मेरे हृदय में बैठकर मुझे जिस काम में लगाता है, मैं वही काम करता हूँ। मधुसूदन ! यंत्र के गुण–दोष से प्रभावित न होकर मुझे क्षमा कीजिए। मैं यंत्र हूँ और आप मंत्री हैं (गुण–दोष का उत्तरदायी यंत्री ही होता है, यंत्र नहीं ), अत: आप मुझे दोष न दीजिएगा ।[5]
भीष्ण बोले- योगीन्द्र ! जिन्हें गोपियों ने रागान्ध होकर चूमा है, योगीन्द्र और भोगीन्द्र (शेषनाग जिनका मन से सेवन करते हैं तथा जो कुछ–कुछ लालकमल के समान कोमल हैं, उन्हीं आफके इन चरणों के लिए मेरी यह अंजलि जुड़ी हुई है।[6]
विदुर ने कहा– जो लोग छोटे बालक की भाँति ब्रह्मा का परिपालन करते हैं, अर्थात जैसे माता–पिता बच्चे की सदा संभाल रखते हैं, उसी तरह जो निरंतर ब्रह्म–चिंतन में लगे रहते हैं, उनके शुभाशुभ कर्म वैसे ही हैं, जैसे बेचने वालों की वस्तुएँ। तात्पर्य यह है कि जैसे बिकी हुई वस्तु पर विक्रेता का स्वत्व नहीं होता उसी प्रकार अपने द्वारा किए गए शुभारंभ कर्म पर ब्रह्मनिष्ठ पुरुष अहंता–ममता का भाव नहीं रखते हैं।
(अत: उनके वे कर्म बंधन कारक नहीं होते हैं) ब्रह्म कैसा है ? इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि वह दैत्य, देवता और मुनियों के लिए मन से भी अगम्य है। वेद नेति–नेति कह कर उसका वर्णन करता है। किंतु उसको जान नहीं पाता। (प्रभो ! वह ब्रह्म आप ही हैं) ।[7]
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! शरण में आए हुए कौरवों के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हो मेघ के समान गंभीर वाणी में उनसे बोले ।
श्रीकृष्ण ने कहा– आर्य पुरुषों ! मेरी बात सुनिए। मैं नारदजी से प्रेरित होकर यहाँ युद्ध रोकने के लिए ही आया हूँ। मेरे पुत्र निरंकुश (स्वच्छंद) हो गए हैं, अत: मेरी आज्ञा नहीं मानते हैं। ये बड़े–बड़े लोगों का अपराध कर बैठते हैं, जो बड़ा भारी दोष है। आप लोग धन्य और माननीय हैं कि हमसे मिलने के लिए आए हैं। मेरे पुत्रों ने जो कुछ किया है वह सब आप लोग क्षमा कर दें। वीरों ! उग्रसेन का घोड़ा आप लोग कृपापूर्वक छोड़ दें और इसकी रक्षा करने के लिए आप लोग भी चलें, अवश्य चलें। यादव और कौरव तो मित्र हैं। पहले से चले आते हुए प्रेम–संबंध को दृष्टि में रखकर इन्हें आपस में कलह नहीं करना चाहिए ।
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने जब मीठे वचनों द्वारा संतोष प्रदान किया तब कौरवों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ बहुमूल्य भेंट सामग्री सहित अश्व को लौटा दिया। राजन् ! घोड़ा लौटाकर अन्य सब कौरव तो मन ही मन खेद का अनुभव करते हुए अपने नगर में चले गए। परंतु भीष्मजी ने यादव सेना के साथ अश्व की रक्षा के लिए जाने का विचार किया ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘हस्तिनापुर विजय’ नामक पचासवां अध्याय पूरा हुआ ।
1. पूर्वं द्रोण उवाचाथ कृष्ण भद्र जगत्पते। रक्ष मां कौरवान् रक्ष मायया तव मोहितान्।। 32।।
2. कृपाचार्य उवाच –
मज्जन्मन: फलमिदं मधुकैटभारे मत्प्रार्थनीयमदनुग्रह एष एवं। त्वद्भृत्यभृत्यपरिचारकभृत्यभृत्यभृत्स्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ।।
3. कर्ण उवाच -
भक्तस्यार्थे धनं क्षीणं स्वदारागतयौवनम्। स्वामिकार्ये गता: प्राणा अन्ते तिष्ठ माधव:।। 34।।
4. भूरिरुवाच –
याचामहे वरद किंचिदनन्यलभ्यं नाथ प्रसीद सुमुखी यदि दिव्यदृष्टि:। अस्माभिरकञ्जलिरयं वेवशैर्निवद्ध एषऐव मे भवतु देव भवान्तरेऽपि।। 35।।
5. दुर्योधन उवाच –
जानामि धर्म न च मे प्रवृत्तिर्जानामि पापं न च मे निवृत्ति:।
केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।। 36।।
यंत्रस्य गुणदोषेण क्षम्यतां मधुसूदन।
अहं यंत्रो भवान् यन्त्री मम दोषो न दीयताम्।। 37।।
6. भीष्ण उवाच –
रागान्धगोपीजनचुम्बताभ्यां योगीन्द्रभोगीन्द्रनिषेविताभ्याम्।
आताम्रपंखेरूहलकोमलाभ्यां ताभ्यां पदाभ्यामयमञ्जिलर्मे।। 38।।
7. विदुर उवाच –
आस्तेऽतिविक्रयकृतां सुकृतानि तानि ये ब्रह्म बालमिव तत्परिपालयन्ति।
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