10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 54 || वसुदेव आदि के द्वारा अनिरुद्ध की अगवानी, सेना और अश्व सहित यादवों का द्वारकापुरी में लौटकर सबसे मिलना तथा श्रीकृष्ण और उग्रसेन आदि के द्वारा समागत नरेशों का सत्कार
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 54 || वसुदेव आदि के द्वारा अनिरुद्ध की अगवानी, सेना और अश्व सहित यादवों का द्वारकापुरी में लौटकर सबसे मिलना तथा श्रीकृष्ण और उग्रसेन आदि के द्वारा समागत नरेशों का सत्कार
श्रीगर्गजी कहते हैं- नरेश्वर ! तदनंतर उग्रसेन के आदेश से वसुदेव आदि समस्त श्रेष्ठ यादव विजय यात्रा से लौटे हुए अनिरुद्ध को लाने के लिए द्वारकापुरी से निकले। वे हाथी, घोड़ों, रथों और शिविकाओं पर बैठे थे। नृपेश्वर ! उनके साथ बलदेव श्रीकृष्ण आदि प्रद्युम्न आदि तथा उद्धव आदि हाथी पर आरूढ़ हो श्याम कर्ण अश्व को देखने के लिए निकले। नृपश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण और बलराम की माता ने देवकी आदि नारियाँ विचित्र शिविकाओं पर बैठ कर नगर से निकलीं। भगवान श्रीकृष्ण की जो रुक्मणि और सत्यभामा आदि पटरानियाँ तथा सोलह हजार अन्य रानियाँ थीं। वे सब की सब शिविकाओं पर आरूढ़ हो उन लोगों के साथ गईं।
नृपेश्वर ! बहुत सी कुमारियाँ हाथियों पर बैठकर लावा, मोती और फूलों की वर्षा करने के लिए शीघ्रतापूर्वक गईं। पनिहारिनें (पानी ढोने वाली स्त्रियाँ) जल से भरे हुए कलश लेकर निकलीं। सौभाग्यवती ब्राह्मण पत्नियां गन्ध, पुष्प, अक्षत और दूर्वांकुर ले कर गईं। रूपवती वारांगनाएं सब प्रकार के श्रृंगारों से सुशोभित हो श्रीहरि के गुणों का गान करती हुईं नृत्य करने के लिए निकलीं। समस्त यादव शंखनाद, दुंदुभियों के शब्द और वेदमंत्रों के घोष के साथ एक गजराज को आगे करके गर्गाचार्य आदि मुनियों सहित अपनी पुरी की शोभा निहारते हुए गए। द्वारकापुरी ध्वजा पताकाओं से अलंकृत थी। उसकी सड़कों पर सुशोभित जल का छिड़काव किया गया था। पुरी का प्रत्येक भवन केले के खंभों और बंदनवारों से शोभित था। रत्नमय दीपों और भाँति-भाँति के चँदोवों से द्वारकापुरी उद्दीप्त हो रही थी। वहाँ की दिव्य नारियाँ और दिव्य पुरुष सुनहरे रंग के पीताम्बर धारण किए नगर की शोभा बढ़ाते थे। पक्षियों के कलरव और अगूरू की गंध से व्याप्त धूमजाल से श्रीकृष्ण की वह नगरी इंद्र की अमरावतीपुरी के समान सुशोभित थी ।
इस तरह नगरी की शोभा सज्जा का अवलोकन करते हुए यादव शीघ्र उस स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ श्याम कर्ण अश्व सहित अनिरुद्ध सेना से घिरे हुए विराजमान थे। उन गुरुजनों को आए देख अनिरुद्ध अपने रथ से उतर गए। और यज्ञ संबंधी अश्व को आगे करके अन्यान्य नरेशों के साथ पैदल ही चलने लगे। पहले उन्होंने यदुकुल के आचार्य गर्गमुनि को नमस्कार किया। तत्पश्चात् वसुदेव बलराम, श्रीकृष्ण और अपने पिता प्रद्युम्न के प्रणाम करके वह अश्व को अन्हें अर्पित कर दिया। उन सब लोगों ने प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण हृदय से अनिरुद्ध को शुभाशीर्वाद दिया और कहा– वत्स ! तुमने बड़ा अच्छा किया कि समस्त शत्रु नरेशों को जीतकर यज्ञ संबंधी अश्व को एक वर्ष के भीतर ही यहाँ ला दिया ।
उन सबका यह वचन सुनकर अनिरुद्ध मेरी ओर देखते हुए बोले– विप्रवर ! आपकी कृपा से ही मार्ग में और प्रत्येक युद्ध में बहुत से शत्रुओं द्वारा पकड़ा जाने पर भी यह अश्व उनसे छुड़ा लिया गया है। गुरु के अनुग्रह से ही मनुष्य सुखी होता है। इसलिए अपनी शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक गुरुदेव का पूजन करना चाहिए ।
इसके बाद अन्य सब भूपाल बलराम और श्रीकृष्ण के समीप आए तथा सब लोगों ने प्रसन्न एवं प्रेममग्न होकर अलग–अलग बारी बारी से उनके चरणों में प्रणाम किया। उन समस्त भूपालों को नतमस्तक देख बलराम सहित श्रीकृष्ण ने चंद्रहास, भीष्म, बिंदु, अनुशाल्व, हेमांगद और इंद्रनील आदि सबको बड़े हर्ष के साथ हृदय से लगाया। अत: श्रीकृष्ण से बढ़कर दूसरा कोई इस भूतल पर नहीं है।
नृपेश्वर ! तदनंतर उस यात्रा से विजयी होकर लौटे हुए अनिरुद्ध को हाथी पर बिठाकर वसुदेवजी समस्त यादवों और मुदित पुत्र–पौत्रों के साथ प्रसन्नतापूर्वक कुशस्थलीपुरी में गए। उस समय देवांगनाएँ उन सबके ऊपर फूलों और मकरंदों की वर्षा करने लगीं तथा हाथियों पर बैठी कुमारियों ने खीलों और मोतियों की वृष्टि की। वे सब लोग नृत्य, गान, गीत और वेद मंत्रों के घोष से सुशोभित हो, जिसकी सड़कों पर छिड़काव किया गया था उस द्वारकापुरी की शोभा निहारते हुए पिण्डारक क्षेत्र में गए, तब राजा यादवों के उस देवदुर्लभ वैभव को देख कर आश्चर्य चकित हो अपने–अपने वैभव की निंदा करने लगे।
उन्होंने यज्ञस्थल को भी देखा, जो घी की सुंगध से धूम जाल तथा ब्राह्मणों के मंत्र घोष से व्याप्त था। फिर वहाँ असिपत्र–व्रतधारी यदुकुल तिलक महाराज उग्रसेन को भी उन्होंने देखा, जो देवराज इंद्र के समान तेजस्वी, जितेंद्रिय, हृष्ट–पुष्ट और दीप्तिमान थे। वे कुशासन पर बैठे बड़े सुंदर लग रहे थे। उन्होंने नियम–निर्वाह के लिए आभूषण उतार दिए थे। हाथ में मृग का शृंग ले रखा था और अपनी रानी के साथ मृगछाला पर ही वे विराजमान थे, जो उक्त कुशासन के ऊपर बिछा था। महाराज उग्रसेन घृत, गंध और अक्षत आदि से यज्ञ मंडप में अग्नि की पूजा कर रहे थे। उनके साथ ऋषि मुनि बैठे थे और उनके नेत्र धुआं लगने के कारण लाल हो गए थे ।
अनिरुद्ध आदि यादवों ने वाहनों से उतरकर यज्ञ संबंधी अश्व को आगे करके बड़ी प्रसन्नता के साथ महाराज को पृथक–पृथक प्रणाम किया। इसके बाद यादवराज श्रीउग्रसेन ने उन समस्त नरेशों और यादवों का अपनी शक्ति के अनुसार यथायोग्य सम्मान किया। तत्पश्चात् अनिरुद्ध ने शीघ्रतापूर्वक नमस्कार करके, दोनों हाथ जोड़ कर सबके सुनते हुए उन जम्बूद्वीप के स्वामी महाराज उग्रसेन से कहा ।
अनिरुद्ध बोले- महाराज ! इनकी ओर देखिए। ये नरपतियों में श्रेष्ठ राजा इंद्रनील बड़े प्रेम से आपके चरणों में पड़े हैं, आप देवता की भाँति इन्हें उठाइये। हेमांगद, अनुशालव, बिंदु, श्री चंद्रहास तथा ये देवव्रत भीष्मजी भी आपके समीप आए हैं, आप इन पर दृष्टिपात कीजिए। ये मेरे रक्षक जाम्बवतीनंदन साम्ब पधारे हैं. इनकी ओर समस्त यादवों को भी देखिए, जो श्रीकृष्ण र देखिए। श्रीरुद्रदेव ने इनको और मुझको भी मार डाला था, किंतु परमात्मा श्रीकृष्ण ने हमें जीवनदान किया। इसी तरह रुद्र द्वारा मारे गए और श्रीकृष्ण कृपा से जीवित हुए, इन सुनंदन पर भी दृष्टिपात कीजिए औकृपा से ही यहाँ लौट कर आए हैं। निर्विघ्न लौटे हुए इस यज्ञ के घोड़े को ग्रहण कीजिए तथा आपने युद्ध के लिए जो तलवार दी थी, उसको भी ले लीजिए। आपको नमस्कार है।
अनिरुद्ध का वचन सुनकर यादवराज उग्रसेन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने उनकी प्रशंसा करके अन्यान्य नरेशों को भी यथा योग्य आशीर्वाद दिया। फिर समस्त नरेशों का पूजन करके वे देवव्रत भीष्म से बोले– भीष्मजी ! आइये और मेरे साथ हृदय से हृदय लगाकर मिलिए। यों कहकर यदुकुल तिलक उग्रसेन ने उठकर उनका गाढ़ आलिंगन किया। इसके बाद दान–मान से सम्मानित हुए वे राजा तथा यादव बड़ी प्रसन्नता के साथ द्वारकापुरी के विभिन्न गृहों में निवास करने लगे ।
नरेश्वर ! तदनंतर अनिरुद्ध को साम्ब आदि के साथ आया देख देवकी, रोहिणी, रुक्मिणी तथा रुक्मवती आदि पूजनीया स्त्रियों ने उन्हें हृदय से लगाकर बड़े हर्ष का अनुभव किया। राजन् ! सुरूपा, रोचना और ऊषा– इन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। साम्ब की प्रशंसा सुनकर दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा नेत्रों से आनंद के आंसू बहाती हुई अत्यंत हर्ष का अनुभव करने लगी। नृपश्रेष्ठ ! सेना सहित अनिरुद्ध के लौट आने से द्वारका के घर–घर में मंगलोत्सव मनाया जाने लगा ।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अंतर्गत अश्वमेध खंड में ‘यज्ञ संबंधी अश्व का द्वारका में आगमन’ नामक चौवनवां अध्याय पूरा हुआ ।
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