10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 52 || श्यामकर्ण अश्व का कौन्तलपुर में जाना और भक्तराज चंद्रहास का बहुत सी भेंट सामग्री के साथ अश्व को अनिरुद्ध की सेवा में अर्पित करना और वहाँ से उन सबका प्रस्थान

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 52 || श्यामकर्ण अश्व का कौन्तलपुर में जाना और भक्तराज चंद्रहास का बहुत सी भेंट सामग्री के साथ अश्व को अनिरुद्ध की सेवा में अर्पित करना और वहाँ से उन सबका प्रस्थान

श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन् ! वहाँ आए हुए घोड़े को देखकर व्रजचंद्र श्रीकृष्ण के दास राजा चंद्रहास ने उसे तत्काल पकड़ लिया और प्रसन्नतापूर्वक उसके भाल पत्र को पढ़ा। नरेश्वर ! उस पत्र को पढ़कर उस महाभगवद्भक्त नरेश ने कहा- अहो ! बड़े सौभाग्य की बात है कि मैं आज भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र को अपने नेत्रों से देखूंगा। पता नहीं, पूर्वकाल में मेरे द्वारा कौन सा ऐसा पुण्य बन गया है, जिससे मुझे श्रीकृष्ण तुल्य यदुकुल तिलक अनिरुद्ध के दर्शन का अवसर मिल रहा है। मैंने आज तक माया से मानव शरीर धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं किया है। इसलिए मैं प्रद्युम्न कुमार के साथ द्वारका जाऊँगा और वहाँ श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न तथा उन महाराज उग्रसेन का भी दर्शन करूँगा, जो भगवान श्रीकृष्ण से भी पूजित हैं ।

ऐसा कहकर राजा चंद्रहास गंध, पुष्प, अक्षत आदि उपचार, दिव्य वस्त्र, दिव्य रत्न और उस घोड़े को भी साथ लेकर माला–तिलक से सुशोभित समस्त पुरजनों सहित अनिरुद्ध का दर्शन करने के लिए नगर से बाहर निकला। गीत और बाजों की मंगलमयी ध्वनि के साथ राजा पैदल ही गया ।

नरेश्वर ! नागरिकों सहित राजा को आया देख अनिरुद्ध को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे मंत्री उद्धव से पूछने लगे ।

अनिरुद्ध ने कहा– महामंत्रिन ! यह कौन राजा है, जो समस्त पुरवासियों के साथ हमसे मिलने के लिए आया है ? आप इसका वृत्तांत हमें बतावें ।

उद्धव बोले– प्रद्युम्न कुमार ! यह केरल के राजा का पुत्र चंद्रहास नामक नरेश है। इसके माता–पिता बचपन में ही परलोकवासी हो गए, अत: कुलिन्द ने इसका पालन किया है। यह बाल्यावस्था से ही भगवान श्रीकृष्ण का भक्त है और उन्होंने ही इसकी रक्षा की है। दुष्टबुद्धि वाले मंत्री की पुत्री के साथ इसने विवाह किया है। कुंतल देश के राजा इसे अपना राज्य देकर वन में चले गए थे। उस राजा का वृत्तांत मैंने द्वारका में श्रीकृष्ण के ही मुख से सुना था। उसे दर्शन देने के लिए भगवान श्रीकृष्ण स्वयं यहाँ पधारेंगे ।
 
उद्धव की यह बात सुनकर यादव प्रवर अनिरुद्ध चकित हो गए। समस्त पुरवासियों से घिरे हुए राजा चंद्रहास ने अनिरुद्ध के निकट जाकर श्यामकर्ण घोड़ा दिया और प्रसन्नतापूर्वक बहुत धन राशि भी भेंट की। पचास हजार हाथी, एक लाख रथ, एक करोड़ घोड़े, एक हजार स्वर्ण मुद्राएं, एक हजार गवय, एक हजार शिविकाएँ, दस लाख धेनु, दस हजार प्रत्यंचा, एक करोड़ भर सोना, चार करोड़ भर चांदी और एक लाख आभूषण– उस राजा ने माधव अनिरुद्ध को भेंट में दिए ।

चंद्रहास ने कहा– जो समस्त देवताओं में श्रेष्ठ, श्रीकृष्ण पौत्र, लोकेश्वर, प्रद्युम्न पुत्र, यदुकुल तिलक तथा पूर्ण परमात्मदेव हैं, उन अनिरुद्ध को बारंबार मेरा नमस्कार है।

भक्त का यह वचन सुनकर प्रसन्न हुए प्रद्युम्न कुमार ने उसकी प्रशंसा करके उसे एक दैदीप्यामान रत्नमाला अर्पित की। राजेंद्र ! चंद्रहास ने अपने राज्य पर मंत्री को नियुक्त करके अपने नगर से यादवों के साथ जाने का विचार किया। वे समस्त श्रेष्ठ यादव उस नगर मं एक रात रहकर प्रात:काल चंद्रहास के साथ वहाँ से प्रस्थित हो गए। भाल पत्र से सुशोभित घोड़ा उनके आगे–आगे चला और सैकड़ों आवर्तों (भंवरों) से व्याप्त सप्तवती के पास जा पहुँचा। वह नदी अपनी तरंगों से तटभूमि को तोड़ रही थी। उसका वेग बहुत प्रबल था और उसे पार करना सबके लिए कठिन था। उसके किनारे बहुत सी नौकाएँ बंधी थीं। उस नदी का दर्शन करके वीर प्रद्युम्न नंदन अनिरुद्ध ने सौ अक्षौहिणी सेना के साथ उसके पार जाने का विचार किया ।

नृपश्रेष्ठ ! अनिरुद्ध पहले साम्ब आदि से घिरकर हाथी पर सवार हुए और नाव छोड़कर उन्होंने नदी के जल में प्रवेश किया। पहले तो उसका जल उस सेना से मथित होकर गँदला हो गया। फिर वह नदी पंकिल भूमि मात्र रह गई। यह विचित्र घटना घटित हुई। समस्त यादव हंसते हुए बड़े विस्मय में पड़ गए ।

तदनंतर वह घोड़ा धीरे–धीरे आगे बढ़ा और जाते–जाते जहाँ सिंधु नदी एवं समुद्र के मध्य में नारायण सरोवर है, वहाँ पहुँच गया। वह प्यास से व्याकुल हो रहा था। उसने उस तीर्थ का जल पिया। इतने में ही अनिरुद्ध आदि समस्त यादव वहाँ आ गए। उन्हें मार्ग में धर्मद्वेषी नीच म्लेच्छा से लोहा लेना पड़ा और उन्हें परास्त करके वे वहाँ आए थे। वहाँ घोड़े को देखकर उन सबने नारायण सरोवर में स्नान किया ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में बावनवां अध्याय पूरा हुआ ।

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