10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 51 || यादवों का द्वैतवन में राजा युधिष्ठिर से मिल कर घोड़े के पीछे–पीछे अन्यान्य देशों में जाना तथा अश्व का कौन्तलपुर में प्रवेश

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 51 || यादवों का द्वैतवन में राजा युधिष्ठिर से मिल कर घोड़े के पीछे–पीछे अन्यान्य देशों में जाना तथा अश्व का कौन्तलपुर में प्रवेश

श्रीगर्गजी कहते हैं– नृपेश्वर ! तत्पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण यादवों की रक्षा करके सबसे मिलजुल कर रथ के द्वारा कुशस्थलीपुरी को चल दिए। उनके चले जाने पर अनिरुद्ध ने अश्व का यत्नपूर्वक पूजन किया और विजय यात्रा के लिए पुन: उसे बंधन मुक्त कर दिया। छूटने पर वह घोड़ा अनेकानेक देशों को देखता हुआ तीव्र गति से आगे बढ़ा। राजेंद्र ! उसके पीछे वृष्णिवंशी यादव भी वेगपूर्वक चले। दुर्योधन की पराजय सुनकर दूसरे–दूसरे भूपाल महाबली श्रीकृष्ण के भय से अपने राज्य में आने पर भी उस घोड़े को पकड़ न सके ।

तदनंतर यज्ञ का वह घोड़ा इधर–उधर देखता–सुनता हुआ द्वैत वन में जा पहुँचा, जहाँ राजा युधिष्ठिर भाइयों और पत्नी के साथ वनवास करते थे। उस द्वैतवन में भीमसेन प्रतिदिन हाथियों के समुदायों के साथ उसी तरह क्रीड़ा करते थे, जैसे बालक खिलौनों से खेलता है। उन्होंने वहाँ उस घोड़े को देखा। वह वन बड़ा ही विशाल और घना था। बरगद, पीपल, बेल, खजूर, कटहल, मौलसिरी, छितवन, तिंदुक, तिलक, साल, तमाल, बेर, लोध, पाटल, बबूल, सेमर, बांस और पलाश आदि वृक्षों से भरा था। उस दुर्जन–निर्जन वन में, जहाँ सूअर, हिरण, व्याघ्र, भेड़िए और सर्प रहते थे, जिसमें गीध और चील आदि पक्षी रहा करते थे, बांबी से आधा शरीर निकाले हुए अगणित सर्प भरे थे, सियार, वानर, भैंसे, नीलगाय आदि जिसे वन की शोभा बढ़ाते थे तथा राजन् ! गवय, हाथी, भालू, बलाव और वनमानुष आदि के रहने से जो बड़ा भयंकर प्रतीत होता था, उस वन में उस घोड़े को आया हुआ देख भयानक पराक्रमी भीमसेन ने उसका केश पकड़ लिया। नरेश्वर ! भाल पत्र सहित उस अश्व को अनायास ही काबू में करके किसने इसे छोड़ा है, ऐसी बात कहते हुए वे उसे लेकर धीरे-धीरे आश्रम की ओर चले ।

राजन् ! उसी समय उस वन में यज्ञ संबंधी अश्व बड़े कष्ट से अवलोकन करते अनिरुद्ध आदि समस्त यादव वहाँ आ पहुँचे। घोड़े को पकड़ा गया देख वे आपस में कहने लगे- अहो ! यह वनेचर तो भीमसेन के समान दिखाई देता है। बड़ी–बड़ी बांहें, अत्यंत पुष्ट शरीर, बहुत ऊँचा कद, लाल आंखे और महान गौरवर्ण– सब उन्हीं के समान हैं। यह कठिनाइयों को झेलने में समर्थ है। इसके सारे अंग में धूल लिपटी हुई है तथा इसने भीम की ही भाँति गदा भी ले रखी है। परस्पर ऐसी बातें करते हुए वे सब लोग फिर उस वनेचर से बोले ।

अरे भाई ! तुम कौन हो ? राजाधिराज के इस अश्व को लेकर कहाँ जाओगे ? अत: शीघ्र इसे छोड़ दो, नहीं तो हम लोग तुम्हें बाणों से मारेंगे ।

उनकी यह बात सुनकर भीम ने घने जंगल में घोड़े को बांध दिया और दस हजार भार लोहे की बनी हुई अपनी भारी गदा लेकर वे उनके सामने गए। पराक्रमी भीम ने संग्राम में यादव–सैनिकों को गदा से मारना आरंभ किया। भीम की चोट जिन पर पड़ी, वे सब यादव वहीं ढेर हो गए। उस वनेचर का पराक्रम देख अनिरुद्ध कुपित हो उठे। उन्होंने अपने उस शत्रु के ऊपर एक हजार मतवाले हाथी हांक दिए। वे हाथी क्या थे, दिग्गज थे और पर्वत के शिखर के समान दिखाई देते थे। उन्होंने भीमसेन को पृथ्वी पर पटक दिया और दांतों से दबाना आरंभ किया। यह देख भीमसेन सहसा उठ कर खड़े हो गए और क्रोध से उनके ओठ फड़कने लगे। उन्होंने अपनी वज्र सरीखी गदा से उन मतवाले हाथियों को पीटना आरंभ किया। किन्ही को उठाकर आकाश में फेंक दिया और कितनों को वहीं पृथ्वी पर दे मारा। कुछ हा‍‍‍थियों को उन्‍होंने पैरों से मसल दिया और कितनों को उठाकर दूसरे हाथियों पर फें‍क दिया। फिर तो सारे हाथी भय से व्याकुल हो भागने लगे।

तब अत्यंत कुपित हो गदाधारी गद वहाँ आ पहुँचे। निकट जाकर उन्होंने भीमसेन को पहचान लिया। फिर मन में शंका बनी रही। अत: उन्होंने नमस्कार करके पूछा– हे वीर ! तुम कौन हो ? यह मेरे सामने ठीक–ठीक बताओ ।

वे बोले– हे गद ! मैं भीमसेन हूँ। हमारे शत्रु दुर्योधन ने हमें जुए में जीतकर नगर से निकाल दिया। यहाँ से एक योजन की दूरी पर भाइयों सहित युधिष्ठिर वनवास करते हैं। देखो न, यह भगवान की कैसी विचित्र माया है। वन में निवास करते हुए आठ वर्ष बीत गए हैं। अभी चार वर्ष शेष हैं। इसके बाद हमें पुन: एक वर्ष तक अज्ञात वास करना होगा। अर्जुन इंद्र के बुलाने से स्वर्गलोक में गए हैं। मैं नहीं जानता कि वे इस भूतल पर कब तक लौटेंगे। गद ! तुम हमें यादवों का कुशल समाचार बताओ। यह किस राजा का घोड़ा है ? और तुम लोग किसलिए यहाँ आए हो ? ऐसा कहकर भीमसेन दुर्योधन के दिए हुए क्लेशों को याद करके दु:खी हो अश्रुधारा बहाते हुए रोने लगे ।

उनकी ये बातें सुनकर गद भी दु:खी हो गए और भीम को आश्वासन देकर उन्होंने सारी बातें विस्तारपूर्वक कह सुनाईं। वह सब सुन कर भीम सेन को बड़ी प्रसन्नता हुई और वे अनिरुद्ध आदि श्रेष्ठ यादव वीरों को साथ लेकर धर्मनंदन युधिष्ठिर के समीप गए। राजन् ! यादवों का आगमन सुनकर अजातशत्रु युधिष्ठिर को बड़ा हर्ष हुआ और वे नकुल आदि के साथ उनकी अगवानी के लिए आश्रम से बाहर निकले। नरेश्वर ! समस्त यादवों ने उनके चरणों में प्रणाम किया और युधिष्ठिर ने उन्हें उत्तम आशीर्वाद दे बड़ी प्रसन्नता के साथ उन सबको द्वैतवन में ठहराया। राजा युधिष्ठिर सूर्यदेव की दी हुई बटलोई के प्रभाव से वहाँ आए हुए सब अतिथियों को यथायोग्य उनकी रुचि के अनुरूप भोजन दिया। परंतप ! वहाँ एक रात रह कर प्रात:काल प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्ध पाण्डवों को यज्ञ का निमंत्रण दे, घोड़े को मुक्त कराकर यादवों के साथ वहाँ से शीघ्र चल दिए और घोड़े के पीछे–पीछे सारस्वत देशों में गए ।

राजन् ! बहुत से वीर–विहीन देशों को छोड़ कर वह अश्वराज इच्छानुसार विचरता हुआ कौन्तलपुर में गया। महाराज ! उस नगर में चंद्रहास नामक वैष्णव राजा राज्य करता था, जो केरल देश के राजा का पुत्र था और कुलिन्द ने उसका पालन किया था। वह भगवान श्रीकृष्ण के प्रसाद से वहाँ राज्य करता था। राजन् ! भक्त चंद्रहास की कथा जैमिनी महाभारत में वर्णित है। नारदजी ने अर्जुन के सामने चंद्रहास के जीवन वृत्त का विस्तारपूर्वक वर्णन किया था। उस कौन्तलपुर में सब लोग श्रीकृष्ण के भक्त होकर रहते हैं। वे सब के सब ब्राह्मण भक्त, पुण्य परायण, पर स्त्री परांगमुख, अपनी ही पत्नी में अनुराग रखने वाले सतत श्रीकृष्ण की समाराधना में संलग्न रहने वाले थे। वे गोविंद की गाथाएँ और पुराण कथा सुनते तथा बड़े आनंद से श्रीराधा और माधव के नाम जपते थे।

वहाँ के द्विज दो ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण करते, तुलसी की मालाएँ पहनते और गोपी चंदन, केसर तथा हरित चंदन से चर्चित रहते थे। वे सब ललाट में श्याम बिंदु धारण करते, उनमें से कोई ही कोई ऐसे थे, जो श्री तिलक लगाते थे। वहाँ के सभी वैष्णव बारह तिलक और आठ मुद्राएँ धारण करते थे। ब्राह्मण आदि वर्ण के गृहस्थ लोग प्रतिदिन प्रात:काल गोपी चंदन से युक्त शीतल मुद्रा धारण करते थे। कोई-कोई विरक्त और संन्यासी साधु अग्नि संस्कार के लिए तप्तमुद्रा धारण करते थे। उस नगर मे इधर–उधर देखता हुआ वह घोड़ा राजभवन में जा पहुँचा, जहाँ राजा चंद्रहास चंद्रमा के समान शोभा पाता था ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘अश्व का कौन्तलपुर में गमन’ नामक इक्यावनवां अध्याय पूरा हुआ ।



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