10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 57 || ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा-दान; पुरस्कार-वितरण; संबंधियों का सम्मान तथा देवता आदि सबका अपने अपने निवास स्थान को प्रस्थान
10. अश्वमेध खण्ड || अध्याय 57 || ब्राह्मण भोजन, दक्षिणा-दान; पुरस्कार-वितरण; संबंधियों का सम्मान तथा देवता आदि सबका अपने अपने निवास स्थान को प्रस्थान
श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन ! तदन्तर श्रीकृष्ण और भीमसेन के साथ यादवराज उग्रसेन ने ब्राह्मणों और राजाओं से प्रार्थना करके उन्हें भाँति-भाँति के पदार्थ भोजन कराये। उन्होंने ब्राह्मणों को निमंत्रित करके उत्तम शष्कुली (पूड़ी), खीर, भात, अच्छी दाल और कढ़ी, हलुवा, मालपूआ तथा सुन्दर फेणिका आदि विशेष अन्न परोसकर भलीभाँति भोजन कराया। शिखरिणी (सिखरन), घृतपूर (घेवर) सुशक्तिका (अच्छी-अच्छी साग-सब्जी), सुपटिनी (चटनी आदि), दधिकूप (दहीबड़ा) लप्सी तथा गोल, सुन्दर और चन्द्रमा के समान उज्ज्वल सोहारी आदि को बड़े, लड्डू और पापड़ के साथ परोसा। उन ब्राह्मणों में से कुछ तो फलाहारी थे, कुछ सूखे पत्ते खाने वाले थे, कोई केवल जल पीकर रहने वाले और कोई दुर्बा के रस का आस्वादन करने वाले (दुर्वासा) थे। कोई हवा पीकर रहने वाले जन्मकाल से ही तपस्वी थे। कितने तो भोजनों (भोज्य पदार्थों) के नाम तक नहीं जानते थे। जब उनके सामने भाँति-भाँति के भोजन परोसे गये, तब उन्हें देखकर वे बडे़ विस्मित हुए। कोई भात को मालती के फूल समझने लगे, कई लड़डूओं को गूलर के फल मानने लगे, किन्हीं ने खीर और फेणिका देखकर उसे चन्द्रमा का विम्ब समझा, कई ब्राह्मणों ने पापड़ फेणिका को देखकर उन्हें पलाश के पत्ते समझा और ‘मधुशीर्षक’ नामक मिष्टान्न को आम का फल मान लिया, चटनी और लप्सी देखकर कितने ही ॠषि उन्हें घिसा हुआ चन्दन समझने लगे, किते ही मुनिश्रेष्ठ मीठा चूरन या शक्कर देखकर बालू समझने लगे। इस प्रकार की भावना मन में लेकर वे सब ब्राह्मण वहाँ भोजन कर रहे थे। कोई दूध पीते और कोई दाख का रस। कोई-कोई ब्राह्मण आम का रस पीते हुए जोर-जोर से हंसते और लोट जाते थे।
तब भीमसेन के साथ भगवान कृष्ण सानन्द हंसते हुए वहाँ बैठे तपस्वी ब्राह्मणों के साथ परिहास करने लगे- ‘मुनियों ! आप जल्दी से इन भोजनों के नाम तो बताइये। आप जिनके नाम बतावेंगे, वे ही भोजन भीमसेन के साथ मैं आपके सामने प्रस्तुत करूंगा’।
श्रीकृष्ण और भीमसेन की बात सुनकर वे मुनिश्रेष्ठ कुछ बोल न सके, केवल आनन्दित होकर परस्पर एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। तैलंग, कर्णाटकी, गुजराती, गौड़ और सनाढय आदि अनेक जाति के विभिन्न ब्राह्मणशिरोमणियों का राजाधिराज उग्रसेन ने सुवर्ण, वस्त्र तथा रत्नराशियों द्वारा पूजन करके उनके चरणों में मस्तक झुकाया।
नरेश्वर ! यज्ञ के अन्त में राजा उग्रसेन ने सबसे पहले मुझे एक लाख घोड़े, एक हजार हाथी, दो हजार रथ, एक लाख धेनु और सौ भार सुवर्ण इतनी दक्षिणा विधिपूर्वक दी। मुझसे आधी दक्षिणा बकदाल्भ्य और ब्यासजी को दी। तत्पश्चात उग्रसेन ने निमंत्रित ब्राह्मणों में से प्रत्येक को प्रसन्नतापूर्वक एक हजार घोड़े, सौ हाथी, दौ सौ रथ, एक हजार धेनु और बीस भार सुवर्ण-इतनी दक्षिणा दी। राजन् ! पिर हर्ष से भरे यादवराज प्रत्येक ब्राह्मण को एक हाथी, एक रथ, एक गौ, एक घोड़ा, एक भार सुवर्ण और दो भार चांदी- इतनी-इतनी दक्षिणा दी।
उस महान यज्ञ के अवसर पर श्रीकृष्णपुरी द्वारका भूतल पर उसी तरह सुशोभित हुई, जैसे स्वर्ग में अमरावतीपुरी। उस समय मागध, सूत, बन्दीजन, गायक और वारांगनाएँ राजद्वार पर आयीं। पिर तो मृदंग, वीण, मुरयष्टि, वेणु, ताल, शंख, आनक और दुन्दुभि की ध्वनियों तथा संगीत, नृत्य एवं वाद्यगीतों के शब्दों से युक्त महान उत्सव होने लगा। वारांगनाएँ मधुर कण्ठ से गाने लगीं, सुन्दर तालों के साथ नृत्य करने लगीं। संगीत और गीत के अक्षरों के साथ सामदेव के गीत गूंज उठे। नर्तकियां अपने कुसुम्भ रंग के वस्त्र हिलाती हुई संगीत और नृत्य के साथ सब ओर प्रकाशित हो उठीं। उस उत्सव में जो बन्दीजन, मागध और गायक आये थे, उन्हें अपने निकट आने पर राजा ने बहुत सा सुवर्ण और रत्न दिये तथा जो अप्सराएँ आयीं थीं, उनको भी बहुमूल्य पुरस्कार समर्पित किया। सूतों, मागधों और समस्त बंदीजनों को भी अश्वमेध से प्रसन्न हुए राजा ने बहुत धन दिया। जैसे बादल पानी बरसाता है, उस तरह महाराज उग्रसेन धन की वृष्टि कर रहे थे।
तत्पश्चात यादवराज भूपालशिरोमणि उग्रसेन ने अपने यहाँ आये हुए प्रत्येक राजा को एक लाख घोड़े, एक हजार हाथी, सौ-सौ शिबिकाएँ, कुण्डल, कडे़ और तीस भार सुवर्ण सानन्द भेंट किये। इससे दूना उपहार महाराज ने गद आदि समस्त यादवों तथा नन्द आदि गोपों को दिया। यशोदा आदि गोपांगनाओं, देवकी आदि यदुकुल की स्त्रियों तथा रुक्मिणी और राधिका आदि श्रीहरि की पटरानियों को भी राजा ने बहुत से दिव्य वस्त्र और अलंकार देकर सबको संतुष्ट किया। अन्त में राजा ने पिर प्रसन्न होकर मुझ गर्गाचार्य को सौ ग्राम दिये। वह बाद मैंने क्रमश: वहाँ के ब्राह्मणों को बांट दिया। इसके बाद राजा ने श्रीकृष्ण और बलभद्र का वस्त्र, आभूषण, तिलक, पुष्पहार और नीराजना आदि उपचारों से पूजन किया।
राजन ! तब श्रीकृष्ण हंसते हुए बोले- महाराज ! इस महायज्ञ में समर्थ होते हुए भी आपने मुझे कुछ नहीं दिया।
यह सुनकर राजा बोले- जगदीश्वर ! माधव ! आप बलरामजी के साथ शीघ्र ही यथोक्त दक्षिणा ग्रहण कीजिये। -ऐसा कहकर हर्ष से उल्लसित और प्रेम से विह्वल हुए राजा ने राजसूय तथा अश्वमेध- दोनों यज्ञों का सारा फल श्रीकृष्ण के हाथ में दे दिया। उस समय द्वारका में जय-जयकार होने लगी। तत्काल संतुष्ट हुए समस्त देवता फूलों की वर्षा करने लगे।
तदनन्तर समपूर्ण देवता प्रसन्न हो अपना-अपना भाग लेकर स्वर्गलोक को चले गये। इसी तरह राक्षस, दैत्य, दाढ़वाले पशु, पक्षी, वानर, बिल में रहने वाले सर्प आदि जीव, पर्वत, गौ, वृक्ष-समुदाय, नदियां, तीर्थ और समुद्र- सभी अपना-अपना भाग ले, संतुष्ट हो, अपने-अपने निवास स्थान को चले गये। जो-जो राजा वहाँ आये थे, वे सब दान-मान से पूजित हो, सेनाओं द्वारा भूतल को कम्पित करते हुए अपनी-अपनी राजधानी को लौट गये। राजन ! नन्द आदि समस्त गोप और यशोदा आदि व्रजांगनाएँ श्रीकृष्ण से पूजित हो उनके विरहजनित कष्ट का अनुभव करती हुई व्रज को चली गयीं। इस प्रकार यादवराज उग्रसेन श्रीहरि की कृपा से मनोरथ के दुस्तर महासागर को पार करके निश्चित हो गये।
इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता के अन्तर्गत अश्वमेध खण्ड में ‘विश्व भोज्य दक्षिणा का वर्णन’ नामक सत्तावनवां अध्याय पूरा हुआ।
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