10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 53 || उद्धव की सलाह से समस्त यादवों का द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान तथा अनिरुद्ध की प्रेरणा से उद्धव का पहले द्वारकापुरी में पहुँचकर यात्रा का वृत्तांत सुनाना

10. अश्‍वमेध खण्‍ड || अध्याय 53 || उद्धव की सलाह से समस्त यादवों का द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान तथा अनिरुद्ध की प्रेरणा से उद्धव का पहले द्वारकापुरी में पहुँचकर यात्रा का वृत्तांत सुनाना

श्रीगर्गजी कहते हैं- महाराज ! राजा उग्रसेन का घोड़ा बड़े–बड़े वीर नरेशों का दर्शन करता तथा भारतवर्ष में विचरता हुआ अन्यान्य राज्यों में गया। प्रजानाथ ! इस तरह भ्रमण करते हुए उस अश्व को बहुत काल व्यतीत हो गया और फाल्गुन का महीना आ पहुँचा। जो सबको घर की याद दिलाने वाला है। फाल्गुन मास आया हुआ देख अनिरुद्ध शंकित हो गए और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ मंत्रि प्रवर उद्धव से बोले ।

अनिरुद्ध ने कहा– मंत्रि प्रवर ! यादवराज उग्रेसन चैत्र में ही यज्ञ करेंगे। हम लोग क्या करें ? अब अधिक दिन शेष नहीं रह गए हैं। इस भूतल पर अश्व का अपहरण करने वाले राजा कितने शेष रह गए हैं। मैं सुनना चाहता हूँ, आप शीघ्र उनके नाम बतावें ।

उद्धव बोले- हरे ! अब भूतल पर या आकाश में अश्व का अपहरण करने वाले शूरवीर शेष नहीं रह गए हैं। इसलिए अब तुम सोने के हारों से अलंकृत द्वारवाली यादवों की द्वारकापुरी को चलो ।

उनकी यह बात सुनकर अनिरुद्ध को बड़ा हर्ष हुआ। राजन् ! अनिरुद्ध ने अश्व के आगे भी उद्धवजी की कही हुई बात दोहराई। इस प्रकार अनिरुद्ध का कथन सुनकर वह सर्वज्ञ अश्व उसी तरह शीघ्रतापूर्वक द्वारका को चल दिया। जैसे लंका से लौटे हुए हनुमानजी बड़े वेग से किष्किन्धापुरी में आए थे। नरेश्वर ! उसके पीछे–पीछे भानु और साम्ब आदि शूरवीर वायु तथा मन के समान वेगशाली घोड़ों द्वारा दौड़ने लगे। उन सब लोगों में अश्व के अपहरण की आशंका से उनको पकड़कर सोने की रस्सियों से बांध दिया और उसे सेना के बीच में करके अपनी पुरी की ओर प्रस्थान किया ।

गाजे–बाजे की आवाज के साथ दुंदुभियाँ बजाते, पृथ्वी को कंपित करते तथा दुष्ट शत्रुओं के मन में त्रास भरते हुए यादवगण आगे बढ़ रहे थे। यादवों के साथ जाते हुए उस घोड़े को देखकर नारदजी नया कलह या विवाद खड़ा करने के लिए दूत की भाँति इंद्र के पास गए। उनके सामने घोड़े का वृत्तांत उन्होंने विस्तारपूर्वक कहा- राजेंद्र ! वह वृत्तांत सुनकर इंद्र ने उस घोड़े को चुरा ले जाने का विचार किया। वे शीघ्र ही अदृश्य होकर अश्व को देखने के लिए भूतल पर आए। अहो ! भगवान विष्णु की माया से सब देवता भी मोहित रहते हैं। कुबेर, ब्रह्मा और इंद्र आदि भी जब भगवान की माया से मोहित हो जाते हैं तब भूतल के साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है। इंद्र ने वहाँ जाकर वृष्णिवंशियों की संपूर्ण सेना का निरीक्षण किया, वह सेना प्रलयकाल के समुद्र की भाँति भयंकर तथा करोड़ों शूरवीरों से भरी हुई थी। यादवों की उस अद्भट एवं विशाल सेना को देखकर इंद्र डर गए। राजन् ! श्रीकृष्ण के भय से देवेंद्र अविलम्ब इन्द्रावती पुरी को लौट गए। यह भगवान श्रीकृष्ण की कृपा थी, जिससे उन्होंने युद्ध की आशा छोड़कर चुपचाप बैठे रहने की नीति अपनाई ।

अनेक चतुरंगिणी टुकड़ियों से युक्त हो यात्रा करती हुई महात्मा अनिरुद्ध की वह विशाल सेना हाथियों, रथों, घोड़ों और पैदल वीरों के द्वारा स्वर्गलोक में इंद्र की सेना के समान सुशोभित हो रही थी। संपूर्ण हाथी अलग हो गए, रथ, घोड़े और पैदल भी अलग–अलग होकर चलने लगे। श्रीकृष्ण के पुत्रगण हर्षोल्लास से भर कर द्वारका के पथ का अनुसरण कर रहे थे। वे जम्बूद्वीप के विजेता थे और लोक–परलोक दोनों पर विजय पाना चाहते थे। राजन् ! वे श्रेष्ठ यादव अग्रगामी वाहन–श्याम कर्ण अश्व को आगे करके भाँति-भाँति के बाजे बजाते तथा नाच गान आदि उत्सव करते हुए जा रहे थे ।

नरेश्वर ! साम्ब आदि श्रीकृष्ण पुत्रों तथा इंद्रनील एवं चंद्रहास आदि सहस्रों भूपालों से विभूषित हो अनिरुद्ध ने आनर्तदेश में प्रवेश करके साम्ब की अनुमति से उद्धवजी को द्वारका भेजा, अभी वह पुरी वहाँ से दो योजन दूर थी। उनके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो उद्धवजी उन रुक्मवती कुमार अनिरुद्ध को नमस्कार करके शीघ्र ही एक शिविका पर आरूढ़ हुए और हर्षपूर्वक पुरी की ओर चल दिए, जहाँ मुनियों से घिरे हुए महाराज उग्रसेन सभा मंडप से भूषित श्रेष्ठ पिण्डारक क्षेत्र में निवास करते थे।

राजन् ! जहाँ वसुदेव आदि बलराम और श्रीकृष्ण आदि तथा बलवान प्रद्युम्न आदि प्रतिदिन यज्ञ की रक्षा करते थे। वहाँ उद्धवजी राजसभा में गए। उन्होंने यादवेंद्र उग्रसेन को प्रणाम करके वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण तथा प्रद्युम्न आदि समस्त यादवों को यथा योग्य प्रणाम किया और उनके सामने खड़े हो गए। उन्हें देख कर सबका मन प्रसन्न हो गया। फिर उनके पूछने पर उद्धव ने सब वृत्तांत बताया ।

उद्धव बोले- राजेंद्र ! आपका श्याम कर्ण अश्व निर्विघ्न लौट आया। अनिरुद्ध आदि श्रेष्ठ यादव भी कुशलपूर्वक आ गए हैं। गोविंद की कृपा से राजा इंद्रनील और हेमांगद आए हैं। स्त्री राज्य की साम्राज्ञी सुरूपा भी आ पहुँची हैं। भीषण सहित बक भी युद्ध में परास्त हुआ है। बिन्दु और अनुशाल्व– ये दो वीर अपने–अपने नगर से पधारे हैं। पाञ्चजन्य नामक उपद्वीप में असुरों सहित बल्वल को जीत लिया गया है। उस युद्ध में भगवान शंकर ने रुष्ठ होकर अनिरुद्ध और सुनंदन का वध कर दिया था तथा और भी बहुत से यादव मार डाले थे, किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने वहाँ पहुँचकर समस्त यादवों को जीवन दान दिया। अत: यह ध्यान देने योग्य है कि श्रीकृष्ण की कृपा से ही हम सब लोग कुशल लौटे हैं।

समस्त कौरव परास्त हो गए और भीष्मजी हमारे साथ ही यहाँ पधारे हैं। हमने द्वैतवन में दुख पीड़ित पाण्डवों को देखा और व्रज में श्रीकृष्ण विरह से व्याकुल गोपगणों का भी दर्शन किया। जो बाल्यावस्था से ही भगवान श्रीकृष्ण का भक्त है, वह राजा चंद्रहास भी हमारे साथ यहाँ आया है और भी बहुत-से भूपाल आपके भय से यहाँ आए हैं ।

श्रीगर्गजी कहते हैं- महाराज ! उद्धवजी के मुख से इस प्रकार श्रीकृष्ण के गुणों का गान सुनकर यादवेश्वर उग्रसेन प्रेम से विह्वल हो कुछ बोल न सके। वे आनंद के महासागर में मग्न हो गए। उन्होंने उद्धव को मणिमय हार दिया। रत्न, वस्त्र, अंबिका, हाथी, घोड़े और रथ भी दिए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने शीघ्र ही उठकर हर्षोल्लास से पूरित हो भरी सभा में मित्र उद्धव से मिलकर उन्हें हृदय से लगा लिया। इसके बाद हर्ष से भरे हुए उग्रसेन ने गोविंद से कहा– श्रीकृष्ण तुम यादवों के साथ अनिरुद्ध को ले आने के लि‍ए जाओ ।

इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘उद्धव का आगमन’ नामक तिरपनवां अध्याय पूरा हुआ ।


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